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कृत्रिम बुद्धिमत्ता नियमन का हो संतुलित मार्ग

06:45 AM Mar 30, 2024 IST
कृत्रिम बुद्धिमत्ता नियमन का हो संतुलित मार्ग
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दिनेश सी. शर्मा

गूगल के आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस आधारित चैटबॉट जैमिनी को लेकर मचे हो-हल्ले ने इस तकनीक, इससे संबंधित नियामक तंत्र और सरकार की भूमिका को लेकर कई महत्वपूर्ण मुद्दों की ओर ध्यान खींचा है। एक व्यक्ति द्वारा इस चैटबॉट से प्रधानमंत्री और फासीवाद को लेकर पूछे सवाल का उत्तर शेयर करने के बाद सोशल मीडिया पर एआई टूल्स चर्चा का विषय बने हुए हैं। केंद्रीय सूचना प्रौद्योगिकी राज्य मंत्री ने तुरत-फुरत कहा कि प्रधानमंत्री पर विशेष रूप से पूछे गए सवाल का जवाब पक्षपातपूर्ण है और यह आईटी कानून एवं अन्य कानूनों के मुताबिक गैर-कानूनी सामग्री को, माध्यम बने व्यक्तियों या प्लेटफार्म्स द्वारा शेयर करना, नियमों प्रावधानों का उल्लंघन है। मंत्री के इस उत्तर के बाद मंत्रालय का परामर्श प्रपत्र जारी हुआ, जिसमें कहा गया कि उपभोक्ता को अंडर-टेस्टिंग या गैर-भरोसेमंद एआई मॉडल्स एवं सॉफ्टवेयर मुहैया करवाने से पूर्व भारत सरकार से विशेष अनुमति लेना जरूरी होगा।
भारत में एआई और अन्य नवीनतम तकनीकों को लेकर नियामक तंत्र और व्यवस्था की अनुपस्थिति में, पहले मंत्री की प्रतिक्रिया और फिर परामर्श प्रपत्र जारी करने वाले उपाय को अधिक से अधिक, समस्या बनने पर आनन-फानन में किया जुगाड़भर कहा जा सकता है। नई-नई तकनीक से बनने वाली नवीन स्थितियों से निपटने को लेकर सरकारों का इतिहास खराब रहा है। तकरीबन आधा सदी पहले तकनीक विकास महानिदेशालय बनाया गया था। इसने विदेशी तकनीक की आमद पर एक अति शंकालु चौकीदार की भूमिका निभाई। यह विभाग 1960 के दशक में अमेरिकी कॉर्पोरेशनों द्वारा भारत में इलेक्ट्रॉनिकी का उत्पादन शुरू करने संबंधी अनुमतियों को खारिज करने के लिए उत्तरदायी है। जब 1980 के दशक में टेक्सास इंस्ट्रूमेंट नामक कंपनी ने बेंगलोर से सैटेलाइट्स के जरिए सॉफ्टवेयर निर्यात करना शुरू किया (उस वक्त यह एकदम नई चीज़ थी) तब भारत सरकार के गृह मंत्रालय ने कहा कि जो कुछ भी भेजा जाए, उसका प्रिंटआउट जमा करवाया जाए, इस आधार पर कि कहीं राष्ट्र से संबंधित गुप्त सूचनाएं तो नहीं प्रेषित हो रही। प्रत्युत्तर में जो मिला, वह था 0 और 1 के रूप में बाइनरी इबारत से भरे कागजों का इतना बड़ा ढेर, जिससे कमरा भर जाए! वर्ष 1990 के दशक में, उद्योग मंत्रालय के एक बाबू ने वैक्सीन बनाने वाली एक कंपनी द्वारा लाइसेंस की अर्जी भारी उद्योग इंजीनियरिंग विभाग को विचारार्थ हस्तांतरित कर दी, क्योंकि उत्पादन विधि में ‘जेनेरिक इंजीनियरिंग’ प्रयुक्त किए जाने का जिक्र था! हमारी बाबूशाही की कार्यशैली को देखते हुए, कोई भी समझ सकता है कि गूगल, मेटा, एप्पल या ओपन एआई का भविष्य क्या होगा, जब वे अनुमति पाने में अपने एआई एलोरिदम का प्रिंटआउट आईटी मंत्रालय में बैठे बाबुओं को सौंपेंगे।
एआई को लेकर एकतरफा चलताऊ नीतिगत परामर्श प्रपत्र जारी करने की बजाय, नीतियां और नियामक धाराएं बनाने के विमर्श में, तमाम संबंधित पक्षों को शामिल करना जरूरी है। एआई पर विचार अब तक सिर्फ इसके बदलते स्वरूप या सामर्थ्य या नवोन्मेष एवं स्टार्टअप्स की तरक्की तक सीमित रहा है। उधर कंपनियां जितनी जल्दी हो सके, बाजार में नए-नए फीचर उतारना या फिर मौजूदा उत्पाद में नए फीचर डालना चाहती हैं। यदि उपभोक्ता को ऐसा मोबाइल फोन मिले, जिसमें इमेज रिकॉग्निशन सॉफ्टवेयर हो, तो जाहिर वह सेवा संबंधी शर्तों को पढ़ने की जहमत उठाए बिना इस्तेमाल करने को उतावला रहेगा। तकनीक ईजाद करने वाली कंपनियों को शिकायत है कि अतिशयी नियामक नियंत्रण उनके नवोन्मेष पर बुरा असर डालेगा। हालांकि जैमिनी वाले विवाद के बाद, संबंधित मंत्री ने साफ किया कि एआई पर जारी परामर्श नए स्टार्टअप्स पर लागू नहीं होगा।
एआई और विभिन्न क्षेत्रों में इसकी उपयोगिता के मद्देनज़र, इस किस्म का चलताऊ रास्ता लेना, व्यापक सवालों को दरकिनार करता है। सवाल है, क्या हमें ऐसी एप्लिकेशंस (सॉफ्टवेयर) की जरूरत है जिसका इस्तेमाल करना ही पड़े या फिर जरूरत महसूस हो (कुछ विशेषज्ञ इसको मनुष्य-केंद्रित एआई का नाम देते हैं) या फिर वैसी एप्लिकेशंस विकसित करने की आवश्यकता है, जो हमारे व्यवहार में बदलाव करती हो या मानवीय एवं सामाजिक नियमों को भंग करती हों? डर है कि यदि एआई टूल्स का डिज़ाइन अंतिम छोर के उपभोक्ता के संदर्भों को सोच में रखे बगैर किया जाता है, तो कदाचित यह विकास क्रिया उपभोक्ताओं को लेकर बनी त्रुटिपूर्ण सोच अथवा पक्षपाती अनुमानों पर आधारित होगी। नियामक तंत्र बनाने का विचार करते वक्त नैतिकता, सामाजिकता, निजता और पारदर्शिता जैसे मुद्दों पर ध्यान देने की जरूरत है। लोगों में एआई तकनीक पर यथेष्ट समझ बने बिना और बगैर गहराई में उतरे, अनेकानेक क्षेत्रों में इसको तेजी से अपनाया जा रहा है। यहां तक कि सरकारी एजेंसियां भी निजता, पारदर्शिता और लोगों के मूल अधिकारों को ताक पर रखकर एआई तकनीकें अपना रही हैं। उदाहरणार्थ किसान आंदोलन में निगरानी के लिए ड्रोन और फेशियल रिकॉग्निशन तकनीक का इस्तेमाल करना।
तकनीक और नियामक तंत्र के बीच दौड़ में, साथ के साथ सुधार करने की नियामक तंत्र की गति अक्सर धीमी पाई जाती है। विश्वभर में सरकारें और नियामक संस्थान एआई की चाल से कदमताल बनाए रखने को हाथ-पैर मार रहे हैं। अमेरिका में, राष्ट्रपति जो बाइडेन ने एआई बाबत कार्यकारी आदेश जारी किया है, जिसमें ध्यान सुरक्षा, निजता और पक्षपात इत्यादि विषयों पर केंद्रित है। जोखिमों का प्रबंधन करने में यह आदेश पहले की अपेक्षा अधिक पारदर्शिता और टेस्टिंग, टूल्स का मानकों पर खरा उतरने की अनिवार्यता पर जोर देता है। इसमें नई तकनीक जारी करने से पहले सघन परीक्षण करने की सलाह है ताकि दुरुपयोग करने वालों के लिए किन्हीं खामियों या सुरक्षा संबंधी चूकों का दोहन करने की गुंजाइश न रहे। वह एआई मॉडल्स, जिनसे राष्ट्रीय सुरक्षा या सार्वजनिक स्वास्थ्य को गंभीर खतरा बन सकता है, उनके निरापदता संबंधी परीक्षणों का परिणाम सरकार के साथ साझा करना होगा।
यूरोपियन यूनियन के एआई एक्ट में, जोखिम के स्तर के मुताबिक विभिन्न नियम रखे गए हैं। उच्च-जोखिम वर्ग में वे एआई एप्लिकेशंस हैं, जिनसे सुरक्षा या मूल अधिकारों पर नकारात्मक असर पड़ता हो। अस्वीकार्य जोखिम में वे आते हैं जिन्हें खतरनाक माना जाए और इनको किसी भी सूरत में अनुमति नहीं मिलेगी। इस वर्ग में, लोगों के बोध-व्यवहार को बदलने वाली या विशेष जोखिमज़दा समूह, सामाजिक गिनती (आचार-व्यवहार अथवा आर्थिक सामर्थ्य इत्यादि पर) आधारित बायोमीट्रिक पहचान और नागरिकों का वर्गीकरण करना, वास्तविक समय में या फिर दूर बैठकर बायोमीट्रिक प्रणाली जैसे कि फेशियल रिकॉग्निशन इत्यादि एआई एप्लिकेशंस का उपयोग शामिल हैं। मौजूदा लोकप्रिय सामान्य उपयोग की और जेनेरिटिव एप्लिकेशंस जैसे कि चैटजीपीटी को भी पारदर्शिता आवश्यकताओं पर खरा उतरना होगा और सुनिश्चित करना होगा कि इनसे गैर-कानूनी सामग्री और कॉपीराइट प्राप्त डाटा प्रकाशित न होने पाए। सीमित जोखिम वर्ग की एआई एप्लिकेशंस को भी अपेक्षाकृत नरम, किंतु पारदर्शी नियमों का पालन करना होगा।
एआई को लेकर भारत को तीन चीजें करने की जरूरत है। प्रथम, एक चुस्त नीति और नियामक तंत्र की स्थापना, जिसका ध्यान न केवल सामर्थ्य बल्कि जोखिमों पर भी केंद्रित हो। इसके लिए सभी संबंधित पक्ष, मसलन, तकनीक ईजाद करने वाली कंपनियां, समाज शास्त्री, सिविल सोसायटी, उपभोक्ता और नीति-नियंताओं की सलाह को खुले और पारदर्शी ढंग से शामिल किया जाना जरूरी है। यह तंत्र सुरक्षा, पारदर्शिता और न्यायप्रियता जैसे सुस्पष्ट परिभाषित दिशा-निर्देशक सिद्धांतों पर आधारित हो। द्वितीय, इन दिशा-निर्देशक सिद्धांतों पर टिकी त्वरित, लचीली और स्व-आधुनिकीकृत करने वाली नियामक व्यवस्था बने। तृतीय, आवश्यक प्रशासनिक एवं नियामक सामर्थ्य का निर्माण, जो नित नई आने वाली तकनीकों को सहजता से बरत सके। यह वक्त है एआई से अर्थपूर्ण तरीके से पेश आने का, न कि खारिज करने का।

लेखक विज्ञान संबंधी विषयों के विशेषज्ञ हैं।

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