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मुखर मौन संवेदना

09:01 AM Nov 05, 2023 IST
मुखर मौन संवेदना
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कहानी

अरुण नैथानी

सत्य घटना पर आधारित आधारशिला साहित्यम की ओर से प्रथम पुरस्कार प्राप्त कहानी

जाने कब शेरू परिवार का अभिन्न हिस्सा बन गया पता ही नहीं चला। एक दशक पहले आनन्द जब इस कालोनी में आया था तो कालू, लालू, नंदू व ऐशू नाम ही गली में गूंजा करते थे। हां, नंदू जरूर तब गुंडे जैसा ही था और उसकी दबंगई पूरी गली में खूब चलती थी। उसके मुकाबले में लालू था, जिससे उसकी खूब मार-धाड़ चलती थी। शायद इसी लड़ाई के बीच में शेरू की एंट्री हुई थी। लगा जैसे नंदू ने भी उसके समर्पण को स्वीकार कर अभयदान दे ही दिया। किसी को ये नहीं पता चला था कि आखिर शेरू आया कहां से, लेकिन वह हर किसी से घुल-मिल जाता था। धीरे-धीरे आने वाले कुछ सालों में नंदू,लालू और कालू उम्र पूरी कर गये। रह गया तो सिर्फ शेरू। साथ में उसकी उम्रदराज सहयोगी ऐशू। शेरू का तो अब पूरी गली में राज हो गया था। एक छोर से दूसरे छोर तक। मध्य वर्गीय परिवारों की कॉलोनी थी। आधुनिकता की ओर उन्मुख पीढ़ी में पुराने संस्कार बाकी थे। परंपरा, सेवा, जीवों की फिक्र व सामंजस्य के भाव बाकी थे। ऐसे में शेरू बच्चों में आसानी से घुल-मिल जाता था। जब बच्चों की टीम खेलने जाती तो शेरू उन्हें लेकर पार्क तक जाता। जब तक वे खेलते वो फिर कुछ न कुछ उछल-कूद करता रहता। फिर उनके साथ ही वापस गली में लौटता।
धीरे-धीरे शेरू ने तो पूरी गली को अपना घर समझ लिया था। रातभर गली की चौकीदारी करता था, वो भी बिना मेहनताने के। मजाल है कि कोई अंजान आदमी रात को गली में फटक जाए। संवेदनशील इतना कि गेट खुलने पर समझ जाता कि किस घर का गृहस्वामी बाहर निकला है। कई किलोमीटर दूर से समझ जाता था कि कौन व्यक्ति कॉलोनी में आ रहा है।
जब शेरू बड़ा होने लगा तो सबसे पहले आनन्द ने उसके दो टाइम के खाने की व्यवस्था की थी। वैसे तो और भी खाने के दावेदार थे, लेकिन शेरू छोटा था तो उसका विशेष ख्याल रखा जाता। आनन्द का यह शौक पुराना था। रोज रसोई में कई प्राणियों की रोटी बनती थी। कोई आधा किलो दूध में मिलाकर दी जाती। कई बार तो पत्नी उलाहना भी दे देती थी कि घर के लोगों के लिये उतनी रोटी नहीं बनती जितनी इनके लिये बनती है। लेकिन दो बात सुनाकर उनके लिये रोटी बनाती जरूर थी। लेकिन वहीं गली के कुछ लोगों को इन्हें खाना देना भी फूटी आंख न सुहाता था। दरअसल, आनन्द को बाहर से आता देखकर अति उत्साह में इतराकर शेरू आने-जाने वालों पर प्रतिक्रिया देता। कुछ तो डर जाते थे। कई बार तो लोगों ने इन्हें खाना देने का खुलकर विरोध भी किया था। लेकिन धीरे-धीरे उसकी स्वीकार्यता गली में बढ़ने लगी थी। अब अधिकांश लोग उसे प्यार करने लगे थे। वह भी रात-बेरात सबका ख्याल रखता। खासकर रात को खासा चौकन्ना रहता।
उस दिन गली में तूफान से पहले जैसी शांति थी। किसी ने नगर निगम में शिकायत कर दी कि शेरू कटखना हो गया है। आरोप लगाए गए कि कई लोगों को काट चुका है। कल भी शिकायत के दबाव के बाद नगर निगम की गाड़ी गली में घूमी थी। विभाग के मुस्टंडे कल घंटों गली में शेरू को ढूंढ़ते रहे थे। कल तो ज्योत्सना ने उसे अपने आंगन में छिपा दिया था। वैसे तो शेरू इतना समझदार था कि निगम की गाड़ी की आवाज भी दूर से सुन-समझ लेता था। बल्कि उस जैसा कोई वाहन किसी दूसरे विभाग या वाणिज्यिक कंपनी का आता तो भौंकने लगता था। फिर भय से लगातार कई घंटों वह भौंकता ही रहता था।
वैसे तो शेरू कटखना नहीं था। वह तो हर पुराने बाशिंदे से घुल-मिलकर परिवार का सदस्य बन जाता था। बच्चों के साथ तो उसकी खूब छनती थी। बच्चे उसके ऊपर खेलते रहते थे, किसी को आज तक नहीं काटा। लेकिन शेरू को गली में बाहरी आदमी बर्दाश्त नहीं था। वह बिना आधार कार्ड के बता देता कि बंदा नया आया है या पुराना बशिंदा है।
दरअसल, शेरू कुछ साल पहले नरक जैसी यातना भोग आया था। नगर निगम की गाड़ी उसे पकड़ ले गई थी। उसकी नलबंदी हुई थी। पहचान के प्रतीक के रूप में उसके कान का एक हिस्सा भी काटा गया था। सही मायनों में तो ये क्रूरता थी, लेकिन कहे कौन। फिर बीस दिन बाद शेरू यातनागृह से लौटा था तो सूख के कांटा हो गया था। नगर निगम वाले कौन-सा खाने-पिलाने को पकड़ते हैं। अब तो जब भी कोई वैसी गाड़ी गली में आती तो शेरू डर से कांपने लगता था। अब तो वह दो दिन पहले आई गाड़ी के भय से कांप रहा था। वाकई हर जीव को अपनी जिंदगी प्यारी होती है। कल से उसने खाना-पीना भी कम कर दिया था। लगता था उसे तो बस यही डर सता रहा है कि कहीं पिछली बार की तरह ही पकड़ा न जाऊं।
आनंद सोच रहा था ये भी क्या जीव है। रूखा-सूखा खाकर उपकार मानने लगता है। उसे याद आया कि जब देर रात वह आफिस से लौटता तो शेरू और ऐशू उसका इंतजार करते थे। उसे याद आया वो दिन जब कॉलोनी के बड़े गेट पर देर रात ताला लग गया था, उसे स्कूटर बाहर ही छोड़ना पड़ा था। तो सुबह शेरू उस स्कूटर के पास बैठ उसकी रखवाली करता दिखा। आनंद जब भी बाहर से आता स्कूटर-कार की आवाज सुनकर शेरू उत्साह-उमंग से भर जाता, भले ही आनंद के आने पर घर में मोबाइल पर लगे बच्चे अपनी दुनिया में मस्त रहते हों।
वाकई ये विडंबना ही है कि श्वान के सारे गुणों को लोगों ने आज गाली बना दिया है। लेकिन उसके हर भाव में कृतज्ञता का भाव होता है। वह पूंछ भी हिलाता है तो स्वार्थ से नहीं, प्यार से। और कैसी आत्मीय अभिव्यक्ति हो सकती है इस मूक की? उसके पास हमारे जैसे शब्द तो हैं नहीं, वह तो भौंककर, उछल-कूदकर, कूं-कूं करके व पूंछ हिलाकर अपने भावों को अभिव्यक्त करता है। एक तरह से किसी को काट देना भी तो उसी की आक्रोशित अभिव्यक्ति का ही हिस्सा होता है। इंसान भी तो रोज गोली-चाकू, जहर बुझे शब्द बाण और न जाने कितने क्रूर तरीके से प्रतिक्रिया देकर इनका दूसरों पर अपने प्रतिशोध के रूप में इस्तेमाल करता रहता है। ग्लोबल वार्मिंग इन जीवों के लिये भी तो है। तेज गर्मी, सर्दी और अतिवृष्टि के कारण इनके मूड स्विंग को अंजाम देती है।
दरअसल, पिछले दिनों कॉलोनी की फिजा बदली हुई थी। विभाग ने नीति बदलकर नये कर्मियों को भी मकान कालोनी में दे दिये थे। पुराने कर्मचारी बड़ी संख्या में रिटायर हो चुके थे। सो बड़ी संख्या में कालोनी में मकान खाली पड़े थे। तमाम नये लोग और उनके परिजन आ रहे थे। शेरू समझ नहीं पा रहा था कि ये क्या माजरा है। ये कौन लोग आ रहे थे? गली की रखवाली करते हुए उसे दस साल हो गये थे, लेकिन ऐसा कोलाहल उसने कभी महसूस नहीं किया था। सो अपने इलाके में नये-नये लोगों को देखकर शेरू बौखला रहा था। तिस पर नए आए व्यक्ति ने उसे दुत्कार दिया तो वह इसे बर्दाश्त न कर सका और उसे अपने तेवर दिखा दिये। फिर विघ्नसंतोषियों ने शेरू की शिकायत कर दी कि वह कटखना हो गया है।
आज तीसरे दिन फिर नगर निगम के कर्मचारी शेरू को पकड़ने आए। गाड़ी आते देख ज्योत्सना जोर से चीखी, ‘अंकल शेरू को छिपा दो, उसको पकड़ने वाले आ रहे हैं।’ आनंद ने उसे आश्वासन दिया कि भले ही शेरू बौखलाया हुआ है, फिर भी हम उसे भीतर बुला लेंगे। जैसा वह दिवाली के पटाखे छोड़े जाने पर भयभीत होने पर खुद को घर के भीतर कैद कर लेता था।
इसी बीच नगर निगम की डॉग स्कवाड के मुस्टंडों ने चारों तरफ से शेरू को घेर लिया। वे भी शेरू से ज्यादा बौखलाए हुए थे क्योंकि तीन दिन से शेरू उनके जाल में नहीं फंसा था। मोहल्ले में शेरू को चाहने वालों की भीड़ जुटने लगी थी। लोग उस बंदे को ढूंढ़ रहे थे जिसने प्रशासन से शेरू की शिकायत की थी। ज्योत्सना, धर्मवीर, जश और आनंद समेत शेरू के तमाम चाहने वाले एकत्र होने लगे। उनसे जाल में तड़पता शेरू देखा नहीं जा रहा था। खुद को आजाद करने की कोशिश में शेरू लगातार नायलॉन का जाल खींच रहा था। उसके दांतों से खून रिस रहा था।
यह देखकर धर्मवीर तैश में आ गए। बोले- ‘इसे इंजेक्शन लगाकर जल्दी छोड़ देना, वरना हम भी कार्रवाई करने से पीछे नहीं हटने वाले।’ धर्मवीर के सुर में ज्योत्सना भी बोली- ‘अंकल आप शेरू को छोड़ तो दोगे ना? अपने ऑफिस का फोन नंबर देकर जाओ।’ सभी उम्मीद कर रहे थे कि शेरू जल्दी लौट आएगा।
आज गली उदास थी। ऐशू ने भी आज खाना नहीं खाया। उसे भी इस भय का अंदाजा था क्योंकि वह भी निगम कर्मियों के चंगुल से छूटी थी। शेरू व ऐशू रात को साथ-साथ गली में पहरा देते। पिछले साल जब बाहर के आवाराओं ने गली में ऐशू पर हमला बोला तो शेरू ने उन्हें दूर तक खदेड़ा था। आज गली के बच्चे खेलने तो निकले मगर उनका मन खेलने में नहीं लग रहा था। उन्हें शेरू के साथ खेलना अच्छा लगता था। गली के सब लोग रह-रहकर शेरू को याद कर रहे थे कि कैसे वे उसके होते रात को चैन से सो पाते थे। बाहर सामान पड़ा रहता था, मजाल कोई सामान को हाथ लगा दे। अब तो पड़ोस की गली के ‘आवारा’ भी गली में दस्तक देने लगे थे। वे पहले शेरू के भय से गली में घुसने की हिम्मत नहीं करते थे। लेकिन अब तो गली में उन्हें भगाने वाला शेरू था ही नहीं।
आनंद शेरू के जाने से तो उदास था ही, लेकिन उसके सामने दूसरा संकट था। उसे कुछ ही दिन में ये घर खाली करना था। वह धर्म संकट में था कि पिछले दस साल से वो जिस शेरू को बच्चे की तरह पाल रहा था, वह लौटकर घर खाली देखेगा तो उसको दोहरा झटका लगेगा। इस घर में कोई दूसरा व्यक्ति आयेगा तो शेरू उससे भी वही प्यार की आस लगाएगा। न जाने दूसरा आदमी कैसा होगा। कहीं आते ही शेरू को दुत्कारना न शुरू कर दे। आनन्द इस स्थिति में नहीं था कि शेरू को साथ ले जाये। वैसे भी गली के प्राणी घरों में बंधकर रहते भी कहां हैं। फिर पॉश शहर के लोग भी तो अकसर विरोध करते हैं कि गली के इन लावारिसों को क्यों खाना खिलाया जाता है।
आनन्द के दिमाग में तीन साल पुराना वाकया याद आ गया जब शर्मा जी के बहू-बेटे ने बदतमीजी की थी कि क्यों आवारा जीवों को खाना देते हो, ये लोगों को काट सकते हैं। कई लोग उनसे शेरू को रोटी देने पर बदतमीजी कर चुके थे। लेकिन मन मसोस कर रह गये थे कि दुनिया में सब लोग कहां इतने संवेदनशील होते हैं कि जीवों को प्यार और भोजन दे सकें।
बहरहाल, गली शेरू के बिना उदास थी। जीवन तो चलना ही था। फिर वो दिन भी आया कि आनन्द को नये घर में जाना तय हो गया। सामान बंधने लगा। धीरे-धीरे नये मकान में ले जाया जाने लगा। अधिकांश सामान चला गया। पुराने घर में सिर्फ आनन्द ही बचा था। आखिरी फेरे का सामान बांधा जा रहा था। दोपहर हो गई थी। बच्चे आनन्द का खाना लेकर कार से सामान की आखिरी खेप ले जाने आ गये थे। हां, घर में चाय का सामान व दूध जरूर बचा था।
तभी जाली के दरवाजे पर खर-खर की आवाज हुई। अक्सर शेरू कुछ कहने के लिये जाली पर पंजे मारा करता था। आनंद यह देखकर भावविभोर हो गया कि शेरू खड़ा था। सूखकर आधा हो गया था। पकड़ने वाले कहां इन बेजुबानों को भरपेट खाना देते हैं। कैद का भय अलग से होता है। आनन्द ने शेरू के स्टील के कटोरे में दूध डाला। शेरू कभी दूध पी रहा था और कभी खाली हुए घर को टुकर-टुकर देख रहा था। आनन्द की आंख में आंसू थे कि कैद से छूटने के बाद गली के तमाम घर छोड़कर शेरू कैसे पहले मेरे ही घर में आया। निस्संदेह, जानवर भी आत्मीय अहसास कभी नहीं भूलते। वह नि:शब्द होकर शेरू को देख रहा था। जिसका शरीर भूख व भय के कारण पहले से आधा रह गया था।

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