मनुष्यता का मंत्र है धर्म
ललित गर्ग
धर्म जीवन का अभिन्न अंग है, तत्व है। इसके अस्तित्व को नकारने का अर्थ है स्वयं के अस्तित्व को नकारना। जिसने धर्म को सही रूप में स्वीकार कर लिया, समझ लीजिये कि उसने जीवन की सर्वोच्च निधि को प्राप्त कर लिया। अंतर-धार्मिक संवाद के माध्यम से, हम एक-दूसरे की मान्यताओं और परंपराओं के बारे में जान सकते हैं, गलतफहमियों को दूर कर सकते हैं और आपसी समझ के पुल बना सकते हैं। इससे सहिष्णुता, सम्मान और सहयोग को बढ़ावा मिलता है, जो अंततः एक अधिक शांतिपूर्ण और सामंजस्यपूर्ण दुनिया का मार्ग प्रशस्त करता है।
भारतीय संस्कृति की आत्मा धर्म है। यही कारण है कि यहां अनेक धर्म पल्लवित एवं पुष्पित हुए हैं। सबने अपने-अपने ढंग से धर्म की व्याख्या की है। सुप्रसिद्ध लेखक लार्ड मोर्ले ने लिखा है, ‘आज तक धर्म की लगभग दस हजार परिभाषाएं हो चुकी हैं, पर उनमें भी जैन, बौद्ध आदि कितने ही धर्म इन व्याख्याओं से बाहर रह जाते हैं।’ लार्ड मोर्ले की इस बात से यह चिंतन उभरकर सामने आता है कि ये सब परिभाषाएं धर्म-सम्प्रदाय की हुई हैं, धर्म की नहीं।
धर्म बहुत व्यापक है। धर्म न तो पंथ, मत, संप्रदाय मंदिर या मस्जिद में है और न धर्म के नाम पर पुकारी जाने वाली पुस्तकें ही धर्म हैं। धर्म तो सत्य, करुणा और अहिंसा है। आत्मशुद्धि का साधन है। जीवन परिवर्तन एवं उसे सकारात्मक दिशा देने का माध्यम है। जिन लोगों ने सामाजिक सहयोग को धर्म का ताना-बाना पहना दिया है, किसी को भोजन देना, वस्त्र की कमी में सहायता प्रदान करना, रोग आदि का उपचार करना अध्यात्म धर्म नहीं, किन्तु पारस्परिक सहयोग है, लौकिक धर्म है।
धर्म जीवन का रूपान्तरण करता है। पर जिनमें धर्म से परिवर्तन घटित नहीं होता उन धार्मिकों ने शायद धर्म के वास्तविक स्वरूप को आत्मसात नहीं किया है। धार्मिक व्यक्ति प्रेम और करुणा से भरा होता है। धार्मिक होकर भी व्यक्ति लड़ाई, झगड़े, दंगे-फसाद करे, यह देखकर आश्चर्य होता है। धार्मिक अधर्म से लड़े, असत्य से लड़े, बुराई से लड़े यह तो समझ में आता है, किन्तु एक धार्मिक दूसरे धार्मिक से लड़े, यह दुख का विषय है। धर्म मनुष्यता का मंत्र है, उन्नति का तंत्र है। पशुता को मनुजता में रूपांतरित करने का यंत्र है। धर्म एक मर्यादा है, वह जीवन को मर्यादित करता है। यह विश्वशांति का अमोघ साधन है।
साभार : प्रवक्ता डॉट कॉम