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नेताओं के झूठ फरेब से परेशान माइकों की आपबीती

06:46 AM Apr 02, 2024 IST
नेताओं के झूठ फरेब से परेशान माइकों की आपबीती
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आलोक पुराणिक

एक बहुत बड़े टैंट हाउस के मालिक के गोदाम में कई माइक पड़े हुए थे, आपस में वार्ता कर रहे थे। कुछ यूं चल रही थी वार्ता :-
माइक एक : और क्या हाल भाई लोगों का चल रहा है। आज तो थक गया मैं, मेरे वाला नेता ढाई घंटे से उस नेता को गाली दे रहा था। गालियां सुन-सुनकर पक गये साहब, वो ही पुरानी गालियां, नेता कुछ नयी गालियां भी न सोच सकते क्या।
माइक नंबर दो : अबे गालियां क्या ये तो नारे भी नये न सोच सकते। वही पुराने नारे चल रहे हैं, ये मुफ्त, वो मुफ्त।
माइक एक : क्या मतलब, वो ही पुराने नारे दे रहे हैं और पब्लिक सुन रही है।
माइक नंबर दो : पब्लिक का क्या है, कुछ न कुछ सुनती रहती है। कहां तक याद रखे कि कौन क्या कह गया था। नेता वो ही बात बार-बार कह देता है, पब्लिक बार-बार वही बात सुन लेती है। नेता का काम है कहना, पब्लिक का काम है सुनना। सब अपना-अपना काम किये जा रहे हैं। हम माइक भी पब्लिक ही हैं, बस सुन लेना चाहिए। हमारे बस में क्या है सुनने के सिवाय।
माइक नंबर एक : मेरा तो मन करता है कि मैं गर्दन पकड़ लूं नेता की और लिपट जाऊंगा उससे, और कहूं कि चुप, चुप, चुप पहले पुराने वाले वादे तो पूरे कर।
माइक नंबर दो : न-न ऐसा मत करना। नेता बोलता है, तो ही हमारे मालिक का कारोबार चलता है। जितने चुनाव, जितने भाषण, जितने झूठ, उतना ही हमारा कारोबार चलेगा। एक बात समझ लेना कि काम की बातें ज्यादा न होतीं। हमारा धंधा काम की बातों से न चलता। हमारा तो धंधा ही फिजूल की बातों का है। चुप रहो माइक भाई, चुप रहो तो भी धंधा चलता है।
माइक नंबर एक : बात तो सही है, चुप रहो तो धंधा माइक का चलता है, पर नेताओं का धंधा तो बकवास का ही चलता है। मन तो वैसे मेरा भी कभी-कभी यही करता है कि जैसे ही नेता ए नेता बी को गालियां देता है, मैं गालीबाज नेता को बता दूं कि भाई एक हफ्ते पहले तो तुम उसे सगा भाई बता रहे थे।
माइक नंबर दो : वैसे हम पक गये हैं झूठ सुन-सुनकर। अगर सिर्फ झूठों से फसल पकनी होती, तो अकाल के बावजूद देश में कोई फसल कभी भी फ्लाप न होती।
माइक नंबर एक : एक बात मेरी समझ में नहीं आती कि पब्लिक सुन रही है, सुने ही जा रही है। पब्लिक पकती नहीं है क्या, नेताओं के झूठों से।
माइक नंबर दो : पब्लिक के पास च्वाइस है, दरअसल तरह-तरह के झूठ सुनने की। इधर के झूठ से बोर हो, तो दूसरी तरफ के झूठ सुनने चली जाती है। जैसे नेताओं के झूठ से परेशान हो पब्लिक, तो वह टीवी न्यूज सुनने चले जाती है कि आज रात पुतिन एटम बम चला देगा। हमारे नेता गरीबी हटा रहे हैं बहुत लंबे अरसे से, ऐसे ही पुतिन भी एटम बम चला रहे हैं, लंबे अरसे से। पब्लिक के पास च्वाइस है कि यह वाला झूठ सुने या वो वाला झूठ, दिक्कत हम माइकों की है, हमें आमतौर पर नेताओं के झूठ ही सुनने पड़ते हैं।
माइक नंबर एक : सही है काश! हम भी पब्लिक होते, हमारे पास च्वाइस होती झूठों की।

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