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जन संसद

07:57 AM Jan 29, 2024 IST
जन संसद
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संस्कारों की कमी

आज के भौतिकतवाद और भागदौड़ भरे जीवन में मनुष्य मशीन बन कर रह गया है। ऐसे में अपरिहार्य घटनाएं मनुष्य के व्यवहार को प्रभावित करती हैं। उदाहरणार्थ रोड रेज। जिसका अर्थ सड़क पर हुई छोटी-बड़ी घटनाओं के कारण आने वाले गुस्से, रोष या आक्रोश से है। कभी-कभी यह क्रोध किसी व्यक्ति पर इतना हावी हो जाता है कि वह यह भी नहीं सोच पाता कि वह सड़क पर चल रहे दूसरे लोगों को क्षति पहुंचा रहा है। ऐसे मामलों में कई बार लोगों की जान तक चली जाती है। सार्वजनिक जीवन व्यवहार में बढ़ती आक्रामकता का कारण विधि और नियमों की अवहेलना है। शिक्षा, आदर्शों, सहनशीलता और संस्कारों की कमी के साथ-साथ नशीले पदार्थों का सेवन भी इसके लिए जिम्मेदार है।
अशोक कुमार वर्मा, कुरुक्षेत्र

सांसों का नियमन उपचार

निजी विमानन कंपनी के पायलट से मारपीट की घटना, समाज से लुप्त होती सहनशीलता-सहिष्णुता और बढ़ती आक्रामकता का पहला या अंतिम उदाहरण नहीं है। अपवादों को छोड़ दें तो अहम और वर्चस्व का भाव सबके दिलो-दिमाग में इस कदर घर कर गया है कि अपने सिवाय किसी को कुछ दिखाई नहीं देता। थोड़ी-सी भी अप्रिय स्थिति में आपा खो बैठते हैं लोग। सर्वेक्षण बताते हैं कि आक्रामक स्वभाव के पीछे जैविक, अनुवांशिक, मनोवैज्ञानिक और परिस्थितिजन्य कारण होते हैं। आक्रामकता का त्वरित उपचार दीर्घ श्वासोच्छवास से बेहतर कुछ नहीं। हां, इस समस्या के दीर्घकालिक उपायों में खान-पान, स्वाध्याय, सत्संग और भाव विनियमन कारगर साबित हो सकते हैं।
ईश्वर चन्द गर्ग, कैथल

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संयम जरूरी

आजकल की बॉलीवुड, टॉलीवुड या हॉलीवुड फिल्में हों, हर जगह हिंसा का प्रचार प्रचुर मात्रा में हो रहा है। गाली-गलौज की उनमें भरमार है। कहावत है कि जो जैसी संगत में रहता है उसका वैसा ही व्यवहार आम जिंदगी में परिलक्षित होता है। धीरे-धीरे उसकी ये आदत में परिवर्तित हो जाता है। उसे किसी भी विवाद में मारपीट करने, अपराध करने, हत्या करने में ध्यान नहीं रह पाता है। यही आक्रामकता हिंसा करने पर उतारू हो जाती है। सिर्फ ध्यान, दया और सहानुभूति के विचार ही इस आक्रामकता को खत्म कर सकते हैं।
भगवानदास छारिया, इंदौर

सहनशीलता धारण करें

आम जीवन में आक्रामकता का मुख्य कारण है ‘क्रोध’। क्रोध से अविवेक अर्थात मूढ़भाव उत्पन्न होता है। अविवेक से स्मरण-शक्ति भ्रमित हो जाती है। स्मृति के भ्रमित हो जाने से बुद्धि अर्थात‌् ज्ञान शक्ति का पराभव हो जाता है और बुद्धि के नाश होने से पुरुष अपने श्रेय साधन से गिर जाता है। उसका मन विकृत होकर उसे आक्रामक बना देता है। इसलिए क्रोध आने पर यदि कुछ सैकेंड के लिए मनुष्य सहनशीलता और क्षमाशीलता धारण कर ले तो क्रोध पर नियंत्रण कर सकता है। सामाजिक जीवन सुखी एवं शांतमय बन सकता है।
एमएल शर्मा, कुरुक्षेत्र

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मन का उपचार

पिछले दिनों दिल्ली में निजी विमानन कंपनी के पायलट के साथ एक यात्री ने मारपीट की। इस व्यवहार का कारण बदलते सामाजिक रिश्ते, शारीरिक व मानसिक स्वास्थ्य हो सकता है। स्कूल के बच्चों विशेषकर नौवीं कक्षा से 12वीं कक्षा के बच्चों में प्रतियोगी परीक्षाओं का तनाव भी उन्हें हिंसक प्रवृत्ति का बना देता है। आक्रामक व्यवहार के लिए सबसे अच्छा उपचार अंतर्निहित कारण पर ही निर्भर करता है। ज्यादातर मामलों में ऐसा व्यवहार किसी तात्कालिक कारण से होता है। ऐसे कारणों को पहचान कर उन स्थितियों से बचना आसान हो सकता है।
पूनम कश्यप, नयी दिल्ली

नैतिक शिक्षा जरूरी

आम जीवन-व्यवहार के संवाद में असहनशीलता चिंता का विषय है। यही वाद-विवाद बाद में हिंसक आक्रामकता में बदल जाता है। पिछले दिनों दिल्ली में निजी विमानन कंपनी के पायलट के साथ एक यात्री द्वारा मारपीट इसका उदाहरण है। हम असहनशीलता बनते जा रहे हैं। इस सबका कारण हमारी बदलती जीवनशैली, बदलता खानपान और अपने श्रेष्ठ संस्कारों से दूरी बना लेना है। सार्वजनिक जीवन में सहिष्णुता को पुनर्स्थापित करने के लिए सार्थक प्रयास बहुत जरूरी हैं। इसके लिए बचपन से ही स्कूलों में बच्चों में नैतिक शिक्षा बहुत जरूरी है।
रामभज, रोहतक

संस्कृति में समाधान

भौतिक सुख, प्रसिद्धि सब कुछ पाने की जल्दी में इंसान बेसब्र हो गया है। बेसब्री से उपजता है तनाव, तनाव से असहिष्णुता और असहिष्णुता से हिंसक प्रवृत्ति। भौतिकवाद, बाजारीकरण और इंसान के मशीनीकरण ने सबको पैसे की दौड़ में धकेल दिया है। दुःखद है कि मानवता पर हावी हो चुकी इस दौड़ में अगली पीढ़ी भी धकेली जा रही है। दौड़ चलती रहे पर हिंसक न हो इसके लिए हमें अपनी संस्कृति, संस्कारों और बुजुर्गों की ओर लौटना होगा। नैतिक शिक्षा का दायरा उच्च शिक्षा संस्थानों तक बढ़ाना होगा। स्वस्थ तन-मन के लिए योग एवं ध्यान को जीवन का अभिन्न अंग बनाना होगा।
बृजेश माथुर, गाजियाबाद, उ.प्र.

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