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बरगद का फूल

07:11 AM Mar 03, 2024 IST
बरगद का फूल
चित्रांकन : संदीप जोशी
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राजेंद्र कुमार कनौजिया

बहुत बड़ा हो गया है, जड़ें तो और भी मज़बूत हैं, दूर-दूर तक फैली हुई हैं। पहले ही कहा था, काट दो वरना अपना क़ब्ज़ा कर लेगा। अब तो इसकी जड़ें घर में ही घुस गई हैं। काटना ही पड़ेगा इसको।
घर के सारे लोग, एक मीटिंग कर रहे, कुछ तो कड़ा निर्णय लेना होगा। सर्दियों में न तो धूप आती है, न बारिशों में पानी, ऊपर से हर समय पत्ते, चिड़ियों के पंख की गंदगी। कितनी सफ़ाई की जाये रोज ही।
कमाल की बात तो ये थी कि जिस पेड़ की समस्याओं को गिनाया जा रहा था, सारे लोग उसी पेड़ की ठण्डी छांव के नीचे बैठे थे।
बरगद का पेड़ इस समय भी ऑक्सीजन दे रहा है, इस समय भी छाया दे रहा है, हमारी सुरक्षा कर रहा है। जिस समय उसे काट देने की तैयारी हो रही है। इतने बरसों तक ये हमारे जीवन का हिस्सा रहा, जिसने माना कि इतने दिनों में फल नहीं दिये, फूल नहीं दिये लेकिन छांव दी। भरोसा दिया कि घर सुरक्षित रहेगा, उसकी जड़ों ने जैसे घर को सम्भाला, पाला-पोसा।
दादा जी चुपचाप अपनी खाट लेकर, बरगद के नीचे सोने की तैयारी कर रहे हैं। सुबह, शाम उसी जगह सोते, पेड़ की ठंडी हवा में, बच्चे जब पेड़ पर झूला डालते सबको अच्छा लगता, झूले की आवाज़ खिलखिलाते बच्चों की आवाज़ पूरे माहौल पूरे मोहल्ले में एक नई तरंग उठती, सारा मोहल्ला ख़ुशियों से भर जाता है।
हर त्योहार इस पेड़ के नीचे मनाया जाता, महिलायें इस पेड़ के नीचे बने चौबारे पर शाम-सुबह को इकट्ठा होकर पूजा-पाठ करतीं, मंगल गीत गातीं, पेड़ के चारों ओर बंधे कच्चे धागे पूरे मोहल्ले को जोड़ने का काम करते। हर बिरादरी धर्म सबको।
रिटायरमेंट के बाद लोगों की टोलियां इस पेड़ के नीचे दिनभर ताश खेलती, कैरम बोर्ड की गोटियां चटकने लगतीं। हर हंसी-मज़ाक़ जोक का तमाशबीन रहा है, ये बरगद का पेड़।
न जाने कितनी डोलियां उठी हैं यहां से, कितनी बहुयें डोली से उतरीं तो बरगद को हाथ जोड़कर। बहुयें सास बनी, बच्चे पिता, पिताजी दादा जी, जीवन का हर रंग इस पेड़ की हरियाली के साथ मिल गया, एक नया रंग बन गया। जो पत्तों से छन-छनकर ज़मीन पर बिखरा, तो आसमान की रोशनी में सुबह-शाम बनकर घुल गया, जैसे कोई रंगीन पतंग जो बरसों से उड़ रही है। लेकिन आज जाने कैसे परिवार की मीटिंग में चर्चा इस बात पर हो रही है कि ये अचानक बेकार, बेफायदा और तकलीफ़देह हो गया है।
इन सब बातों से बेख़बर, सत्तर साल के दादा जी बरगद की छांव में बैठे कोई गीत गुनगुना रहे हैं, ये उनके जीवन का पसंदीदा स्थान है। जब दादी थीं तब दोनों अक्सर यही बैठे मिलते, सर्दियों में कभी मटर छीलते तो गर्मी में ख़रबूज़े, तरबूज़ या आम खाते मिल जाते थे। दोनों बातें करते हंसते बोलते, कभी-कभी लड़ते-झगड़ते भी। ये बरगद का पेड़ हमेशा से दादाजी का दोस्त रहा है।
कहते हैं, ईश्वर ने सब कुछ बनाया, हमारे लिये, इस दुनिया में हर जीव-जंतुओं के लिये। नदी से हर जीव-जंतु पानी पीता है तो खेतों को पानी भी मिलता है, अन्न उगाया जाता है, तब फिर से हम सब उस से जीवित रहते हैं। सब निश्चित रूप से रचा-बसा है, विज्ञान ने कितना भी विकास किया लेकिन एक छोटा-सा बीज भी नहीं बना पाया, जो पानी, मिलते ही ज़मीन फाड़कर निकल आये। दो पत्तों से चार फिर दस फिर सैकड़ों-हज़ारों और लाखों-करोड़ों पत्ते, फल बीज और नया पेड़।
चिड़िया, हवा बीज को एक स्थान से दूसरे पर ले जाते हैं, ज़मीन उसे अपनी बांहों में सम्भाल लेती है, पेड़ फलता-फूलता है। लेकिन इस बरगद का रिश्ता सीधे-सीधे दादा जी से रहा। बचपन में उन्होंने ने घर के साथ वाली ज़मीन पर इस बीज को उठाकर गाड़ दिया था। कुछ दिनों तक पानी दिया फिर प्रकृति ने इसे अपने हाथों में सम्भाल लिया था। छोटा-सा पौधा आज एक बड़ा पेड़ बन गया था। वो भी पचास साल पुराना विशेष वृक्ष, संरक्षण का प्रतीक बन गया। बरसों पुराना पेड़ आज अनावश्यक, अनुपयोगी हो गया, इतना बेकार कि घर वाले उसे काट कर उसका अस्तित्व ही समाप्त कर देना चाहते हैं, जैसे की परिवार के लिये दादा जी। घर में इतनी महत्वपूर्ण बहस चल रही है, लेकिन दादा जी इन सब से बेख़बर खाना खाने के बाद अपनी चारपाई पेड़ के नीचे लगा कर बैठे हैं। कोई गीत गुनगुना रहे हैं।
‘सजनवा बैरी हो गये हमार, चिट्ठिया हो तो हर कोई बांचे भाग ना बांचे कोई, सजनवा बैरी हो गये हमार, सजनवा बैरी हो गये हमार।’
पता नहीं लगता है, समझ गये हैं कि क्या होने वाला है। किसी अनिष्ट से या तो भयभीत हैं, या खुद को तैयार कर रहे हैं। घर में दिन के समय सब निश्चित हो गया है, पेड़ किस दिन काट दिया जाएगा। दादा जी परेशान हैं, लेकिन बेबस किस से बात करें, कौन समझेगा, अव्वल तो कोई बात भी करने को तैयार नहीं है। वो बहुत बेचैन हैं। रात के समय जब सभी लोग बैठे थे, वो अन्दर आ गये। सब उनको देख रहे थे।
‘मुझे आप लोगों से कुछ बात करनी है, सुना है आप लोग इस बरगद के पेड़ को काटने वाले हो, बहुत तकलीफ़ देने लगा है ये।’
सब चुप हैं, क्या बोलें समझ नहीं आ रहा है।
‘इस पेड़ को मैं लाया था, जब मैं ख़ुद बच्चा था। ये मेरे साथ ही बड़ा हुआ है, मेरा इसके साथ एक नाता है, मेरा जीवन इसके साथ जुड़ा हुआ है। मेरी प्रार्थना है, इसे न काटें, तुम्हारी मां ने इसकी पूजा की है। तुम लोगों का बचपन बीता है, इसकी छांव में। तुम्हारी मां के जाने के बाद ये ही तो मेरा साथी रहा है, गर्मी में इसने हम पर छाया की है, बारिश में मेरे साथ मज़ाक़ करता है, सोते-सोते मुझ पर बारिश की छींटे डाला है इसने, जब तुम्हारी मां ने इसकी चारों ओर रंगीन धागे बांधे हैं, तब उसे ये विश्वास रहा कि सब कुछ सुरक्षित है। सब लोग चुप थे, कोई कुछ नहीं बोला। दादा जी ने क्या-क्या नहीं कहा, कितनी मिन्नतें कीं कि ये मेरे जैसा ही घर का बुजुर्ग है, इस घर का साथ दिया है अपना अच्छा समय, बहुमूल्य ऑक्सीजन, छाया, सुरक्षा और भी न जाने क्या-क्या। तुम उसको मिटा देना चाहते हो काट देना चाहते हो।
‘दादा जी, इस पेड़ को काट कर जो जगह निकलेगी, वहां कुछ कमरे बनाये जा सकेंगे, हमारा परिवार बढ़ रहा है, जगह कम हो रही है। क्या करें हमें भी अच्छा नहीं लगता, लेकिन क्या करें, हम इसकी जगह दूसरा पेड़ लगा देंगे कहीं और, इसको उतना ही काटेंगे जितनी ज़रूरत है।’
दादा जी चुप हैं, कुछ नहीं कहते। परिवार के अन्य लोग भी शान्त हैं, किसी को कुछ नहीं समझ में आ रहा। धीरे-धीरे दादा जी को भी महसूस हो रहा था, सच ही कहते हैं, मेरे बच्चे बढ़ते परिवार, उनकी ज़रूरतों ने उन्हें मजबूर कर दिया है। पहले का समय अलग था, अब नया जमाना है सब कुछ बदल रहा है, सभी को बदलना होगा। बच्चों की ख़ुशी में ही तो हमारी ख़ुशी है।
कुछ महीनों बाद घर बड़ा हो गया है, चार कमरे, वॉश रूम, आंगन। घर की डिज़ाइन इस तरह बनी है कि वो घर के बीचोंबीच आ गया है, आंगन में पेड़ बड़ी शान से अपनी बांहें, फैलाये खड़ा है। परिवार बड़े हो रहे हैं, हम लोग लाख चाहें लेकिन बढ़ती जनसंख्या ने जगह कम कर दी है, चाहे वो घर हों या दिल, सब कुछ सिमट गया है। संयुक्त परिवार की अहमियत पर बहुत बहस करने के बावजूद रिश्तों में प्यार सिर्फ़ सोशल मीडिया पर ही रह गया है, प्रकृति की सुरक्षा परिवर्तन, प्रगति और शहरों के सीमेंट के जंगल बन जाने से रुक गया। बड़े-बड़े पेड़ जो पूजे जाते थे, वो बड़ी-बड़ी इमारतों के सामने बौने हो गये, पेड़ कॉलोनी के नीचे रह गया, घरों की मंज़िलें आसमान छूने लगीं। ऑक्सीजन बॉटल में बिकने लगी, तो हवा को स्वच्छ कैसे करेंगे।
लेकिन इन सब बातों से अलग दादा जी, अपने बड़े से घर के बहुत बड़े आंगन में आराम से बैठे बरगद के पेड़ को निहार रहे हैं, जैसे कह रहे हों ‘इस बार तो बच गई जान, कब तक बचाऊंगा तुझे, देख ले कहीं नक़ली पेड़ आक्सीजन देने लगे तब तो तेरी ख़ैर नहीं बच्चू। अब सबको जगह की कमी महसूस हो रही है, धरती छोटी पड़ने वाली है, कहां जाओगे तुम सब पेड़, पौधे, जंगल सब काट दिये जायेंगे। हमें बहुत से कमरे बनाने हैं, लाखों-करोड़ों घर बनाने है। जाओ लौट जाओ, कोई नहीं बचाने वाला तुम सब को, जाओ चले जाओ, अगर तुम किसी काम के नहीं हो तो तुम्हारी कोई जगह नहीं रही। बहुत जल्दी ही धरती से सारा पानी, फल, फूल, ज़मीन सब समाप्त हो जायेगी। जो भी हो देखा जायेगा।’
दादा जी पता नहीं क्यों ज़ोर से हंस रहे हैं, बहुत ज़ोर से। बहुत देर तक ज़ोर से हंसते रहे। पता नहीं क्यों, या शायद बहुत देर तक रो रहे थे। सुबह-सुबह दादा जी की आंख खुली तो देख कर अचरज में पड़ गये, बरगद के पेड़ की फुनगियों पर छोटे छोटे से फूल निकल रहे हैं।
‘अबे डर गया क्या, अब तक तो तेरी पत्तियों में कोई फूल नहीं टूटा, इतनी जल्दी। हम सब की धरती है, घबरा मत मिल कर साथ ही रहेंगे। चल मुस्कुरा दे। सुन मैं तो बूढ़ा हो गया, कुछ दिन और सही, लेकिन मैं चाहता हूं कि ईश्वर तेरी रक्षा करें, तू हज़ारों साल तक ज़िन्दा रहे, घर की रखवाली करे, बच्चों को देखें भाले।
दादा जी थोड़ी देर पेड़ को देखते रहे, फिर लेट गये।
अचानक एक पत्ता उनके सिर पर टप्प से गिर पड़ा, उन्होंने गर्दन उठाई और हंसे, ‘कटेगा, मैंने बचा लिया, मुझसे शैतानी।’
जैसे सारी सृष्टि हंस रही है।

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