सृष्टि के कल्याण हेतु मत्स्य अवतार
परंपरागत रूप से मत्स्य जयंती के अवसर पर सनातन धर्म के अनुयायिओं के लिए धार्मिक स्थानों की यात्राएं करने एवं पवित्र नदियों में स्नान, दान आदि करने का बड़ा महत्व होता है। शास्त्रीय मान्यताओं के अनुसार इस पावन तिथि को जो भक्त मत्स्य रूप अवतारी भगवान श्रीहरि विष्णु के व्रत के हेतु संकल्पादि कृत्यों को पूर्ण करता हुआ पुरुषसूक्त या संबंधित वेदोक्त मंत्रों द्वारा मत्स्य रूप में लीलाधारी भगवान श्रीहरि का षोडशोपचार पूजन कर उनके प्राकट्य की लीला कथाओं का पाठ अथवा श्रवण तथा मंत्रों का जाप करता है, निश्चय ही उस भगवद्भक्त का मन, जीवन और आत्मा प्रकाशित हो संपूर्ण ज्ञान-विज्ञान से संयुक्त हो जाता है।
चेतनादित्य आलोक
मत्स्य जयंती चैत्र माह के शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि को मनाई जाती है, जो 31 मार्च, सोमवार को पड़ रही है। संपूर्ण हिंदू समाज सहित विश्व कल्याण की भावना रखने वाले सभी लोगों के लिए यह बहुत ही महत्वपूर्ण दिन होता है, क्योंकि इस दिन भगवान श्रीहरि विष्णु, जिनका एक नाम ‘नारायण’ भी है, ने मध्याह्नोत्तर वेला में पुष्पभद्रा नदी के तट पर संपूर्ण सृष्टि की रक्षा एवं प्राणियों के कल्याणार्थ मत्स्य रूप धारण किया था। यही कारण है कि इस दिन मत्स्य अवतार में भगवान श्रीहरि विष्णु की पूजा की जाती है। उल्लेखनीय है कि मत्स्य अवतार भगवान श्रीविष्णु का पहला तथा उनके सभी अवतारों में बेहद महत्वपूर्ण अवतार है। मत्स्य जयंती व्रत का पावन संयोग तो देखिए कि चैत्र नवरात्रि के पहले दिन यानी चैत्र प्रतिपदा के दिन ब्रह्मा जी ने सृष्टि की रचना की थी और चैत्र महीने के शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि को भगवान श्रीहरि विष्णु ने अपना प्रथम अवतार ‘मत्स्य अवतार’ ग्रहण किया था।
पुनरुत्थान की प्रतिष्ठा का व्रत
जीवन में पुनरुत्थान को महत्व एवं प्रतिष्ठा प्रदान करने वाला यह व्रत सनातन धर्मावलंबियों द्वारा देश भर में बड़े ही उत्साह और भक्ति भाव के साथ मनाया जाता है। इस दिन विभिन्न मंदिरों में धूमधाम से भगवान श्रीविष्णु की पूजा-अर्चना की जाती है और भागवत कथाओं का आयोजन किया जाता है। परंपरागत रूप से मत्स्य जयंती के अवसर पर सनातन धर्म के अनुयायिओं के लिए धार्मिक स्थानों की यात्राएं करने एवं पवित्र नदियों में स्नान, दान आदि करने का बड़ा महत्व होता है।
शास्त्रीय मान्यताओं के अनुसार इस पावन तिथि को जो भक्त मत्स्य रूप अवतारी भगवान श्रीहरि विष्णु के व्रत के हेतु संकल्पादि कृत्यों को पूर्ण करता हुआ पुरुषसूक्त या संबंधित वेदोक्त मंत्रों द्वारा मत्स्य रूप में लीलाधारी भगवान श्रीहरि का षोडशोपचार पूजन कर उनके प्राकट्य की लीला कथाओं का पाठ अथवा श्रवण तथा मंत्रों का जाप करता है, निश्चय ही उस भगवद्भक्त का मन, जीवन और आत्मा प्रकाशित हो संपूर्ण ज्ञान-विज्ञान से संयुक्त हो जाता है।
क्या करें
‘ओम मत्स्यरूपाय नमः’ मंत्र का जाप करना बेहद लाभकारी माना गया है। नदियों एवं अन्य जलकुंडों और जलस्रोतों में मछलियों को गेहूं के आटे की छोटी-छोटी गोलियां खिलाने तथा ब्राह्मणों, निर्धनों एवं अन्य जरूरतमंद लोगों को सात प्रकार के अनाजों का दान करने से भगवान श्रीहरि विष्णु प्रसन्न होते हैं। इनके अतिरिक्त मत्स्य जयंती के दिन मंदिरों में ‘हरिवंश पुराण’ नामक पवित्र ग्रंथ का दान करना भी बेहद श्रेयस्कर माना गया है।
मत्स्य जयंती प्रसंग
राजा सत्यव्रत मनु भगवान श्रीविष्णु के परम भक्त थे। एक दिन प्रातः नदी में स्नान करने के बाद भगवान का तर्पण करने के लिए उन्होंने अंजलि में जल लिया, तो जल के साथ एक छोटी-सी मछली भी आ गई। ज्योंहि उन्होंने मछली को नदी में छोड़ना चाहा, वह बोली, ‘राजन! जल के बड़े-बड़े जीव छोटे-छोटे जीवों को खा जाते हैं। अवश्य ही कोई बड़ा जीव मुझे भी खा जाएगा। कृपा करके मेरे प्राणों की रक्षा कीजिए।’ सत्यव्रत के हृदय में दया जागी। वे मछली को अपने कमंडल के जल में रखकर घर ले आए। एक रात में ही मछली का शरीर इतना बढ़ गया कि कमंडल उसके रहने के लिए छोटा पड़ने लगा। फिर राजा ने उसे तालाब में छोड़ा, तो तालाब भी उसके लिए छोटी हो गई। उसके बाद राजा ने उसे नदी में और तदोपरांत समुद्र में स्थानांतरित किया, किंतु समुद्र भी उस मछली के लिए छोटा पड़ने लगा।
राजा सत्यव्रत समझ गए कि यह साधारण मछली नहीं है। इसलिए उन्होंने उसे प्रणाम कर उसका रहस्य पूछा। उसके बाद मत्स्य रूपधारी भगवान श्रीहरि विष्णु ने राजा से कहा, ‘राजन! हयग्रीव नामक दैत्य द्वारा वेदों को चुरा लेने के कारण जगत में चारों ओर अज्ञान और अधर्म का अंधकार फैल गया है। इसलिए मैंने हयग्रीव का वध कर उसे मुक्ति प्रदान करने तथा वेदों की रक्षा के लिए मत्स्य का रूप धारण किया है, ताकि इस संसार में ज्ञान और धर्म का उजाला पुनः फैल सके।’ भगवान पुनः बोले, ‘आज से सातवें दिन संपूर्ण पृथ्वी जल में डूब जाएगी। जल के अतिरिक्त कहीं कुछ भी दृष्टिगोचर नहीं होगा।’
तत्पश्चात उन्होंने राजा को आत्मज्ञान प्रदान किया, ‘सभी प्राणियों में मैं ही निवास करता हूं। जगत में सभी प्राणी एक समान हैं। यह जगत नश्वर है। जो प्राणी सबमें मुझे ही देखते हुए जीवन व्यतीत करता है, वह अंत में मुझे ही प्राप्त होता है।’ भगवान श्रीविष्णु से इस प्रकार का आत्मज्ञान प्राप्त कर राजा सत्यव्रत का जीवन धन्य हो गया। वे जीवित रहते हुए ही जीवन-मरण के बंधनों से मुक्त हो गए। बाद में, प्रलय का भयंकर प्रकोप शांत होने पर मत्स्य रूपी भगवान श्रीविष्णु ने हयग्रीव दैत्य का वधकर न केवल उसे मुक्ति प्रदान की, बल्कि वेदों की रक्षा भी की।