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एकदा

08:01 AM Mar 20, 2024 IST
एकदा
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भगवान बुद्ध के पास नगर-श्रेष्ठी के पुत्र सुमंत और श्रमिक के पुत्र तरुण ने एक साथ प्रव्रज्या ली और दोनों भावपूर्वक संघ के नियमों का पालन करने लगे। कुछ दिनों बाद प्रधान भिक्षु ने दोनों की प्रगति की सूचना देते हुए बताया कि श्रेष्ठी-पुत्र अध्ययन में तो आगे है, लेकिन श्रम करने में तरुण श्रेष्ठ है। तथागत ने भिक्षु को बताया, ‘श्रेष्ठी-पुत्र अभी जंग लगा हुआ पुर्जा है, उसका जंग धीरे-धीरे ही छूट पाएगा।’ जब भिक्षु ने उनकी बात का तात्पर्य पूछा, तो तथागत बोले, ‘सुमंत का जीवन लंबे समय तक आराम और आलस्य-प्रमाद में बीता है। आलस्य से मनुष्य जंग लगे औजार जैसा हो जाता है। दूसरी ओर श्रमिक-पुत्र तरुण शुद्ध औजार है, इसलिए खूब कर्म करता है। सुमंत को कठिन साधना करनी होगी, तभी उसके आलस्य का जंग छूट पाएगा और वह भी तरुण की तरह कर्मशील बन सकेगा।’ प्रस्तुति : डॉ. योगेन्द्र नाथ शर्मा ‘अरुण’

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