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सुनहरे सपनों की आस गले पड़ी युद्ध की फांस

09:21 AM Mar 03, 2024 IST
सुनहरे सपनों की आस गले पड़ी युद्ध की फांस
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पुष्परंजन
लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं।

फरवरी 2022 से यूक्रेन के फ्रंट पर छिड़ा फुल स्केल वॉर अब तक समाप्त नहीं हो पाया है। रूसी सेना में सुरक्षा सहायक के रूप में कार्यरत भारतीय हेमिल मंगुकिया की 21 फरवरी 2024 को मृत्यु हो गई। गुजरात के सूरत जिले के निवासी मंगुकिया को दिसंबर 2023 में रूसी सेना में भाड़े के सैनिक के रूप में भर्ती किया गया था। इस भर्ती की ख़बर से भारत सरकार अनजान थी। इस हफ्ते मंगुकिया के पिता अश्विनभाई की ओर से काम करने वाले एक एजेंट ने मॉस्को स्थित भारतीय दूतावास को पत्र लिखकर मंगुकिया के पार्थिव शरीर को वापस लाने में सहायता मांगी थी। मामला गुजरात से जुड़ा है, इसलिए विदेश मंत्रालय भी इसे लेकर संज़ीदा हो चुका है।
मास्को से मिली रिपोर्ट के मुताबिक, कई भारतीय रूसी सेना में बतौर भाड़े के सैनिक काम कर रहे हैं। यूक्रेन के फ्रंट पर तैनात कर्नाटक के कलबुर्गी निवासी समीर अहमद ने कुछ दिनों पहले जानकारी साझा की, ‘हमने एक ड्रोन को अपने ऊपर मंडराते देखा। मैं एक खाई खोद रहा था और हमारा साथी हेमिल लगभग 150 मीटर दूर, फायर करने का अभ्यास कर रहा था। अचानक हमें कुछ शोर सुनाई दिया। मैं और दो अन्य भारतीय अन्य रूसी सैनिकों के साथ खाई में छिप गये। मिसाइलें चलीं और धरती हिल गई। कुछ देर बाद जब हम बाहर निकले तो हेमिल को मृत पाया। मैं ही वह व्यक्ति था जिसने उसके शव को ट्रक में डाला था। हमने इसकी जानकारी भारतीय दूतावास को दी, मगर उन्होंने कोई जवाब नहीं दिया।’
समीर अहमद के हवाले से आई इस ख़बर से उन दो कश्मीरियों के परिजनों की चिंताएं बढ़ गई हैं, जो यूक्रेन के खिलाफ लड़ने के लिए रूसी सेना में चुपचाप भर्ती हुए थे। पुलवामा के अवंतीपोरा के 31 वर्षीय आजाद अहमद और कुपवाड़ा के हाजिनार के 28 वर्षीय जहूर अहमद शेख भारत के उन दर्जनों लोगों में शामिल हैं, जिन्हें कथित तौर पर दुबई में अच्छी नौकरी देने का झांसा देकर रूस भेज दिया गया था। जम्मू-कश्मीर स्टूडेंट्स एसोसिएशन (जेकेएसए) अब उनकी वापसी के लिए अभियान चला रहा है। आजाद के बड़े भाई सज्जाद अहमद ने कहा कि सरकार के आश्वासन से राहत मिली है, लेकिन गुजराती युवक की मौत के बाद दूतावास के रुख संबंधी खबरों ने उनकी चिंता बढ़ा दी है।
सज्जाद अहमद बोल पड़े, ‘मेरा भाई हमें कभी-कभी फोन करता था, लेकिन कल शाम से उससे कोई संपर्क नहीं हुआ है। नेटवर्क में कुछ दिक्कतें हैं। हम सचमुच चिंतित हैं, जबसे हमें पता चला कि गुजरात का एक युवक, जो मेरे भाई के ग्रुप में था, की जान चली गई है। हम दुआ करते हैं कि वे सभी सुरक्षित हों, और जल्द ही स्वदेश वापस आ जाएं।’ सज्जाद अहमद ने कहा कि वरिष्ठ सरकारी अधिकारी और राजनेता मंगलवार को हमारे घर आए, और मदद का वादा किया।
सज्जाद अहमद ने कहा कि 14 जनवरी को प्रशिक्षण के दौरान गलती से राइफल चल जाने से मेरे भाई के पैर में चोट लग गई थी। उसे एक अस्पताल में स्थानांतरित कर दिया गया था। पिछली बार जब हमने बात की थी, तो उसने हमें बताया था कि वह अभी भी लंगड़ा रहा है, लेकिन हमें डर है कि उसे फिर से किसी फ्रंट पर ले जाया जा सकता है। सज्जाद ने कहा कि हम सभी एक व्हाट्सएप ग्रुप के माध्यम से संपर्क में हैं, जिसे हैदराबाद के तीन परिवारों ने बनाया था। अन्य लोग बाद में शामिल हुए। इस समूह में तेलंगाना, बेंगलुरु, गुजरात और जम्मू-कश्मीर के युवा हैं। अब तक हमें जो पता चला है, वह यह है कि इन दर्जनों लोगों को दो अलग-अलग समूहों में रूस ले जाया गया था। मेरा भाई दूसरे समूह का हिस्सा था। बाबा व्लॉग्स नाम के एक यूट्यूब चैनल ने उन्हें खाना पकाने और सफाई की नौकरी की पेशकश की। मेरे भाई ने मुंबई से चेन्नई होते हुए यूएई तक की यात्रा की। उनसे रूसी भाषा में दस्तावेजों पर हस्ताक्षर करवाए गए, और फिर उन्हें रूस के लिए टिकट उपलब्ध कराए गए।’
कश्मीर के ही मोहम्मद अमीन शेख, जिनका बेटा जहूर लापता है, ने कहा कि अन्य लोगों के साथ उनके बेटे को वापस लाने के प्रयास जारी हैं। मेरा बेटा 11 नवंबर को दुबई के लिए रवाना हुआ था, जिसके बाद उन्हें रूस ले जाया गया। उसी यूट्यूब चैनल, बाबा व्लॉग्स ने उन्हें नौकरी की पेशकश की थी। अमीन शेख बोलते हैं, ‘मैंने कल शाम उपराज्यपाल मनोज सिन्हा से बात की। उन्होंने यह भी कहा कि प्रयास जारी हैं।’ यों, भारतीय विदेश मंत्रालय ने स्वीकार किया है कि हमारे कुछ नागरिकों को रूसी सेना में सहायक के रूप में भर्ती किया गया है। भारतीय विदेश मंत्रालय ने बृहस्पतिवार को कहा कि ‘सेना सुरक्षा सहायक’ के रूप में भर्ती किए 20 लोग अभी भी रूस में फंसे हुए हैं, जो रूसी फ़ौज में एक इंडियन एजेंट द्वारा भाड़े पर लगाए गए थे। उनमें से कुछ को यूक्रेन के खिलाफ रूस का युद्ध लड़ने के लिए मजबूर किया गया है, और कुछ ने भर्ती के समय वादा की गई राशि का भुगतान नहीं किए जाने की शिकायत की है। सज्जाद के मुताबिक, नई दिल्ली स्थित रूसी दूतावास को भी यह सब पता है, लेकिन पूछिये तो यही जवाब कि हम इसका पता कर रहे हैं।

नेपाल समेत कई देशों में यही कहानी

इससे मिलती-जुलती कहानी भारत-नेपाल से लेकर सेंट्रल एशिया के कई देशों में मिलेगी, जहां से यूक्रेन में लड़ने के वास्ते भाड़े के सैनिक भर्ती किये गये हैं। नेपाल सरकार का कहना है कि उसके लगभग 200 नागरिक रूसी सेना के लिए लड़ रहे हैं, और युद्ध क्षेत्र में कम से कम 13 नेपाली मारे गए हैं। नेपाल में प्रतिपक्ष की नेता और पूर्व विदेश मंत्री, बिमला राय पौडैल ने संसद के ऊपरी सदन में जानकारी दी थी कि 14,000 से 15,000 के बीच नेपाली अग्रिम पंक्ति में लड़ रहे हैं, उन्होंने युद्ध क्षेत्र से लौटने वाले लोगों के बयानों के आधार पर ऐसा वक्तव्य दिया, और मांग की कि रूसी अधिकारी आंकड़े उपलब्ध कराएं। काठमांडो स्थित सामाजिक कार्यकर्ता कृति भंडारी, रूस की तरफ़ से यूक्रेन में लड़ रहे नेपाली सैनिकों के परिजनों की प्रतिनिधि बन गई हैं। वह कहती हैं कि हाल के हफ्तों में लगभग 2,000 परिवारों ने उनसे संपर्क किया है, और उन्हें रूस से घर वापस लाने के लिए मदद मांगी है। कृति भंडारी ने सैकड़ों प्रभावित परिवारों के हवाले से कहा है कि रूस में उनके रिश्तेदार हफ्तों-महीनों से संपर्क में नहीं हैं। काठमांडो उपत्यका के भक्तपुर की जानुका सुनार के पति तीन महीने पहले सेना में शामिल होने के लिए रूस गए थे। वह ढाई महीने से नेपाल में अपने परिवार के संपर्क में नहीं हैं। जानुका सुनार ने कहा कि उनके पति भक्तपुर में गहने व बर्तन आदि बनाने का काम करते थे। घर में अकेले कमाने वाले थे, जो केवल पैसे के लिए रूसी सेना में शामिल हुए थे ताकि हमारा परिवार बेहतर जीवन गुजार सके।
खोटांग की बुद्धि माया के पति शुक्र तमांग ने रूस की सेना के साथ लड़ने के लिए अनुबंध पर हस्ताक्षर किए थे। उनके मारे जाने की आशंका है। बुद्धि माया को नेपाली या रूसी सरकार से पति की मृत्यु की पुष्टि नहीं मिली है। नम आंखों से बुद्धि माया बोलती हैं, ‘मुझे बस उसके बारे में आधिकारिक प्रमाण चाहिए, भले ही यह अच्छी खबर हो या बुरी।’ पीड़ित परिवारों की त्रासद दास्तान लगभग एक जैसी दरपेश है। बेहतर जीवन की आशा में भाड़े का सैनिक बनने चले गये, फिर महीनों-हफ्तों से कोई ख़बर नहीं। दूतावासों से लेकर विदेश मंत्रालय तक कोई इनके परिजनों की सुनने वाला नहीं।

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किर्गिस्तान का मामला

सेंट्रल एशिया का ख़ूबसूरत सा देश है किर्गिस्तान। प्राकृतिक रूप से जितना ख़ूबसूरत, रोज़गार देने के मामले में उतना ही बदसूरत। बीती 30 अगस्त 2023 को किर्गिस्तान के सुप्रीम कोर्ट ने अपने नागरिक आस्कर कुबैनिचबेक-उलू के खिलाफ आपराधिक मामले की सुनवाई करते हुए उसे दस साल जेल की सजा सुनाई थी। मई 2022 में कुबैनीचबेक-उलू रूस में भाड़े का सैनिक बनकर यूक्रेन सीमा पर लड़ने चला गया था। कुबैनीचबेक-उलू ने यूक्रेन के खिलाफ रूस की तरफ़ से युद्ध में भाग लिया था। उसका अपराध बस यही था कि बिना किर्गिस्तान सरकार की जानकारी के वह रूस गया, और भाड़े का सैनिक बन गया। कुबैनीचबेक-उलू को जनवरी 2023 में किर्गिस्तान की राष्ट्रीय सुरक्षा राज्य समिति द्वारा हिरासत में लिया गया था।
अदालत के फैसले के बाद, कुबैनिचबेक-उलू के वकील ने अनुरोध किया कि क्रेमलिन उसे रूसी पासपोर्ट दे, और उसे जेल से बाहर निकाले। यूक्रेन में लड़ाई के लिए किसी मध्य एशियाई को सजा सुनाए जाने का यह पहला मामला था, जिससे उस इलाक़े के लोगों को रूसी सशस्त्र बलों में शामिल होने के बारे में दोबारा सोचने पर मजबूर होना पड़ा है। क्रेमलिन की भर्ती रणनीति के विरुद्ध सेंट्रल एशिया की सरकारें अपनी प्रतिक्रिया देने में डरपोक रही हैं। उल्टा उन्होंने अपने ही नागरिकों के खिलाफ आपराधिक मामले दर्ज़ करने शुरू किए, जो यूक्रेन में रूस की तरफ से या उसके विरोध में लड़ते हुए पाए गए। घर वापसी पर उन्हें लंबी जेल की सजा की धमकी दी गई।

प्रवासी श्रमिक भेजे मोर्चे पर

साल 2022 में रूस आये 35 लाख प्रवासी श्रमिकों में से 83 प्रतिशत सेंट्रल एशिया से आए लोग थे। रूस ने इसका दुरुपयोग करते हुए उनमें से बहुतों को यूक्रेन के विरुद्ध युद्ध में भाड़े के सैनिक के रूप में झोंक दिया। मॉस्को द्वारा मध्य एशियाई लोगों की भर्ती का पहला सबूत रूसी आक्रमण के शुरुआती दिनों में सामने आया। उन दिनों एक वीडियो क्लिप में सैन्य वर्दीधारी एक उज्बेक को यूक्रेन के लुहान्स्क क्षेत्र में ट्रक चलाते हुए दिखाया गया। उस व्यक्ति ने एक वीडियो में खुलासा किया कि कई उज्बेक और ताजिकों ने आक्रमण में भाग लेने के लिए रूसी रक्षा मंत्रालय के साथ सैन्य अनुबंध पर हस्ताक्षर किए थे। उन्हें नागरिकता और रूसी पासपोर्ट देने का वादा किया गया था।

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सोशल मीडिया पर भर्ती की पोस्ट

साल 2022 के आखि़री महीनों में रूसी अर्द्धसैनिक संगठन ‘वैगनर ग्रुप’ ने सेंट्रल एशियाई प्रवासियों की भर्तियां शुरू कीं। जुलाई 2022 में पूरे मध्य एशिया में लोकप्रिय सोशल मीडिया पेजों ने लगभग 3,100 डॉलर का मोटा मासिक वेतन और सैन्य सेवा के बदले रूसी नागरिकता देने के वादे के साथ नौकरी की घोषणाएं पोस्ट कीं। वैगनर ग्रुप ने रूस के मोल्किनो शहर में प्रशिक्षण केंद्र बना रखा था, यहां इन लोगों ने हज़ारों की संख्या में उन सेंट्रल एशियाई लोगों की भर्तियां शुरू कीं, जो लंबे समय से रूसी जेलों में बंद थे। इसके अलावा रक्षा मंत्रालय ने मॉस्को के सखारोव प्रवासन केंद्र में एक भर्ती केंद्र खोला, जहां कई प्रवासियों ने बताया कि उनसे सैन्य अनुबंधों पर धोखे से हस्ताक्षर करवाये गये। एक ब्रेकिंग न्यूज़ जून 2023 में आई कि किर्गिस्तान, ताजिकिस्तान और उज्बेकिस्तान के जो लोग रूस की जेलों में बंद थे, वो अब यूक्रेन युद्ध में मर रहे हैं। इन तीन सेंट्रल एशियाई देशों के 93 क़ैदियों की यूक्रेन के फ्रंट पर मौत ने बड़ा सवाल खड़ा किया था। हालिया रिपोर्टों से पता चलता है कि रूसी अधिकारियों ने मध्य एशियाई लोगों से मर्सनेरी के वास्ते भर्तियां करने में चतुराई की। उन्होंने अंतर्राष्ट्रीय नियमों की भी अनदेखी की। मामला खुलने पर रूसी दूतावास चुप्पी साध जाते हैं। चूंकि रूस 2024 में राष्ट्रपति चुनाव के करीब है, इसलिए सत्ता पक्ष अपने नागरिकों को यूक्रेन के फ्रंट पर लड़ने के वास्ते अधिक दबाव बनाने से बचता रहा है। तो विकल्प यह निकाला गया कि सेंट्रल व दक्षिण एशियाई देशों के रोज़गार ढूंढने वाले युवकों को युद्ध में सैनिक बनाया जाए। इसके लिए इन देशों के तमाम एजेंट सक्रिय किये गये, जो वहां ट्रेवल एजेंसियों के माध्यम से मानव तस्करी के धंधे में बरसों से सक्रिय हैं।

असल सवाल रोजगार का

यह ध्यान देने का एक अच्छा समय है कि मध्य एशिया के देशों में घरेलू स्तर पर पर्याप्त नौकरियां नहीं हैं। यदि होती तो रूस में 60 लाख से अधिक सेंट्रल एशियाई प्रवासी, मजदूर नहीं होते। काम करने के लिए रूस जाना मध्य एशिया के उन हजारों परिवारों के लिए जीवन रेखा रहा है, जो रूस से अपने परिजनों द्वारा घर भेजे जाने वाले पैसे पर निर्भर हैं। वहां जैसे-तैसे पहुंचे कई मध्य एशियाई, रूसी नागरिकता प्राप्त करने का प्रयास करते हैं। साल 2023 की पहली तिमाही में 45,000 ताजिकों को रूसी नागरिकता प्राप्त हुई। रूस के आंतरिक मंत्रालय ने जानकारी दी कि 44,854 ताजिक नागरिकों को रूसी नागरिकता प्राप्त हुई। कजाकिस्तान के लगभग 6,900 नागरिकों, किर्गिस्तान के 5,400, उज्बेकिस्तान के 4,700 लोगों और तुर्कमेनिस्तान के 912 लोगों को रूसी नागरिकता दी गई। तो क्या ये सभी यूक्रेन जाकर रूस की तरफ़ से युद्ध लड़ेंगे?

कानून बनाया : सैनिक बनो, नागरिकता लो

रूस में सैन्य सेवा के भर्ती के आधार पर शीघ्र नागरिकता देने का कोई कानूनी प्रावधान साल 2022 की शुरुआत तक नहीं था। कुछ रूसी राजनेता चाहते थे कि मध्य व दक्षिण एशियाई प्रवासी मजदूरों को नागरिकता के योग्य तभी माना जाए, जब वे युद्ध में लड़ने के लिए तैयार हों। रूसी संसद के निचले सदन ड्यूमा के डिप्टी, मिखाइल मतवेव ने 6 मई 2022 को लिखा था कि मध्य एशियाई प्रवासी मजदूरों, संभवतः पुरुषों के लिए रूसी नागरिकता प्राप्त करने की शर्त रूसी सेना में सेवा होनी चाहिए। मतवेव ने लिखा कि 2023 के पहले तीन महीनों में 45,000 ताजिकों ने रूसी नागरिकता प्राप्त की थी। मतवेव ने पूछा भी, ‘हमारी ताजिक बटालियनें कहां हैं?’ 20 सितंबर 2022 को रूसी संसद के निचले सदन ड्यूमा में एक वर्ष की सैन्य सेवा के बदले नागरिकता की पेशकश करने वाला एक विधेयक पारित किया गया। इसके प्रकारांतर, रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने 15 मई 2023 को एक डिक्री पर हस्ताक्षर किए, जो रूसी सेना में शामिल होने, और यूक्रेन फ्रंट पर भेजने वाले विदेशी नागरिकों के लिए रूसी नागरिकता प्रक्रियाओं को सरल बनाता है। लेकिन जनवरी 2024 के तीसरे हफ्ते ड्यूमा में जो बिल पास हुआ है, उसे जानकर हैरानी होती है। रूसी सांसदों ने रूसी सेना की आलोचना करने के दोषी किसी भी व्यक्ति की चल-अचल संपत्ति को जब्त करने के विधेयक को मंजूरी दे दी थी। संसद के निचले सदन, ‘स्टेट ड्यूमा’ ने 24 जनवरी को ऐसे विधेयक को 395 वोटों के साथ पारित कर दिया, विपक्ष में केवल तीन वोट पड़े थे। लोगों को क़ानून बनाकर खा़मोश कर देने का इससे बड़ा उदाहरण शायद ही कहीं मिले।

-सभी फोटो : लेखक

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