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सवाल शुचिता का

06:28 AM Jun 11, 2024 IST
सवाल शुचिता का
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झुलसाती गर्मी के बीच लंबे चले चुनावी अभियान में देश के मतदाताओं ने अपने लोकतांत्रिक दायित्वों का निर्वहन जिम्मेदारी से किया। देश में 18वीं लोकसभा का स्वरूप शक्ल ले चुका है। गर्व है कि हम दुनिया में रिकॉर्ड संख्या में मतदाताओं वाले सबसे बड़े लोकतंत्र का हिस्सा हैं। लेकिन इस बीच विचलित करने वाली खबर आई है कि लोकतंत्र के सबसे बड़े मंदिर में पहुंचने वाले 543 सांसदों में 46 फीसदी आपराधिक रिकॉर्ड रखते हैं। यह स्थिति हर नागरिक के माथे पर चिंता की लकीर लाने वाली है। क्या इस स्थिति में देश की लोकतांत्रिक शुचिता की रक्षा हो पाएगी? क्या हम मूल्यों की शुचिता का पारदर्शी समाज बना पाएंगे? क्या ये दागदार कालांतर हमारी व्यवस्था को प्रभावित नहीं करेंगे? इसी दिशा में चिंतन से सिर्फ चिंता ही बढ़ती है। चुनाव प्रक्रिया से जुड़े मसलों का विश्लेषण करने वाली सचेतक संस्था एसोसिएशन ऑफ डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स यानी ए.डी.आर. की ताजा रिपोर्ट बताती है कि वर्ष 2109 में चुने गये सांसदों में जहां 233 यानी 43 फीसदी ने अपने विरुद्ध आपराधिक मामले दर्ज होने की बात स्वीकार की थी, वहीं 18वीं लोकसभा के लिये चुने गए 251 सांसदों ने आपराधिक मामले दर्ज होने की बात मानी है। जो कुल संख्या का 46 फीसदी बैठती है। फिलहाल देश के निचले सदन में आपराधिक आरोपों का सामना करने वाले सांसदों की यह संख्या पिछले कई दशकों में सर्वाधिक है। वर्ष 2014 में यह संख्या 34 फीसदी, 2009 में 30 फीसदी और 2004 में 23 फीसदी थी। जनप्रतिनिधियों में दागियों की संख्या में उत्तरोतर वृद्धि होना हमारे लोकतंत्र की विसंगति को ही दर्शाता है। जाहिरा तौर पर इनका परोक्ष-अपरोक्ष प्रभाव लोकतंत्र की गुणवत्ता पर पड़ेगा। विडंबना यह है कि इस बार दागी 251 प्रतिनिधियों में से 170 के खिलाफ गंभीर आपराधिक मामले दर्ज हैं। गंभीर आपराधिक मामलों में लिप्त सांसदों की संख्या में 2009 की लोकसभा के मुकाबले इस बार 124 फीसदी वृद्धि देखी गई है। निश्चय ही यह स्थिति बेहद चिंताजनक है।
बहरहाल, यह सवाल हर एक जागरूक नागरिक को विचलित कर रहा है कि कैसे संसद में दागियों के पहुंचने का द्वार बंद हो। दरअसल, सुप्रीम कोर्ट की सजग पहल के बाद ही वर्ष 2020 में निर्देश दिए गए थे कि सभी राजनीतिक दल लोकसभा व विधानसभा के उम्मीदवारों के आपराधिक रिकॉर्ड को प्रकाशित करें। जाहिरा तौर पर इस आदेश का मकसद देश की राजनीति को आपराधिक छवि वाले नेताओं से मुक्त करना ही था। लेकिन वास्तव में ऐसा हुआ नहीं क्योंकि तमाम राजनीतिक दलों की प्राथमिकता जीतने वाले उम्मीदवार थे, अब चाहे उनका आपराधिक रिकॉर्ड ही क्यों न हो। ऐसा भी नहीं है कि दल विशेष ने ही दागी उम्मीदवारों को टिकट दिए हों। हर छोटे-बड़े राजनीतिक दल में दागियों की पर्याप्त संख्या रही है। जो राजनीतिक दलों की कथनी और करनी के भारी अंतर को ही उजागर करता है। आखिर कैसे देश के युवा व बच्चे अपने लोकतंत्र के प्रतिनिधियों के आचरण का अनुकरण करेंगे? सवाल है कि देश के लिये नीति निर्धारण करने वाले ऐसे दागी लोग हमारे भाग्यविधाता बने रहेंगे तो हमारा भविष्य कैसा होगा? क्या आपराधिक पृष्ठभूमि वाले लोग जनप्रतिनिधि चुने जाने के बाद हमारी कानून-व्यवस्था को प्रभावित नहीं करेंगे? क्या होगा हमारे समाज व व्यवस्था का भविष्य? क्यों तमाम आदर्शों की बात करने वाले और दूसरे दलों के नेताओं की कारगुजारियों पर सवाल उठाने वाले नेता राजनीति को अपराधियों के वर्चस्व से मुक्त कराने की ईमानदार पहल नहीं करते? क्यों सभी राजनीतिक दल भारतीय लोकतंत्र में शुचिता के लिये सहमति नहीं बनाते? निश्चित रूप से यदि समय रहते इस दिशा में कोई गंभीर पहल नहीं होती तो आने वाले वर्षों में दागियों का यह प्रतिशत लगातार बढ़ता ही जाएगा। इसके साथ ही बड़ा संकट यह भी है कि देश के निचले सदन में येन-केन-प्रकारेण करोड़पति बने नेताओं का वर्चस्व बढ़ता ही जा रहा है। इस बार संसद में चुनकर आए सांसदों में 504 करोड़पति हैं। ऐसे में क्या उम्मीद की जाए कि अपनी मेहनत की कमाई से जीवन यापन करने वाला आम आदमी कभी सांसद बनने की बात सोच सकता है?

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