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खाद्य सुरक्षा पर असर को लेकर मौजूद चिंताएं

06:25 AM Jan 12, 2024 IST
खाद्य सुरक्षा पर असर को लेकर मौजूद चिंताएं
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डॉ. वीरेन्द्र सिंह लाठर

कई अंतर्राष्ट्रीय और राष्ट्रीय कृषि वैज्ञानिकों ने बहुप्रचारित एक नैनो उर्वरक को राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा के लिए खतरा बताया है। वहीं कहा कि यह किसानों के लिए भी फायदे का सौदा नहीं है। पंजाब कृषि विश्वविद्यालय, लुधियाना द्वारा हाल ही में प्रकाशित शोध के अनुसार, नैनो उर्वरक तकनीक अपनाने से गेहूं की पैदावार में 21.6 प्रतिशत और धान की पैदावार में 13 प्रतिशत कमी दर्ज हुई। इसके अतिरिक्त गेहूं और धान के दानों में क्रमशः 17 और 11 प्रतिशत नाइट्रोजन की कमी भी दर्ज हुई ज़िससे दानों में प्रोटीन की कमी होना स्वाभाविक है।
ज्ञात रहे कि सरकारी संस्था ने 2021 में तरल नैनो यूरिया का विपणन इस दावे के साथ शुरू किया था कि इसकी 4 प्रतिशत नाइट्रोजन से युक्त 500 की बोतल 50 किलो परंपरागत यूरिया (46 प्रतिशत नाइट्रोजन) के एक बैग के बराबर है। इसके विपणन के लिए केन्द्र और राज्य सरकारों द्वारा खूब प्रचार के बावजूद नैनो यूरिया अभी तक किसानों और कृषि वैज्ञानिकों का विश्वास नहीं जीत पाया। यह न तो फसल के लिए लाभकारी सिद्ध हुआ और न ही वैज्ञानिक कसौटी पर खरा उतरा।
करीब 140 करोड़ मानव आबादी वाले भारत की खाद्य सुरक्षा पिछले 50 वर्षों से मुख्यत: गेहूं और धान फसल के उत्पादन पर आधारित रही है। ज़िनमें मात्र 5-10 प्रतिशत की कमी से ही, देश में खाद्य सुरक्षा के खतरे की घंटी चुनौती पैदा हो जाती है और सरकार गेहूं आयात करने और चावल निर्यात रोकने पर मजबूर हो जाती है। ऐसी परिस्थिति में बिना उचित वैज्ञानिक परीक्षण किये नैनो उर्वरकों पर जल्दबाजी राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा के लिए बड़ी चुनौती बन सकती है। ऐसे उर्वरकों को दूसरे उर्वरकों के साथ, कम्पनियों द्वारा बेचना किसानों के हित में नहीं कहा जा सकता है।
कृषि वैज्ञानिक इस नैनो उर्वरक का विरोध शुरू से कर रहे हैं। अंतर्राष्ट्रीय अनुसंधान ज़र्नल ‘प्लांट सॉयल’ के अंक 10 अगस्त, 2023 में अंतर्राष्ट्रीय वैज्ञानिकों मेक्स फरेंक और सौरेंन हस्टीड ने रहस्योद्घाटन किया है कि नैनो यूरिया के दावे तथ्यहीन हैं। इसके विपणन के लिए प्रचार से देश की खाद्य सुरक्षा और किसानों में कृषि विज्ञान अनुसंधान में विश्वास कम होने की संभावना है।
इसी तरह की आशंका देश के प्रतिष्ठित कृषि वैज्ञानिकों ने पहले भी व्यक्त की है। ज़िनके अनुसार तकनीकी तौर पर नैनो यूरिया पारंपरिक दानेदार यूरिया का विकल्प नहीं बन सकता और न ही कृषि विश्वविद्यालयों व संस्थानों ने इसे अपनी फसलों की समग्र सिफारिश में अनुशंसित व शामिल किया है।
आर्थिक तौर पर भी नैनो यूरिया किसान हितैषी नहीं है, क्योंकि आधे लीटर नैनो यूरिया का दाम 240 रुपये है जो कि पारंपरिक दानेदार यूरिया के एक बैग यानी 45 किलो के दाम के लगभग बराबर ही है। इन सब तथ्यों के बावजूद, नैनो यूरिया का प्रचार गलत है। इसका वार्षिक लगभग 5 करोड़ बोतल उत्पादन और किसानों को दूसरे उर्वरकों के साथ जबर्दस्ती बेचना हितकारी नहीं है। कृषि रसायन विज्ञान के अनुसार, रासायनिक रूप में एक बैग यानी 45 किलो पारंपरिक यूरिया में 46 प्रतिशत नाइट्रोजन होती है, जिसका मतलब है कि 45 किलोग्राम यूरिया में लगभग 20 किलोग्राम नाइट्रोजन होती है। इसके विपरीत, 500 मिलीलीटर नैनो यूरिया में 4 प्रतिशत नाइट्रोजन की दर से मात्र 20 ग्राम नाइट्रोजन होती है यानी दानेदार यूरिया के मुकाबले हजार गुना से भी कम नाइट्रोजन नैनो यूरिया में होती है। तब जाहिर सी बात है कि नैनो यूरिया की 20 ग्राम नाइट्रोजन दानेदार यूरिया की 20 किलोग्राम नाइट्रोजन की भरपाई कैसे कर सकती है। जहां तक नैनो यूरिया के फसलों के पत्तों पर छिड़काव के कारण ज्यादा प्रभावशाली होने के दावों की बात है तो दानेदार यूरिया भी पूरी तरह से पानी में घुलनशील होने से 2-5 प्रतिशत छिड़काव की सिफारिश पहले ही की हुई है, यानी जो तथाकथित लाभ 240 रुपये दाम वाले आधा लीटर नैनो यूरिया छिड़काव से मिल सकता है, उसे किसान मात्र 12 रुपये दाम के 2 किलो पारम्परिक यूरिया प्रति एकड़ छिड़काव द्वारा पहले से ही ले रहे हैं। कृषि विज्ञान के अनुसार, पौधों को प्रोटीन बनाने के लिए नाइट्रोजन की आवश्यकता होती हैं। भूमि में नाइट्रोजन की कमी से अनाज, तिलहन, आलू आदि फसलों की उन्नत किस्मों के उत्पादन में 50-60 प्रतिशत तक की कमी देखी गई है। अंतर्राष्ट्रीय खाद्य और कृषि संगठन के मानदंडों के अनुसार भी 25 क्विंटल अनाज प्रति एकड़ उत्पादन के लिए 62 किलो नाइट्रोजन चाहिए जो 130 किलो यूरिया प्रति एकड़ डालने से मिलेगी।
तीन सितम्बर, 2022 के एक राष्ट्रीय अंग्रेजी दैनिक में छपे लेख में चौधरी चरण सिंह हरियाणा कृषि विश्वविद्यालय हिसार से मृदा विज्ञान के सेवानिवृत्त प्रो़ एनके तोमर ने कहा, भले ही काल्पनिक रूप में, आधा लीटर नैनो उर्वरक 100 प्रतिशत प्रभावी रूप से पौधों को उपलब्ध हो, लेकिन यह केवल 368 ग्राम अनाज पैदा करेगा। इसलिए, नैनो यूरिया पर किये जा रहे सरकारी प्रयास सार्वजनिक धन की बर्बादी है। नैनो यूरिया पर दावे निराधार हैं। इस बारे प्रोफेसर तोमर द्वारा नीति आयोग को लिखे पत्र का सरकार ने अभी तक कोई जवाब नहीं दिया।

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लेखक का यह अपना नजरिया है।

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