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उत्तराखंड में कानून बनने के यक्ष प्रश्न

06:37 AM Feb 09, 2024 IST
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जयसिंह रावत

उत्तराखंड विधानसभा से समान नागरिक संहिता यानी कॉमन सिविल कोड (यूसीसी) का विधेयक पास करवाना देश में इस संहिता को लागू कराने का ट्रायल माना जा सकता है। क्योंकि बिना राष्ट्रपति या केन्द्र सरकार की अनुमति से न तो यह संहिता लागू हो सकती है और न ही उत्तराखंड के मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी बिना केन्द्रीय नेतृत्व की सहमति के इतने बड़े मुद्दे को छेड़ सकते थे। माना जाता है कि पंडित नेहरू ने भी 1951-52 का आम चुनाव समान नागरिक संहिता के मुद्दे पर लड़ा था जिसका उन्हें लाभ मिला और उन्होंने 1955 और 56 में हिन्दुओं से संबंधित समान नागरिक संहिताएं पारित करवा दीं। परिस्थितियां देखकर साफ लगता है कि लोकसभा चुनाव से पूर्व समान नागरिक संहिता का ट्रायल उत्तराखंड में किया जा रहा है।
यूसीसी पर सुशील मोदी की अध्यक्षता में गठित 17 सदस्यीय कार्मिक, लोक शिकायत, कानून और न्याय पर संसद की स्थायी समिति की 3 जुलाई, 2023 की बैठक के बाद सुशील मोदी ने प्रेस को बताया था कि इस संहिता से जनजातियों को अलग किया जा सकता है और यही प्रावधान उत्तराखंड की समान नागरिक संहिता में भी किया गया है। यूं भी धामी सरकार का यूसीसी विधेयक पास करवाने का कदम बिना अमित शाह के मार्ग दर्शन के नहीं है। नागरिक संहिता की ड्राफ्ट कमेटी ने 2 जून, 2023 को दिल्ली में 22वें विधि आयोग के अध्यक्ष जस्टिस ऋतुराज अवस्थी से भेंट की थी। इसके बाद जस्टिस रंजना देसाई ने मुख्यमंत्री धामी के साथ 3 जुलाई 2023 को इस संबंध में गृहमंत्री अमित शाह से मुलाकात की। उसके अगले ही दिन मुख्यमंत्री धामी ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से मुलाकात के बाद प्रेस से बातचीत करते हुए बताया था कि प्रधानमंत्री उत्तराखंड में समान नागरिक संहिता की तैयारियों से अवगत हैं।
जस्टिस रंजना देसाई की अध्यक्षता वाली कमेटी की 2 जून को 22वें विधि आयोग के अध्यक्ष से मुलाकात के बाद 14 जून को आयोग द्वारा समान नागरिक संहिता पर जन साधारण और धार्मिक संगठनों से राय शुमारी करना भी केन्द्र सरकार की इस संहिता को लागू करने के प्रति बढ़ती रुचि के साथ ही सरकार के उत्तराखंड की नागरिक संहिता से सीधे लिंक को ही दर्शाता है। यही नहीं, उत्तराखंड के मुख्यमंत्री ने पहले कहा था कि देसाई कमेटी जून तक अपनी रिपोर्ट दे देगी। लेकिन कमेटी की रिपोर्ट का इतने विलम्ब से 2 फरवरी को आने का मतलब विधि आयोग और गृह मंत्रालय के सामंजस्य से रिपोर्ट को ऐसा बनाना भी हो सकता है जो कि स्वयं केन्द्र सरकार के काम आये।
जस्टिस ऋतुराज की अध्यक्षता में 21 फरवरी, 2020 को 22वें विधि आयोग का गठन 3 साल के लिये हुआ था जिसका कार्यकाल फरवरी 2023 में पूरा होने के बाद उसे 31 अगस्त, 2024 तक का विस्तार दिया गया है। वर्तमान आयोग के समक्ष विधि मंत्रालय द्वारा समान नागरिक संहिता के मामले को संदर्भित किया गया है। आयोग को अपने मूल कार्यकाल की समाप्ति के बाद अब यूसीसी पर तत्परता दिखाने का सीधा मतलब भारत सरकार का इस मुद्दे को प्राथमिकता में लाना है। वहीं सरकार का इस विषय पर इतनी रुचि दिखाने का मतलब आगामी लोकसभा चुनाव ही हो सकता है।
संविधान के नीति निर्देशक तत्व संख्या 44 में सरकार सेे भारत के पूरे क्षेत्र के अंदर समान नागरिक संहिता लागू करने की अपेक्षा की गयी है। मौलिक अधिकारों संबंधी रुकावटों, देश की संास्कृतिक विविधता और अनुसूची 5 और 6 की विशेष परिस्थितियों के कारण भारत की सरकारें अब तक इसे लागू नहीं कर सकीं। मोदी सरकार धारा 370 को हटाने का बहुत मुश्किल काम आसानी से कर गयी। लेकिन वह भी देश की धार्मिक-सांस्कृतिक विविधता तथा संवैधानिक प्रावधानों को देखते हुये यूसीसी को लेकर ठिठक गयी। यह संहिता आस्था और धार्मिक परम्पराओं के मौलिक अधिकारों से संबंधित है। भारत के धर्मनिरपेक्ष चरित्र से भी जुड़ी है और सुप्रीम कोर्ट की सबसे बड़ी बेंच 1973 में कह चुकी है कि संसद के पास संविधान संशोधन के व्यापक अधिकार तो हैं लेकिन असीमित अधिकार नहीं हैं। यह भी कि संविधान की मूल भावना से छेड़छाड़ नहीं की जा सकती। अगर ऐसा होता है तो सुप्रीम कोर्ट को ऐसे संशोधनों की समीक्षा का अधिकार है। इसलिये उत्तराखंड की यूसीसी को भी कोर्ट में चुनौती मिल सकती है।
जहां तक उत्तराखंड में यूसीसी का सवाल है तो राज्य विधानसभा को कानून बनाने का अधिकार है मगर संविधान के दायरे से बाहर जाने का हक नहीं। यह विषय संविधान की समवर्ती सूची का है । समवर्ती सूची के विषयों पर संसद के साथ ही विधानसभा भी कानून बना तो सकती है लेकिन अगर दोनों के कानून टकराते हैं तो राज्य का कानून स्वतः अमान्य हो जायेगा। चूंकि इस विषय पर पहले ही संसद द्वारा पारित हिन्दू मैरिज एक्ट और मुस्लिम पर्सनल लॉ जैसे कानून मौजूद हैं, जिन्हें बदलने का अधिकार राज्य विधानसभा को नहीं है। लेकिन अगर समवर्ती सूची में राज्य विधानसभा द्वारा पारित कानून को राष्ट्रपति अनुमति देते हैं तो वह कानून उस राज्य की सीमा के अंदर लागू हो सकता है। इस यूसीसी में मौलिक अधिकारों के पक्ष के साथ ही लिव इन रिलेशन, सम्पत्ति का उत्तराधिकार, सरकारी कर्मचारियों तथा दूसरे राज्यों में रह रहे प्रवासियों पर बंदिशें जैसी कुछ ऐसी खामियां हैं जो अदालती हस्तक्षेप के लिये पर्याप्त कारण हैं। ऐसा लगता है कि केन्द्र सरकार उत्तराखंड में यह संहिता परखना चाहती है कि इसके सामाजिक, राजनीतिक और संवैधानिक प्रभाव क्या हो सकते हैं।

लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं।
ये उनके निजी विचार हैं।

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