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एकदा

08:43 AM Mar 14, 2024 IST
एकदा
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गुरुदेव रवीन्द्रनाथ टैगोर ने सादगी को जीवनचर्या बना लिया था। वह एक माटी की कुटिया खुद ही बना रहे थे कि आगे से अब उसी में रहेंगे। उनका यह समर्पण और श्रम देखकर शांति निकेतन के उनके सहयोगी प्रश्नवाचक बनकर उनके सम्मुख आ खड़े हुए। उनकी उत्सुकता का उत्तर देते हुए गुरुदेव ने कहा, ‘कितनी उलझनें कितने दांव-पेंच। वह भोलापन वह सरलता वह मासूमियत जो कुदरत ने हमको दी है वह हमने खुद ही खो दी है। अपनी मानसिकता को अब भी सुलझा लें तो बेहतर होगा। मुझे लगता है कि अपनी जड़ों की तरफ लौटने से ही जगत सुखी रहेगा। एक बार सरलता सहजता चली गई तो उसके होने का नाटक या आडंबर भी नहीं कर सकेंगे।’ गुरुदेव की बात इतनी सच्ची थी कि सभी ने उसके अनुकरण का संकल्प लिया।

प्रस्तुति : मुग्धा पांडे

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