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सरकंडे से बना मैटिरियल करेगा इंडस्ट्रियल वाटर को साफ

08:33 AM May 16, 2024 IST
सरकंडे से बना मैटिरियल करेगा इंडस्ट्रियल वाटर को साफ
भिवानी में बुधवार को प्रो. एसके कौशिक और उनकी रिसर्च टीम को स्मृति चिन्ह देती सीबीएलयू की कुलपति प्रो. दीप्ति धर्माणी। -हप्र
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भिवानी, 15 मई (हप्र)
चौधरी बंसी लाल विश्वविद्यालय (सीबीएलयू) शिक्षा एवं अनुसंधान के क्षेत्र में राष्ट्रीय एवं अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर नये कीर्तिमान स्थापित कर रहा है। इसी दिशा में विश्वविद्यालय ने नया पेटेंट अपने नाम पंजीकृत करवाकर इंटेलेक्चुअल प्रॉपर्टी की दिशा में कदम बढ़ाने शुरू कर दिए हैं। यह नयी उपलब्धि विश्वविद्यालय के केमिस्ट्री विभाग के प्रो. सुरेंद्र कौशिक व उनकी पीएचडी की छात्रा रही डॉ. अरुणा ने अपने नाम की है।
प्रो. सुरेंद्र कौशिक एवं उनकी रिसर्च टीम ने लैब में सरकंडे की लकड़ी से एक ऐसा मैटिरियल तैयार किया, जो उद्योगों में डाई के कारण खराब हुए पानी को साफ करने में सक्षम साबित हुआ। अक्तूबर 2022 में इस रिसर्च के पेटेंट के लिए पेटेंट कार्यालय भारत सरकार को पंजीकृत करने के लिए आवेदन किया गया था। इसके बाद सभी परीक्षणों में खरा उतरने के बाद इस रिसर्च के लिए भारत सरकार द्वारा 6 मई 2024 पेटेंट प्रमाण पत्र जारी किया गया, जो 20 अक्तूबर 2022 से 20 साल की अवधि के लिए अनुदत्त किया गया। प्रो. सुरेंद्र कौशिक ने बताया कि इस पर उन्होंने 2019 से काम शुरू किया था, जिसमें उनको अक्तूबर 2022 में सफलता मिली। डॉ. अरुणा विश्वविद्यालय के केमिस्ट्री विभाग की व उनकी पहली पीएचडी शोधार्थी हैं। उन्होंने बताया कि डॉ. अरुणा इन दिनों डीआरडीओ में वैज्ञानिक के रूप में अपनी सेवाएं दे रही हैं। प्रो. कौशिक ने बताया कि इस पेटेंट के वाणिज्यीकरण के लिए उनके द्वारा इसके विभिन्न पहलुओं पर विचार किया जा रहा है। जल्द ही यह उत्पाद बाजार में उपलब्ध हो सकता है। इस बड़ी उपलब्धि पर विश्वविद्यालय की कुलपति प्रो. दीप्ति धर्माणी, कुलसचिव डॉ. ऋतु सिंह, डायरेक्टर रिसर्च प्रो.संजीव कुमार, डीन एकेडमिक अफेयर्स प्रो. डीके मदान ने प्रो. एस के कौशिक और उनकी रिसर्च टीम को बधाई दी है।

क्या होता है सरकंडा

सरकंडा एक उष्णकटिबंधीय बारहमासीय प्राकृतिक पौधा है, जो अपने आप उगता है। यह मुख्य रूप से मरुस्थलीय क्षेत्र में पाया जाता है। इसकी लंबाई छह फीट तक होती है। इसमें चिकनी बनावट वाली लंबी, संकरी पत्तियां होती हैं। इसका प्रयोग मूंज की रस्सी बनाने में एवं प्राचीन समय से ही लिखने के लिए कलम बनाने में किया जाता था।

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