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एकदा

09:09 AM Feb 26, 2024 IST
एकदा
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महामुनि अगस्त्य श्रीशैल पर्वत पर अपनी पत्नी लोपामुद्रा से धर्मचर्चा कर रहे थे। लोपामुद्रा ने प्रश्न किया, ‘पतिदेव, जो साधनहीन व्यक्ति, वृद्ध और अपाहिज तीर्थ न कर पाएं, उन्हें इस कर्तव्य का पालन कैसे करना चाहिए?’ महर्षि अगस्त्य ने बताया, ‘तीर्थ भ्रमण में मानसी तीर्थों की महिमा सर्वोपरि है। साधनहीन व्यक्ति घर बैठे ही सदाचार का पालन कर तीर्थयात्रा का पुण्य प्राप्त कर सकता है।’ उन्होंने कहा, ‘सत्य और क्षमा तीर्थ हैं। इंद्रियों को वश में रखना भी तीर्थ का पुण्य देता है। जो व्यक्ति दयावान होता है और जिसका अंतःकरण शुद्ध-सात्विक होता है, वह घर बैठे ही तीर्थों का पुण्य प्राप्त करने का अधिकारी होता है।’ महर्षि ने कहा, ‘यदि मन का भाव शुद्ध न हो, तो दान, यज्ञ, तप, शास्त्रों का श्रवण, स्वाध्याय-सभी व्यर्थ हो जाते हैं। ज्ञान रूपी जल से स्नान करके अनेक पवित्र नदियों के स्नान का पुण्य प्राप्त होता है। ज्ञान रूपी चल राग-द्वेषमय मल को दूर करने की अनूठी क्षमता रखता है। असंयमी, अश्रद्धालु व संशयात्मा कितने ही तीर्थों की खाक छान ले, उसे पुण्य कदापि नहीं मिलता।’ प्रस्तुति : अक्षिता तिवारी

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