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आत्ममंथन का वक्त

06:34 AM Mar 09, 2024 IST
आत्ममंथन का वक्त
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पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट ने हालिया किसान आंदोलन के तौर-तरीकों व सरकारों की कारगुजारियों को लेकर जो तल्ख टिप्पणियां की हैं, वे आंख खोलने वाली हैं। हरियाणा-पंजाब की सीमा पर विगत तीन सप्ताह से मोर्चा संभाले किसान आंदोलनकारियों के तौर-तरीके व उससे निपटने के सरकारों द्वारा उठाये गए कदम मर्यादित व्यवहार पर नये विमर्श की जरूरत बताते हैं। यह सर्वविदित है कि किसानों की दिल्ली कूच की कोशिशों और पुलिस प्रशासन की उन्हें रोकने के प्रयास में लगातार टकराव की खबरें आती रही हैं। जिनमें कई किसानों, पुलिसकर्मियों व अधिकारियों के घायल होने की भी बात कही गई। एक युवक की मौत की अप्रिय घटना भी सामने आई है। जिसको लेकर हाईकोर्ट की सख्त टिप्पणी भी सामने आई। निस्संदेह, यह घटनाक्रम परेशान करने वाला है और इससे आवागमन बाधित होने से आम लोगों को भी भारी परेशानियों का सामना करना पड़ा है। दोहराने की आवश्यकता नहीं है कि लोकतंत्र में हर किसी व्यक्ति को लोकतांत्रिक ढंग से अपनी मांगें उठाने का अधिकार है। सरकारों का भी दायित्व बनता है कि समय रहते किसी भी संगठन या वर्ग की न्यायोचित मांगों पर गंभीरता से विचार करें ताकि आंदोलनकारियों को सड़कों पर उतरने की जरूरत न पड़े। वहीं आंदोलनकारियों की जिम्मेदारी बनती है कि न्यायसंगत मांगों को लेकर आंदोलन तो करें, लेकिन आम लोगों की सुविधा व अधिकारों का ध्यान रखे। निस्संदेह, किसी भी व्यक्ति को लोकतांत्रिक आंदोलन करने व अभिव्यक्ति के अधिकार हैं। लेकिन किसी को निरंकुश व्यवहार की अनुमति नहीं दी जा सकती। साथ ही किसी आंदोलन की वजह से लंबे समय तक राष्ट्रीय राजमार्गों को भी अवरुद्ध नहीं किया जा सकता। कोर्ट की वह टिप्पणी विचारणीय है जिसमें बच्चों को आंदोलन के दौरान ढाल बनाने को पंजाब की संस्कृति के विपरीत बताया गया है। अदालत ने प्रश्न उठाया है कि किसान आंदोलन कर रहे हैं या जंग पर जा रहे हैं? कोर्ट ने खरी-खोटी सुनाते हुए कहा कि क्या हथियार लहराने वाले आंदोलन को शांतिपूर्ण कहा जा सकता है?
उल्लेखनीय है कि पंजाब-हरियाणा सीमा पर एमएसपी पर कानूनी गारंटी की मांग को लेकर गत तेरह फरवरी से किसान आंदोलनरत हैं। जिसमें बड़ी संख्या में महिलाओं व बच्चों की भी भागीदारी रही है। गत इक्कीस फरवरी को खनौरी बॉर्डर पर टकराव के दौरान बठिंडा के युवक शुभकरण की मौत हो गई थी। अब अदालत ने मामले में न्यायिक जांच के आदेश दिये हैं। हाईकोर्ट ने आंदोलन के दौरान संदिग्ध परिस्थितियों में मारे गए शुभकरण की मौत के मामले में जांच के लिये एक अवकाश प्राप्त न्यायाधीश समेत तीन सदस्यीय कमेटी को जिम्मेदारी सौंपी है। कमेटी में हरियाणा व पंजाब के एडीजीपी भी शामिल होंगे। हालांकि, अदालत में भी इस मुद्दे को लेकर हरियाणा व पंजाब सरकारों की दलीलें सामने आती रही हैं। एक ओर हरियाणा सरकार की तरफ से कहा जा रहा था कि कि पंजाब सरकार ने शुभकरण की पोस्टमार्टम रिपोर्ट नहीं दी। जिस पर कोर्ट का कहना था कि इस रिपोर्ट को देने में इतने विलंब की तार्किकता क्या है। बहरहाल, अदालत की सख्त टिप्पणियों के बाद किसान आंदोलनकारियों व सरकारों को अपनी रीति-नीतियों पर मंथन करना चाहिए। निस्संदेह, अदालती टिप्पणियां विचारणीय हैं कि जिन किशोरों को स्कूल में होना चाहिए, वे हथियारों के साथ क्यों नजर आ रहे हैं? यह भी कि बॉर्डर पर किसानों व सरकार के बीच टकराव के चलते युद्ध जैसे हालात क्यों हैं? अदालत ने हरियाणा सरकार द्वारा उपलब्ध चित्रों के आधार पर कहा कि लोग तलवार व तेजधार हथियारों के साथ देखे जा रहे हैं, क्या यह लोकतांत्रिक आंदोलन है? वहीं दूसरी ओर अदालत ने हरियाणा सरकार से पूछा कि खनौरी भारत-पाक की सरहद नहीं थी तो फिर किसानों पर गोलियां क्यों चलायी गई? साथ ही गोलियों और छर्रों के इस्तेमाल का विवरण मांगा। वहीं हरियाणा सरकार की तरफ से बताया गया कि हिंसक प्रतिरोध में बीस से अधिक पुलिसकर्मी घायल हुए हैं। कई बार चेतावनी के बाद पहले लाठीचार्ज, फिर आंसू गैस तथा बाद में वॉटर कैनन का प्रयोग किया गया। स्थिति न सुधरने के बाद रबड़ की गोलियां चलायी गई थीं। उम्मीद है, दोनों पक्ष बीच का रास्ता निकालेंगे।

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