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सुचारु संचालन से ही फलदायी होंगी योजनाएं

06:58 AM Dec 21, 2023 IST
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दीपिका अरोड़ा

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राष्ट्र के सर्वांगीण विकास हेतु, सरकारों द्वारा समाज के हित में अनेक योजनाएं चलाई जा रही हैं किंतु बात जब समुचित प्रबन्धन की हो तो अधिकतर योजनाएं त्रिशंकु अवस्था में झूलती प्रतीत होती हैं। हरियाणा के ही एक ज़िले का उदाहरण लें, जहां ‘संतुलित पोषाहार योजना’, ईंधन अनुपलब्धता को लेकर संघर्षरत दिखाई पड़ी। मीडिया में छपी रिपोर्टों के अनुसार, ज़िले के अंतर्गत स्थापित लगभग 1281 आंगनवाड़ी केद्रों में पंजीकृत 32 हज़ार बच्चों को विगत दो वर्षों से लंबित ईंधन बजट न मिल पाने के कारण सूखे राशन के रूप में मुरमुरे, चना, मूंगफली गिरी आदि खाकर ही संतुष्ट होना पड़ा। ईंधन-व्यवस्था न होने के चलते खिचड़ी, परांठा, मीठा व नमकीन दलिया जैसे दिनानुसार सूचीबद्ध भोज्य पदार्थ पोषाहार थाली से ग़ायब हो गए। जानकारी के अनुसार, कुछ माह अपने स्तर पर व्यवस्था करने वाले आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं व सहायकों को अंततः इस विषय में विरोध दर्शाना पड़ा।
जैसा कि सर्वविदित है, भोजन जीवन की मूलभूत आवश्यकता है। न केवल पर्याप्त मात्रा में इसकी उपलब्धता महत्वपूर्ण है बल्कि पोषण के स्तर पर आहार का सम्पूर्ण होना भी जरूरी है। खाद्य संसाधनों की स्थिति, उपलब्धता तथा उपयोग की अनिवार्यता के मद्देनजर ही 8 मार्च, 2018 को सरकार द्वारा ‘पोषण अभियान’ यानी राष्ट्रीय पोषण मिशन की शुरुआत की गई। योजना का उद्देश्य कुपोषण की चुनौती से निपटने एवं खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करने हेतु व्यापक रणनीति तैयार करना, पर्याप्त पोषक आहार सर्वसुलभ करवाना एवं पोषण की आवश्यकता के प्रति जागरूकता बढ़ाना रहा। निर्धारित नवीन मापदंड के अनुसार, पोषाहार योजना के माध्यम से सरकार सभी गर्भवती एवं धात्री महिलाओं तथा 6 माह से 6 वर्ष के बच्चों के पोषण हेतु पका हुआ भोजन व सूखा राशन प्रदान करती है। योजना के अंतर्गत, बच्चों को पौष्टिक आहार देने के साथ कुपोषित बच्चों को स्वास्थ्य संबंधी सुविधाएं भी प्रदान की जाती हैं।
पोषण एक महत्वपूर्ण परिप्रेक्ष्य में स्वास्थ्य तथा विकास का मूलमंत्र है। विशेषकर गर्भावस्था से बाल्यकाल तथा किशोरवय की चरणबद्ध विकास प्रक्रिया के तहत, बच्चों के शारीरिक, बौद्धिक तथा मानसिक विकास हेतु सम्पूर्ण आहार उपलब्ध होना अत्यधिक महत्व रखता है। बाल्यकाल में तीव्र गति से होने वाले विकास के मद्देनज़र, आहार में प्रोटीन, कार्बोहाइड्रेट, वसा, विटामिनों तथा खनिजों का समुचित मात्रा में समावेश होना अत्यंत आवश्यक है। संतुलित आहार बच्चों की हड्डियां तथा मांसपेशियां मजबूत बनाने के साथ, स्वस्थ मस्तिष्क तथा तंत्रिका प्रणाली के निर्माण एवं विकास हेतु आवश्यक पोषक तत्व प्रदान करता है। अल्प पोषण अथवा पोषण युक्त आहार का अभाव बालकों का समुचित विकास अवरुद्ध करके उन्हें असामान्य बना सकता है। उनकी बुद्धिमत्ता प्रभावित हो सकती है, रोग प्रतिरोधक क्षमता भी क्षीण हो जाती है। भूख व कुपोषण न केवल स्वास्थ्य समस्याओं की जड़ हैं अपितु लोगों की सामाजिक-आर्थिक स्थिति को भी प्रभावित करते हैं। बच्चों की शिक्षा पर भी इसका प्रतिकूल असर देखा गया।
खाद्यान्न वितरण योजनाएं चलाए जाने के बावजूद आज भी भारत की कुल जनसंख्या का एक बहुत बड़ा हिस्सा न केवल खाद्य सुरक्षा से वंचित है, बल्कि पर्याप्त मात्रा में उसे पोषक आहार भी उपलब्ध नहीं हो पाता। ग्लोबल हंगर इंडेक्स, 2023 के अनुसार 125 देशों में भारत को 111वें स्थान पर, बेहद गंभीर स्थिति में रखा गया। रिपोर्ट के मुताबिक़, देश की 16.6 प्रतिशत आबादी कुपोषण की शिकार है। पांच वर्ष से कम आयुवर्ग के 35.5 प्रतिशत फ़ीसदी बच्चे उम्र के लिहाज़ से ठिगने हैं। पांच वर्ष से कम आयुवर्ग के बच्चों में मृत्यु दर 3.1 प्रतिशत दर्ज़ की गई। देश में बच्चों में वेस्टिंग दर, यानी ऊंचाई के लिहाज़ से बहुत पतले, 18.7 प्रतिशत रिपोर्ट की गई, जो विश्व में सर्वाधिक है। भारत सरकार के अनुसार, मापदंड पैमाने के आधार पर रिपोर्ट को भले ही संदेहास्पद आंक सकते हैं किंतु चाहकर भी देश में कुपोषण की सतही स्थिति नज़रअंदाज़ नहीं कर सकते।
पोषाहार ईंधन अनुपलब्धता के उपरोक्त मामले में, हालांकि आईसीडीएस की ज़िला कार्यक्रम अधिकारी द्वारा शीघ्र ही बजट जारी करने संबंधी आश्वासन दिया गया किंतु विचारणीय है, आख़िर ऐसी स्थिति आती ही क्यों है, जब संसाधन प्राप्ति हेतु कर्मचारियों को अपने स्तर पर जुगाड़ करना पड़े अथवा असमर्थ होने पर अव्यवस्था के विरुद्ध सड़कों पर उतरना पड़े? संबंधित अधिकारियों का इस संदर्भ में क्या कोई दायित्व नहीं बनता? भारी प्रचार के साथ आरम्भ की गई योजनाओं में आख़िर क्रियान्वयन को इतना महत्व क्यों नहीं दिया जाता कि वे योजनाबद्ध ढंग से समयानुसार संसाधनों से युक्त हों, निर्बाध संचालित होती रहें? विभागों के मुखिया कैसे भूल सकते हैं कि विश्व के बड़े खाद्य उत्पादक देश भारत में कुपोषण बड़ी समस्या है।
बच्चे देश का भविष्य हैं। अर्द्धविकसित बचपन की कमज़ोर आधारशिला पर एक सशक्त, सुदृढ़ राष्ट्र का निर्माण भला कैसे हो सकता है? समृद्ध, स्वस्थ तथा सकारात्मक समाज का निर्माण तभी संभव है जब सरकारी योजनाएं सुचारु संचालन के आधार पर स्वयं को ख़रा साबित कर पाएं।

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