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अब उत्तर भारत पहाड़ों का मोहताज नहीं

06:36 AM Jan 20, 2024 IST
अब उत्तर भारत पहाड़ों का मोहताज नहीं
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सहीराम

उत्तर भारत इन दिनों अंटार्टिका हो लिया है जी, वैसे ही जैसे बारिश के दिनों में दिल्ली वेनिस बन गयी थी और पहाड़ों पर बादल फटने से जाने कितने नए चेरापूंजी बन गए थे। यह वैसे ही हुआ जैसे गर्मी में उत्तर भारत रेगिस्तान से भी ज्यादा तपता है। खैरजी, अब मौसम सर्दी का है तो सर्दी की ही बात कर लेते हैं। अभी तक हमें यह लगता था कि सर्दी पहाड़ों पर बर्फ गिरने से बढ़ती है। पर ऐसा कुछ भी नहीं है। इधर उत्तर भारत पहाड़ों का मोहताज नहीं रहा। सर्दी के मामले में वह आत्मनिर्भर हो गया है, वैसे ही जैसे कई गरीब देश अमेरिका के मोहताज न रहकर आत्मनिर्भर हो जाते हैं। प्रमाण सामने है जी। पहाड़ों पर तो बर्फ नहीं गिर रही। लेकिन उत्तर भारत में सर्दी जमकर पड़ रही है।
उत्तर भारत में सर्दी का मौसम पहाड़ों से मुक्त हो लिया है। इसे खुशखबरी की तरह प्रचारित किया जा सकता है, डोंडी पिटवाई जा सकती है। बशर्ते रजाई से निकलने का बूता आप में हो। अब इसे पुरानी मान्यता घोषित कर दिया जाना चाहिए कि पहाड़ों पर बर्फ गिरेगी तो सर्दी बढ़ेगी। देख लो पहाड़ों पर तो बर्फ गिर नहीं रही है। सर्दी फिर भी बढ़ रही है। एक मान्यता यह भी थी कि मैदानों में बारिश होगी तो सर्दी बढ़ेगी। लेकिन बारिश न होने के बावजूद सर्दी बढ़ रही है।
देख लेना साहबो, एक दिन वह भी आएगा और लगता है कि जल्द ही आएगा, जब गर्मी का मौसम भी रेगिस्तान से मुक्त हो लेगा। रेगिस्तान तो बेशक नहीं तप रहा होगा, पर दिल्ली, चंडीगढ़, लखनऊ, पटना सब तप रहे होंगे। मौसमों की यह स्वतंत्रता ठीक नहीं है जी। स्वतंत्र होकर वे बेरहम हो रहे हैं। बेलगाम हो रहे हैं। उद्दंड हो रहे हैं। चाहे सर्दी हो, गर्मी हो या बारिश हो। सर्दी को यह परवाह नहीं कि लोग शीत लहर से मर रहे हैं, गर्मी को यह परवाह नहीं कि लोग लू से मर रहे हैं, बारिश को यह परवाह नहीं लोग बाढ़ से तबाह हो रहे हैं। अरे भाई तुम सरकार थोड़े ही हो कि किसी की परवाह ही न करो। बेरहम बने रहो। लापरवाह बने रहो। मौसम हो, कुछ रहमदिली तो होनी चाहिए न।
वैसे भी रेगिस्तान में लू से मरने वालों के बारे में आपने नहीं सुना होगा, वैसे ही जैसे पहाड़ों में शीतलहर से मरते किसी को नहीं सुना होगा। यह विशेषाधिकार सिर्फ हमें ही हासिल है। शीतलहर से टें बोलेंगे तो हमीं बोलेंगे और लू से मरेंगे तो भी हमीं मरेंगे। यह इसलिए होता है कि ताकि दानवीरों को दान का और धर्मादा करने वालों को शीतलहर में कंबल बांटकर और गर्मियों में प्याऊ लगा कर धर्मादे का सवाब मिलता रहे। बतर्ज साहिर कहा जाए तो जिन्हें इतनी प्यारी है, दिल्ली की सर्दी, वो कहां हैं। रजाई से जरा निकलकर तो दिखाओ।

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