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रफ्तार के हादसे

06:32 AM Nov 04, 2023 IST
रफ्तार के हादसे
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शायद ही कोई दिन ऐसा जाता होगा जब हम अखबारों में बड़े भीषण सड़क हादसों की खबरें न पढ़ते हों। हर साल डेढ़ लाख से अधिक निर्दोष लोग इन दुर्घटनाओं में मारे जाते हैं जो किसी परिवार की उम्मीद होते हैं। किसी घर की अर्थव्यवस्था की धुरी होते हैं। दरअसल, यह एक मौत नहीं होती, परिवार के कई लोग जीते-जी मर जाते हैं। परिवार के कुछ लोग जीवन पर्यंत इन हादसों से नहीं उबर पाते। बुधवार की मध्यरात्रि पंजाब में संगरूर के सुनाम-मैहलां रोड पर एक भीषण दुर्घटना में एक बच्चे समेत छह लोगों की मौत हो गई। प्रदूषण जनित धुंध, टैंकर की गति व कार की ओवरटेक करने की कोशिश में यह भयावह हादसा हुआ। इससे पहले पटियाला में एक हादसे में एक एमबीबीएस के छात्र का सिर धड़ से अलग होने के समाचार ने विचलित किया। परिवहन मंत्रालय की हालिया रिपोर्ट बढ़ते सड़क हादसों की हकीकत बयां करती है। यह बेहद चिंता की बात है कि 2022 में 2021 के मुकाबले सड़क हादसों में बारह फीसदी की वृद्धि हुई है। वहीं मरने वालों का प्रतिशत 9.4 फीसदी बढ़ा है। कितनी दुखद स्थिति है कि हर घंटे 53 दुर्घटनाएं होती हैं और हर घंटे 19 निर्दोष लोग मौत के मुंह में चले जाते हैं। विडंबना यह है कि घायलों की संख्या में भी पंद्रह फीसदी की वृद्धि हुई है। भारत दुनिया में ऐसा देश बनता जा रहा है जहां सबसे ज्यादा सड़क हादसे और मौतें होती हैं। विडंबना यह कि दुर्घटनाओं की मुख्य वजह वाहनों की तेज गति है। जैसे-जैसे बेहतर चौड़ी सड़कें बन रही हैं सड़क हादसों का आंकड़ा भी बढ़ता जा रहा है। यही वजह है कि सड़क दुर्घटनाओं में मरने वालों में भारत दुनिया में अव्वल बनता जा रहा है। दुखद स्थिति यह कि मरने वाले 45 फीसदी लोग दुपहिया वाहन चला रहे थे। जो बताता है कि हमारी सड़कों पर चलना कितना असुरक्षित बनता जा रहा है।
कोई भी व्यक्ति राष्ट्र की बहुमूल्य संपत्ति होता है। इन दुर्घटनाओं में मरने वाले अधिकांश लोग हमारी कार्यशील आबादी का हिस्सा होते हैं। परिवहन मंत्रालय की रिपोर्ट के अनुसार सड़क दुर्घटनाओं का शिकार होने वाले लोगों में 67 प्रतिशत लोग युवा आबादी का प्रतिनिधित्व करते हैं। जिनकी आयु 18 से 45 साल के बीच होती है। इन कामकाजी वर्ग के लोगों की मौत से इनका परिवार भी गहरे आर्थिक संकट में चला जाता है क्योंकि ये परिवार की आय का जरिया होते हैं। पिछले साल घायल होने वालों की संख्या में पंद्रह फीसदी की वृद्धि हमारी चिंता बढ़ाने वाली है। जाहिरा तौर पर इन हादसों के मूल में जहां तेज रफ्तार मुख्य कारण है, वहीं गलत ओवर टेकिंग, हेलमेट न लगाना, सीट बेल्ट न बांधना व रांग साइड चलना भी बड़ी वजह है। वहीं त्रुटिपूर्ण सड़कें, तीव्र मोड़ व सड़कों में गड्ढे भी हादसों की वजह बनते हैं। दरअसल, लगातार हाईवे और एक्सप्रेसवे बनने से वाहनों की रफ्तार खासी तेज हुई है। सरकारों की तरफ से लगातार दावे किये जाते हैं कि अब फलां जगह पहुंचना इतने घंटे कम हुआ। इस जल्दी ने चालकों को अनियंत्रित गति का थ्रिल महसूस करने का भी मौका दिया है। युवा पीढ़ी समय बचाने के लिये भागमभाग में लगी है, यह जाने बिना कि अनियंत्रित गति सड़क हादसों की मूल वजह है। हाईवे-एक्सप्रेसवे तो बन गये हैं लेकिन उस पर चलने का सलीका हमें नहीं आया। सड़कों पर कार, बस, दोपहिया वाहन से लेकर ट्रैक्टर-ट्राली व परंपरागत वाहन भी चलते मिल जाते हैं, जो तेज गति के वाहनों की चपेट में आकर दुर्घटनाओं का कारण बनते हैं। यात्रियों को तेज रफ्तार वाले सड़क यातायात से साम्य बैठाने का प्रशिक्षण अनिवार्य रूप से दिया जाना चाहिए। देश में स्पीड के जुनून पर भी अंकुश लगाने की जरूरत है क्योंकि अधिकांश हादसों की वजह तेज रफ्तार ही रही है। वक्त के साथ तेज दौड़ने की प्रतिस्पर्धा के परिणाम घातक ही मिलते हैं। एक ओर जहां दुर्घटना मुक्त सड़कें बनाने हेतु सरकारों को विशेष कदम उठाने की जरूरत है, वहीं हर नागरिक को अनिवार्य रूप से यातायात नियमों के लिये प्रशिक्षित करने की जरूरत है।

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