संघ-भाजपा में तालमेल
भले ही प्रसंग राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के सौ साल पूरा होने का हो, लेकिन प्रधानमंत्री के रूप में नरेंद्र मोदी की संघ के मुख्यालय की पहली यात्रा के गहरे निहितार्थ भी हैं। जो इस बात का संकेत है कि पिछले आम चुनाव के दौरान संघ व भाजपा के रिश्तों में जिस खटास की बात कही जा रही थी, वह संवाद व संपर्क से दूर कर ली गई है। जो इस बात का भी संकेत है कि आने वाले वक्त में पार्टी व सरकार के अहम फैसलों में संघ की भूमिका बढ़ सकती है। यूं तो प्रधानमंत्री ने बीते रविवार को नागपुर यात्रा के दौरान विभिन्न कार्यक्रमों में भागीदारी की, लेकिन उनका प्रधानमंत्री के रूप में संघ मुख्यालय पहुंचना खास चर्चा में रहा। उल्लेखनीय है कि चौथाई सदी पहले संघ मुख्यालय पहुंचने वाले अटल बिहारी वाजपेयी पहले प्रधानमंत्री थे। इसमें कोई दो राय नहीं है कि मोदी भी संघ की पृष्ठभूमि से आते हैं। साथ ही वे संघ की रीति-नीतियों से भली-भांति परिचित हैं। लेकिन पिछले आम चुनाव के दौरान भाजपा के कुछ वरिष्ठ नेताओं के ऐसे बयान चर्चाओं में थे कि पार्टी का कद संघ से बड़ा हो गया है। जिसके चलते संघ व भाजपा के रिश्तों में कुछ कसक देखी गई। जिसकी कुछ इस तरह व्याख्या की गई कि पार्टी जिस तरह चार सौ पार के लक्ष्य से चूकी, उसके मूल में संघ कार्यकर्ताओं की उदासीनता रही है। बाद में दोनों के रिश्ते सामान्य होने के बाद हरियाणा, महाराष्ट्र व छत्तीसगढ़ के विधानसभा चुनाव में भाजपा को जो आशातीत सफलता हाथ लगी, कहा जा रहा था कि उसमें संघ कार्यकर्ताओं का समर्पण व योगदान महत्वपूर्ण घटक रहा। अब संघ मुख्यालय में प्रधानमंत्री की यात्रा से यह तथ्य भी उजागर हुआ कि दोनों की रीतियों-नीतियों फिर से बेहतर तालमेल स्थापित हुआ है। अब राजनीतिक पंडित कयास लगा रहे हैं कि आने वाले दिनों में केंद्र सरकार के फैसलों में संघ के दृष्टिकोण का प्रभाव नजर आएगा।
वहीं दूसरी ओर कहा तो यहां तक भी जा रहा है कि आने वाले दिनों में भाजपा अध्यक्ष के चुनाव में संघ की भूमिका हो सकती है। ऐसा ही असर बदलते वक्त के साथ पार्टी के अन्य फैसलों पर भी नजर आ सकता है। यानी दोनों अब सामंजस्य व सहजता के साथ आगे बढ़ेंगे। अर्थात पार्टी अब अपने वैचारिक स्रोत के साथ बेहतर तालमेल करके चलना चाहेगी। यही वजह है कि प्रधानमंत्री ने संघ मुख्यालय में कहा कि संघ का विचार बीज अब वट वृक्ष का रूप ले चुका है। उन्होंने संघ कार्यकर्ताओं के योगदान की चर्चा करते हुए संघ को भारतीय संस्कृति का विशाल वट वृक्ष बताया। बहरहाल, भाजपा संघ से कुछ मुद्दों पर असहमति से आगे निकल चुकी है। उल्लेखनीय है कि आम चुनाव परिणाम के बाद संघ प्रमुख ने नसीहत दी थी कि लोगों की सेवा करने वाले एक सच्चे सेवक में अहंकार नहीं होना चाहिए। उनकी यह टिप्पणी कतिपय उन नेताओं की तरफ इशारा भी था जिन्होंने कहा था कि पार्टी बड़ी हो गई है और उसे संघ की पहले की तरह जरूरत नहीं है। इसके बाद संघ ने अपने महत्व का अहसास पार्टी को कराया। जिसका राजनीतिक लाभ भाजपा को कुछ राज्यों के विधानसभा चुनावों में मिला भी। बहरहाल, प्रधानमंत्री मोदी द्वारा नागपुर यात्रा के दौरान की गई टिप्पणियों का निष्कर्ष यह भी है कि संघ परिवार की अब सरकार व पार्टी में भूमिका बढ़ सकती है। राजनीतिक पंडितों को तब आश्चर्य नहीं होगा यदि पार्टी के नये अध्यक्ष के चयन में संघ की मोहर लगे। यह भी हकीकत है कि लोकसभा चुनाव में अपने बलबूते पूर्ण बहुमत से दूर रहने के कारण पार्टी की सहयोगी दलों पर निर्भरता बढ़ी है। जिसके चलते भाजपा अपनी सुरक्षा को मजबूत करने के लिये संघ पर अधिक निर्भर रहेगी। निर्विवाद रूप से आने वाले समय में पार्टी को पंजाब, केरल और पश्चिम बंगाल जैसे राज्यों में कठिन परीक्षा से गुजरना होगा। ऐसे में भगवा पार्टी को अगले दो वर्षों में बड़ी सफलता हासिल करने के लिये संघ पर निर्भर रहना पड़ेगा। जहां संघ अपनी आधार भूमि को विस्तार दे रहा है।