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एकदा

08:14 AM Apr 17, 2024 IST
एकदा
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महाराष्ट्र के प्रसिद्ध समाज सुधारक बाबा आमटे बचपन में बेहद संवेदनशील स्वभाव के थे और जरा-जरा सी बात पर नाराज हो जाते थे। जिससे नाराज हो जाते थे फिर उससे कोई संबंध नहीं रखते थे। एक बार उनके एक दोस्त ने कुछ ऐसा कह दिया कि वे बहुत नाराज हो गए। मित्र ने कई बार स्थिति का स्पष्टीकरण देने का प्रयास किया लेकिन बाबा आमटे ने एक न सुनी। हारकर मित्र बाबा आमटे की माता जी के पास गया और उनके दुराग्रह के बारे में बताया। मां ने दोस्त की बात को ध्यान से सुना। मां किशोर बाबा आमटे को लेकर नजदीक के बगीचे में ले गई। उस समय पतझड़ का मौसम था। पेड़ों ने पुराने पत्ते स्वेच्छा से त्याग दिये थे। मां ने किशोर आमटे को पत्ते दिखाते हुए कहा, ‘देखो ये पत्ते खुद पेड़ ने त्यागे हैं। इसी तरह मनुष्य को अपने मन में जमा दुराग्रह, नकारात्मक विचार, ईर्ष्या, द्वेष का त्याग कर देना चाहिए। यदि हम ऐसा नहीं करते तो ये हमारे तनाव व दुख का कारण बनते हैं। साथ ही हमारी प्रगति में बाधक बनते हैं।’ मां के आत्मीय शब्दों से आमटे जी को अपनी गलती का अहसास हुआ। उन्होंने तत्काल अपने मित्र से संपर्क साधा और उससे क्षमा मांगी। उसके बाद उनके व्यवहार में बड़ा बदलाव आया। प्रस्तुति : डॉ. मधुसूदन शर्मा

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