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एंटीबायोटिक्स के खतरे

07:40 AM Jan 22, 2024 IST
एंटीबायोटिक्स के खतरे
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आज भारत समेत दुनिया के तमाम देशों में एंटीबायोटिक्स दवाओं का अंधाधुंध सेवन लोगों के स्वास्थ्य के लिये एक गंभीर चुनौती बनता जा रहा है। दरअसल, इनके अत्यधिक प्रयोग से शरीर में रोगाणुओं से प्रतिरोध की क्षमता को खतरा पैदा होता जा रहा है। भारत के स्वास्थ्य सेवा महानिदेशालय यानी डीजीएचएस ने डॉक्टरों और फार्मासिस्टों को सलाह दी है कि दवाओं का विवेकपूर्ण उपयोग सुनिश्चित करें। जहां तक हो सके अधिक तीव्र क्षमता वाली एंटीबायोटिक्स दवाएं मरीजों को देने से परहेज करें। डॉक्टरों से कहा गया है कि रोगाणुरोधी दवाएं लिखते समय संकेत,कारण और औचित्य का स्पष्ट रूप से उल्लेख करें। क्योंकि कहा भी गया है ‘अति सर्वत्र वर्जयेत‍्।’ दरअसल, इन दवाओं में एंटीबॉयोटिक्स, एंटीवायरल, एंटीफंगल और एंटीपैरासिटिक्स दवाएं शामिल हैं। उल्लेखनीय है कि एंटीबायोटिक्स औषधि नियम 1945 की अनुसूची एच और एच-1 के अनुसार केवल पंजीकृत चिकित्सा पेशेवर ही ऐसी दवाओं को लेने के लिये परामर्श दे सकते हैं। हालांकि, नियम को लागू करने में सख्ती के अभाव तथा लोगों में जागरूकता की कमी के चलते ये दवाएं मेडिकल स्टोरों पर बिना डॉक्टरी परामर्श के भी बेची जाती हैं। यही वजह है कि रोगाणुरोधी दवाओं के अत्यधिक सेवन व बिना डॉक्टरी परामर्श के दिये जाने से लोगों में रोगप्रतिरोधक क्षमता में गिरावट आती है। कालांतर शरीर में रोगाणुओं के हमले पर ये दवाएं काम नहीं करती। उल्लेखनीय है कि वर्ष 2019 में वैश्विक स्तर पर बैक्टीरियल एएमआर 12.7 लाख मौतों के लिये जिम्मेदार था , जबकि 49.5 लाख मौतें दवा प्रतिरोधी संक्रमण से जुड़ी थीं।
दरअसल, भारत के स्वास्थ्य सेवा महानिदेशालय ने इस बात का उल्लेख किया है कि एएमआर प्रतिरोधी रोगाणुओं के कारण होने वाले संक्रमण की प्रभावी रोकथाम और उपचार को खतरे में डालता है, जिसके परिणामस्वरूप लंबी बीमारी होती है और मृत्यु का खतरा बढ़ जाता है। उल्लेखनीय है कि वर्ष 2016 में केंद्रीय स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय ने एएमआर पर ‘रेड लाइन’ जागरूकता अभियान आरंभ किया था। जिसमें रोगियों व उनके परिजनों से बिना डॉक्टरी परामर्श के लाल खड़ी रेखा से चिन्हित दवाएं उपयोग न करने के लिये कहा गया था। अमेरिका में एक अध्ययन के बाद आई रिपोर्ट में भारत की इस पहल की सराहना की गई थी। इस रिपोर्ट में सलाह दी गई थी कि यदि आवश्यक हो तो एंटीबायोटिक्स पैकेजिंग के लिये इसके लेबलिंग में सुधार किया जा सकता है। ऐसी मुहिम विश्व स्तर पर शुरू की जानी चाहिए। निस्संदेह, विषय की गंभीरता को देखते हुए मूल्यांकन किया जाना चाहिए कि पिछले आठ साल में इस अभियान के परिणाम कैसे आए हैं। क्या उन खामियों को दूर किया गया जो इसकी प्रभावशीलता में बाधक बन रही थीं। निश्चित रूप से इससे जुड़े हितधारकों मसलन डॉक्टरों, फार्मासिस्टों, फार्मा कंपनियों और ग्राहकों को एंटीबायोटिक्स दवाओं के अंधाधुंध नुस्खे लिखने, बिक्री और उपयोग पर अंकुश लगाने के लिये जारी दिशानिर्देशों और नियमों का पालन करना चाहिए। साथ ही भारतीय चिकित्सा अनुसंधान परिषद द्वारा स्थापित एएमआर निगरानी और अनुसंधान नेटवर्क को मजबूत करने की जरूरत है।

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