अभिव्यक्ति को लेकर खिसकती डर की लक्ष्मण रेखा
दो मामलों में क्रमश : सुप्रीम कोर्ट व मद्रास हाईकोर्ट के हालिया फैसले सराहनीय कहे जाएंगे जिनमें सार्वजनिक तौर पर कविता व हास्य-व्यंग्य के जरिये अभिव्यक्ति की आजादी के अधिकार की रक्षा हुई। बता दें कि कुणाल कामरा ने अपनी सियासी टिप्पणी के लिए माफ़ी नहीं मांगी थी। शायद उन्होंने गत सप्ताह यह याद दिलाकर हम सब पर उपकार किया कि व्यंग्य के समक्ष सब समान हैं। ये मामले डर की लक्ष्मण रेखा नये सिरे से तय करते हैं।
ज्योति मल्होत्रा
ऐसे में जब सुप्रीम कोर्ट ने जनवरी में कांग्रेस सांसद इमरान प्रतापगढ़ी के खिलाफ जामनगर पुलिस द्वारा एक उर्दू नज़्म को लेकर दर्ज की गई एफआईआर को रद्द कर दिया है–जिसे गुजरात हाईकोर्ट ने खारिज करने से इनकार कर दिया था – और कुणाल कामरा ने भी अपने सोशल मीडिया शो में की टिप्पणी के लिए माफ़ी मांगने से साफ इनकार कर दिया है, तो गत सप्ताह का बड़ा प्रश्न यह रहा कि ‘इंडिया’ जो भारत है, उसके भीतर डर की लक्ष्मण रेखा कितने गहरे तक पैठ कर चुकी है?
हम में से हर कोई अपनी-अपनी लक्ष्मण रेखाएं तय करता है, और परिस्थिति के मुताबिक उनको सरकाते भी रहते हैं। सुप्रीम कोर्ट के न्यायमूर्ति अभय ओका और उज्जल भुयान ने हालांकि अपना रुख सरल रखा। उन्होंने प्रतापगढ़ी मामले पर टिप्पणी करते हुए कहा ः ‘...हम अपने गणतंत्र के 75वें साल में हैं, हम वह नहीं हो सकते कि हमारे मूल सिद्धांत महज एक कविता या किसी प्रकार की कला अथवा मनोरंजन, मसलन, स्टैंड-अप कॉमेडी करने पर डांवांडोल हो जाएं और प्रस्तोता पर विभिन्न समुदायों के बीच कथित दुश्मनी या नफ़रत पैदा करने का आरोप मढ़ने लग जाएं। इस किस्म का दृष्टिकोण अपनाना सार्वजनिक दायरे में तमाम वैध विचारों की अभिव्यक्ति को कुचलना होगा, जबकि एक स्वतंत्र समाज के लिए इनका वजूद मूलतः बहुत ज़रूरी है’।
बीते शुक्रवार को ही, दिल्ली उच्च न्यायालय ने स्वीडन के नागरिक, प्रसिद्ध शिक्षाविद और मोदी के आलोचक अशोक स्वैन का ओसीआई कार्ड रद्द करने के केंद्र के आदेश को भी खारिज कर दिया - वे अपनी बीमार मां से मिलने के लिए भारत आना चाहते हैं, पर नहीं आ पा रहे। अभी यह स्पष्ट नहीं है कि आगे क्या होगा क्योंकि अदालत ने केंद्र को स्वैन को एक नया कारण बताओ नोटिस जारी करने की अनुमति दे दी है। पिछले शुक्रवार को दिन खत्म होते-होते, मद्रास उच्च न्यायालय ने भी उस सुबह कामरा द्वारा मांगी गई अग्रिम जमानत को मंजूरी देकर अपना अभयदान दे दिया। जमानत की यह अर्जी मुंबई में उस एफआईआर की आशंका के मद्देनजर थी, जिसके लिए कहा जा रहा है कि कामरा द्वारा महाराष्ट्र के उपमुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे का नाम सीधे तौर पर लिए बिना ‘गद्दार’ या ‘देशद्रोही’ शब्दों का इस्तेमाल कर कसा तंज उन्हीं पर था।
ऐसा नहीं है कि कामरा ने अपनी ‘धृष्टता’ के लिए माफी मांग जान छुड़ा ली। रणवीर अलाहबादिया और समय रैना के बरक्स, जिनके मां-बाप को लेकर छिछोरे चुटकुलों ने फिर भी देशवासियों के मुंह में ‘क्या यार’ वाला कसैला स्वाद पैदा कर दिया था, कामरा ने कहा, ‘मुझे इस भीड़ से डर नहीं लगता और मैं चारपाई के नीचे छिपकर इस भीड़ के छिटकने का इंतज़ार नहीं करूंगा’।
तो, बीते सप्ताह के अंत में बड़ा सवाल यह था : क्या भय है कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता अपना दमघोंटू दायरा तोड़कर बाहर निकल आएगी? क्या गणतंत्र के दिल में कुछ-कुछ परिवर्तन आने लगा है, जिसका चिन्ह है कि प्रतापगढ़ी और कामरा, दोनों एक समान संविधान की लाल-काली प्रतियां लहरा रहे हैं, मानो राष्ट्र को याद दिलाना चाहते हों कि अनुच्छेद 19 और 21 हमें सशक्त बनाते रहे हैं, तो क्या आपको भी?
सवाल यह है कि क्या डर की लक्ष्मण रेखा फिर से सरक रही है? तथ्य यह है कि चूंकि कामरा इन दिनों तमिलनाडु में रहते हैं, इसलिए कम से कम फिलहाल तो सुरक्षित हैं। एमके स्टालिन की डीएमके सरकार उनकी रक्षा करेगी, हालांकि अदालतों के विरुद्ध वह भी नहीं जाना चाहेगी, लेकिन इस दौरान वह भाजपा को राजनीतिक चुनौती देती रहेगी।
शायद भगवंत मान का पंजाब भी कुछ ऐसी ही विचित्र स्थिति में हो सकता था। मुख्यमंत्री ने अपने सार्वजनिक जीवन की शुरुआत बतौर एक शानदार हास्य अभिनेता की थी। 'लाफ्टर चैलेंज' नामक स्टैंड-अप शो से तेजी से सीखकर उनके ‘पुष्पा’ वाले चुटकुले आज भी राजनीतिक किस्सों का हिस्सा हैं - और लोकसभा के समय में जीवन के उन सबकों पर अमल किया। उनकी चतुराई कायम है और ऐन समय पर अपने तीखे शब्द बाणों से किसी को भी चित्त करने की उनकी क्षमता आज भी बरकरार है, सिवाय इसके कि कभी-कभी लगता है कि रेत उनके हाथ से फिसल रही है।
तथ्य है कि पंजाब बहुत ज़्यादा कर्ज में डूबा हुआ है, सूबा नशे के संजाल में फंसा है,सूबा गेहूं -चावल चक्र वाले कृषि ढर्रे के अलावा कनाडा गए पंजाबी समुदाय की कमाई पर बहुत ज़्यादा निर्भर है, और वह घट रही है, इसलिए ग्राफ इतना गिर चुका है कि देश के बाकी हिस्सों के लिए इसे गंभीरता से लेना काफी मुश्किल है। फ़िलहाल, तमिलनाडु, अपने संजीदा सामाजिक-आर्थिक मापदंडों के साथ सबसे आगे है, जो बाकी देश के लिए ईर्ष्या का विषय है।
कामरा प्रकरण के अंत में ओशो का यह कथन : ‘जीवन वहीं से शुरू होता है जहां से डर खत्म होता है’, सच होता लगा, कहां तो गत सप्ताह की शुरुआत में तो खूब हलचल मची लेकिन शुक्रवार की शाम होते-होते लगने लगा कि सुप्रीम कोर्ट द्वारा बोलने की आज़ादी को लेकर दिए फैसले के बाद से जीवन की चाल तेज़ी से आगे बढ़ चली है। उधर संसद में भी खूब हंगामा हुआ,जहां पर नवीनतम नोक-झोंक 14वीं सदी के राजपूत राजा राणा सांगा की साख को लेकर हुई, जब समाजवादी पार्टी के एक सांसद ने इब्राहिम लोदी को हराने के लिए बाबर को देश में कथित तौर पर आमंत्रित करने के वास्ते राणा को ‘देशद्रोही’ करार दिया। केवल 10 दिन पहले, महाराष्ट्र विधानसभा की कार्यवाही औरंगज़ेब के शासन को लेकर उबाल पर रही, वहीं नागपुर हिंसा में संपत्ति का भारी नुकसान हुआ और अनेक लोग घायल हुए क्योंकि सदियों पहले मर चुके मुगल सम्राट पर नाराज़गी जाहिर करने के अपने अधिकार के मुद्दे पर लोग भिड़ गए। इन परिस्थितियों में, उन आंकड़ों की किसे परवाह कि भारत की मौजूदा शहरी बेरोजगारी दर (17 प्रतिशत), भूख एवं कुपोषण (वैश्विक भूख सूचकांक) में 127 देशों में हम 105वें स्थान पर तो मुक्त अभिव्यक्ति (विश्व प्रेस स्वतंत्रता सूचकांक) में 180 देशों में से 159वें पायदान पर हैं।
जहां तक बात है कि क्या कामरा के नवीनतम प्रकरण के साथ भारत में कुछ बदलाव आएगा, स्वाभाविक है लोकमत अभी साफ नहीं है। लेकिन क्या किसी को विगत के मुनव्वर फारुकी प्रकरण की याद है, जब एक कथित चुटकुले के कारण उन्हें 1 जनवरी, 2021 को गिरफ्तार कर लिया गया था, जोकि उन्होंने सुनाया ही नहीं था, सिर्फ इतने इल्जाम पर कि समुदाय विशेष के एक समूह का कहना था कि रिहर्सल के दौरान सह कलाकार नलिन यादव को ऐसा कुछ कहते हुए सुना था; ऐसे ही कीकू शारदा वाला मामला स्मरण है, जब 2016 में डेरा सच्चा सौदा प्रमुख की नकल करने के लिए उनकी गिरफ्तारी हुई थी या फिर वीर दास, जिन्हें 2021 में दिल्ली की सीमाओं पर धरने पर बैठे किसानों के हक में और एक बलात्कार के खिलाफ आवाज उठाने की वजह से धर लिया गया था। कदाचित कविता और हास्य का बचाव करने के लिए सुप्रीम कोर्ट की सराहना करनी बनती है। आखिरकार, व्यंग्य इसलिए भी भाता है क्योंकि यह शक्तिशाली और मशहूर लोगों तक का मखौल बना लेता है और यह कि वे देवता न होकर आम मिट्टी से ही बने हैं। हास्य कलाकार हमें याद दिलाते हैं कि हम सब बहुत मानवीय हैं और आगामी कल एक अन्य मौक़ा है न कि खुद को बहुत गमगीन बना लेने का।
शायद कामरा ने गत सप्ताह यह याद दिलाकर हम सब पर उपकार किया है कि व्यंग्य के निशाने पर सब बराबर हैं। यह हमारी लक्ष्मण रेखाओं को फिर से निर्धारित करता है और हमें हमारे डर से निजात दिला रहा है। यह हमें आजाद होने की इजाजत दे रहा है।
लेखिका ‘द ट्रिब्यून’ की प्रधान संपादक हैं।