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कथक के जरिये समाज सेवा का संदेश

07:50 AM Apr 05, 2024 IST
कथक के जरिये समाज सेवा का संदेश
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केवल तिवारी

मोक्ष का अर्थ है आपकी आत्मिक खुशी। जरूरतमंद की भलाई से बड़ी आत्मिक खुशी कुछ हो नहीं सकती। भारतीय परंपरागत नृत्यों में आध्यात्मिक संदेश छिपे हैं। कथक भी उनमें से एक है। इसलिए कह सकते हैं कि कला मोक्ष का सर्वोत्तम माध्यम है। ये बातें पिछले दिनों जाने-माने कथक नर्तक सदानंद बिस्वास ने इस बातचीत के दौरान कहीं।
एनएसडी से पासआउट सदानंद ने कथक के जयपुर घराने के सुप्रसिद्ध गुरु पंडित राजेंद्र गंगनानी के सान्निध्य में दीक्षा ली है। यह पूछने पर कि कथक में घरानों का विवाद क्या है, सदानंद ने कहा, ‘विवाद जैसी कोई बात नहीं। लखनऊ घराना, जयपुर घराना’ या फिर ‘बनारस घराना’, सबकी अपनी-अपनी शैली है और कथा को नृत्य के जरिये कहने का अंदाज है। जैसे जयपुर में वेशभूषा पर विशेष जोर दिया जाता है। कहीं ठुमरी गायन पर कथक का प्रचलन है। बनारस घराने में शिव महिमा का वर्णन किया जाता है।
क्या कथक में प्रयोग संभव है, पूछने पर सदानंद ने कहा, ‘प्रयोग के नाम पर अनेक लोगों ने बेड़ा गर्क किया है।’ कुछ समर्पित लोगों ने हल्के प्रयोग किए हैं, लेकिन भाषा की पवित्रता को जिसने बनाकर रखा, उनके प्रयोग सफल हुए हैं।’ उन्होंने कहा कि मूलत: हिंदी एवं संस्कृत भाषा की तालबद्धता में कथक नृत्य होता है। यह बहुत असान, समझ आने वाली और आत्मा तक पहुंचने वाली भाषाएं हैं।
मूलत: बंगाली सदानंद बिस्वास उत्तर भारत की इस नृत्यशैली की तरफ कैसे आकर्षित हुए, पूछने पर उन्होंने कहा कि कला उनको विरासत में मिली है। उनके पिता और दादा भी मूल प्रोफेशन के अलावा शौकिया तौर पर गायन, वादन में रहते थे, वहीं से उनका रुझान भी बढ़ा और कथक को ही जीवन समर्पित कर दिया। उन्होंने कहा कि नृत्य को बतौर प्रोफेशन अपनाकर मेरा उद्देश्य सेवा में जीवन समर्पण है। इसके लिए उन्होंने अनेक जगह आश्रमों में अपनी सेवाएं दी हैं। उत्तराखंड के अलावा अनेक जगह उनके सामाजिक सेवार्थ कई आश्रम हैं। गुरुओं के सान्निध्य में उन्होंने इन्हें शुरू किया है। सदानंद ने कहा कि जब बुजुर्गों को देखता हूं तो उनमें अपने माता-पिता नजर आते हैं। सुविधाविहीन बच्चों में भगवान नजर आते हैं। उनकी सेवा को लक्ष्य मानकर बढ़ रहा हूं।

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बातचीत के दौरान सदानंद ने कहा कि जो देश कला और संस्कृति के खिलाफ चलता है या उसके उत्थान के लिए कुछ नहीं करता, उसका पतन निश्चित है। उन्होंने अफगानिस्तान का उदाहरण देते हुए कहा कि एक समय था जब अफगानिस्तान कला, संस्कृति के मामले में चरम पर था, लेकिन कालांतर में उसका हश्र किसी से छिपा नहीं है।
करीब नौ देशों और भारत के हर राज्य में सरकारी, गैरसरकारी अलग-अलग कार्यक्रमों में प्रस्तुति दे चुके सदानंद कथक के जरिये समाज सेवा का संदेश देने को ही अपना जीवन का उद्देश्य बताते हैं। पिछले 12-13 सालों से ‘कथक धरोहर’ नामक संस्था के जरिये सदानंद इस उद्देश्य की दिशा में आगे बढ़ रहे हैं। एक श्लोक का अंश सुनाते हुए सदानंद कला के अर्थ को समझाते हैं। उन्होंने कहा, ‘सा कला या विमुक्तये’ अर्थात ‘कला वह है जो बुराइयों के बन्धन काटकर मुक्ति प्रदान करती है।’

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