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राष्ट्रीय सुरक्षा नीति की आवश्यकता : वोहरा

06:52 AM May 01, 2024 IST
राष्ट्रीय सुरक्षा नीति की आवश्यकता   वोहरा
नयी दिल्ली में मंगलवार को कार्यक्रम के दौरान जम्मू-कश्मीर के पूर्व राज्यपाल एनएन वोहरा को स्मृति चिन्ह देते सेना के उपप्रमुख लेफ्टिनेंट जनरल उपेन्द्र द्विवेदी। - मानस रंजन भुई
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ट्रिब्यून न्यूज सर्विस
नयी दिल्ली, 30 अप्रैल
जम्मू-कश्मीर के पूर्व राज्यपाल एनएन वोहरा ने एक राष्ट्रीय सुरक्षा नीति की वकालत की है, जिसमें सुरक्षा ढांचे के सभी घटक हों। इसमें यह स्पष्ट होना चाहिये कि प्रत्येक घटक परस्पर कैसे जुड़ सकता है, कमांड संरचना क्या होगी, कौन जवाबदेह है और आकस्मिकता के मामले में प्रतिक्रिया क्या होगी।
वह मंगलवार को भारतीय सेना के मैकेनाइज्ड इन्फैंट्री सेंटर एंड स्कूल और सेंटर फॉर लैंड वारफेयर स्टडीज द्वारा आयोजित चौथे जनरल के. सुंदरजी स्मृति व्याख्यान में बोल रहे थे। वोहरा ने कहा कि जनरल सुंदरजी ने 1980 के दशक में इस पर कुछ लिखा था, लेकिन सरकारों ने कभी भी ऐसी नीति रखना प्रासंगिक नहीं समझा। कारगिल समीक्षा समिति का हिस्सा रहे वोहरा ने कहा कि समिति ने ऐसे अधिकारियों का एक समूह बनाने का सुझाव दिया था जो अपना पूरा जीवन रक्षा, गृह मामले, विदेश मामले या खुफिया एजेंसियों जैसे सुरक्षा संबंधी मंत्रालयों में बिताएंगे।
रक्षा सचिव (मार्च 1990 से अप्रैल 1993) सहित आठ वर्षों तक रक्षा मंत्रालय में सेवा दे चुके वोहरा ने कहा, ‘जनरल सुंदरजी सेना के दूरदर्शी अधिकारियों में से एक थे।’ जनरल सुंदरजी ने सेना प्रमुख (1986-1988) के रूप में अपने कार्यकाल के दौरान ‘ब्रासस्टैक्स’ एक्सरसाइज करवाई, युद्ध लड़ने में कमियों के बारे में बात की और सेना मैनुअल को फिर से लिखा।
वोहरा ने कहा, चार साल पहले वास्तविक नियंत्रण रेखा (एलएसी) पर चीनी आक्रमण के बाद शत्रुतापूर्ण गतिविधियाें का दबाव बना रहा। सशस्त्र बलों के इतिहास पर वोहरा ने कहा कि मुझे कोई कारण नहीं दिखता कि 1962 के भारत-चीन युद्ध पर आधारित ‘हेंडरसन ब्रोक्स रिपोर्ट’ को सभी प्रशिक्षण अकादमियों को क्यों नहीं भेजा जा सकता। उन्होंने कहा, ऑपरेशनल कमांड्स की संख्या कम करने में कोई जल्दबाजी नहीं होनी चाहिए (मौजूदा 17 कमांडों से), चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ को अपना समय लेना चाहिए।
केंद्रीय गृह सचिव (अप्रैल 1993 से मई 1994) के रूप में भी काम कर चुके वोहरा ने देश की ‘पुरानी समस्याओं’ का उल्लेख किया। उत्तर-पूर्व में जातीय झड़पें देखी जा रही हैं, इनमें से कुछ 1947 से पहले की हैं और कुछ विदेशी एजेंसियों द्वारा समर्थित हैं। दूसरा, खालिस्तान की मांग को पाकिस्तान द्वारा बढ़ावा दिया जाना है। वोहरा ने चेतावनी दी, ‘आंदोलन खत्म नहीं हुआ है’, समूह विध्वंसक प्रचार कर रहे हैं। पाकिस्तान ने जम्मू-कश्मीर में आतंकवाद को बढ़ावा दिया। ड्रग्स और हथियारों की तस्करी, नकली मुद्रा, अवैध इमिग्रेशन अन्य समस्याओं में से हैं। गृह मंत्रालय को सभी गैर-सुरक्षा कर्तव्यों को त्यागने और पूरे देश में सुरक्षा के लिए नोडल प्राधिकरण बनने की आवश्यकता है। केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बलों को चुनाव ड्यूटी के लिए नहीं बुलाया जाना चाहिए। वोहरा ने चेतावनी देते हुए कहा कि सेना के लिए लंबे समय तक आंतरिक सुरक्षा कर्तव्यों से सैनिकों का चरित्र बदल रहा है। सेना को केवल तभी हस्तक्षेप करना चाहिए जब विदेश समर्थित विद्रोह को बढ़ावा दिया जा रहा हो।

सेना प्रमुख जनरल मनोज पांडे ने जनरल सुंदरजी की दूरदर्शिता को रेखांकित किया। उन्होंने युद्धक्षेत्र के डिजिटलीकरण, सूचना युद्ध, प्रौद्योगिकी समावेशन, पारंपरिक रणनीतियों और बल संरचना के क्षेत्र में उनके दृष्टिकोण पर प्रकाश डाला, जो उनके ‘विज़न 2100’ में परिलक्षित होता है। सेना के पूर्व उप प्रमुख और राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार बोर्ड के सदस्य लेफ्टिनेंट जनरल सुब्रत साहा (सेवानिवृत्त) ने ‘भारत के सशस्त्र बलों का आधुनिकीकरण : जनरल के. सुंदरजी से सबक’ विषय पर व्याख्यान दिया।

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