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भूकंप संग जीना

07:05 AM Apr 05, 2024 IST
भूकंप संग जीना
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बीते बुधवार को ताइवान ने पिछले पच्चीस साल में आए सबसे तेज भूकंप का सामना किया। निश्चित रूप से भूकंप से हमारे संरचनात्मक विकास सड़क, पुल व सार्वजनिक निर्माण को क्षति पहुंचती है। लेकिन ताइवान ने पिछले भूकंपों से हुई मानवीय त्रासदी से सबक लेकर जिस तरह जनधन की हानि को कम किया है, वह काबिले तारीफ है। इस भूकंप में गिनती के लोगों को जान गंवानी पड़ी। बड़ी बिल्डिंगें हिली मगर क्षति मामूली हुई। दरअसल, ताइवान ने आधुनिक तकनीक व कुशल अग्रिम सूचना की व्यवस्था से आपदा से होने वाली क्षति को टाला है। भूकंप के केंद्र उत्तरी तट पर स्थित ख्वालिएन में 7.4 तीव्रता के भूकंप से क्षति स्वाभाविक थी, लेकिन सुनियोजित राहत व बचाव से जनक्षति को कम किया जा सका। सुरंगों व इमारतों में फंसे लोगों को बचाने का काम तत्परता से किया जा रहा है। जहां तक इस पहाड़ी इलाके में भूस्खलन का सवाल है तो मानव उसे टाल नहीं सकता। भूकंप से बचाव के ताइवानी सिस्टम बेहतर ढंग से काम कर रहे हैं। वहीं दूसरी ओर जापान आदि पड़ोसी देशों ने भूकंप के बाद सुनामी की अग्रिम सुरक्षा चेतावनी जारी कर दी। दरअसल भूकंप से होने वाली क्षति इस बात पर निर्भर करती है वह किस समय आया। बुधवार को आया भूकंप सुबह आया, यदि यह देर रात या तड़के आता तो क्षति ज्यादा हो सकती थी। यद्यपि ताइवान में भी सड़क व रेल परिवहन प्रभावित जरूर हुआ है। दरअसल, सितंबर 1999 में ताइवान में आए 7.6 तीव्रता के भूकंप में करीब ढाई हजार लोगों की मौत हुई थी और करीब पांच हजार इमारतें क्षतिग्रस्त हुई थीं। जिसके बाद वहां भवन व सार्वजनिक निर्माण में सुरक्षा मानकों को गंभीरता से लिया गया। इन मानकों का पालन अनिवार्य रूप से किया गया और सख्ती से उसकी निगरानी की गई। सरकारों की सजगता व नागरिकों की जागरूकता ने इस संकट का मुकाबला करना सीख लिया। वहीं हमारे सामने जापान दुनिया का अकेला ऐसा देश है जो इतने बड़े भूकंपों के बाद नुकसान कम करने में सफल रहा।
दरअसल, मनुष्य को भूकंप से ज्यादा हमारे निर्माण कार्य की गुणवत्ता की कमी और नियमों की अनदेखी मारती है। भारत में भूकंप से बचाव के लिये पर्याप्त अनुसंधान हुए और सुरक्षित घरों के लिये कोड बने हैं। लेकिन संकट उनके ईमानदारी से क्रियान्वयन तथा आर्थिक संसाधनों के अभाव का है। घर खरीदने वाले लोगों को उलटे उस्तरे से मूंडने वाले बिल्डर इन मानकों का इस्तेमाल करने से गुरेज करते हैं क्योंकि इसे लागू करने से उनका मुनाफा कम हो जाता है। गरीब व्यक्ति जैसे-तैसे मकान तो बना लेता है लेकिन भूकंप के मानकों का इस्तेमाल नहीं कर पाता। सरकारी गंभीरता भी नजर नहीं आती। सरकारों की प्राथमिकता आपदा के बाद राहत सामग्री व मुआवजा बांटने में होती है। समय रहते भवन निर्माण में भूकंप से बचाव के कोड लागू करवाने में संबंधित विभाग लगातार आपराधिक लापरवाही दर्शाते रहते हैं। हमें जापान से सबक लेना चाहिए जिसने भूकंप के साथ जीना सीख लिया है। वर्ष 2011 में भयावह नौ तीव्रता के भूकंप से जो तबाही हुई और उसके बाद सुनामी ने कहर बरपाया, उसके बाद जापान सरकार ने जनक्षति टालने के लिये गंभीर पहल की। इशिकावा की तबाही व फुकुशिमा की पॉवर प्लांट दुर्घटना के सबकों को जापान ने गंभीरता से लिया। आज भूकंप के अलार्म की चेतावानियां जापानियों के लिये आम बात है। हम मान लें कि बड़ा भूकंप कभी भी आ सकता है तो क्या हमारी इमारतें इसके लिये सुरक्षित हैं? जापान ने 2011 की त्रासदी के बाद भूकंपपरोधी निर्माण में कोई चूक नहीं की। वैसे तो वहां 1981 के बाद भवन निर्माण में सुरक्षा मानकों को अनिवार्य कर दिया गया था, लेकिन बाद के अनुभवों के साथ इन मानकों में लगातार सुधार भी किया गया। यही वजह थी कि इशिकावा के तेज भूकंप के बाद अधिकांश इमारतें सुरक्षित रहीं। जापान ने याद रखा कि कांतो भूकंप के बाद इस शहर का बड़ा हिस्सा समतल हो गया था। जिसके बाद पहले भूकंप प्रतिरोधी बिल्डिंग कोड बनाया गया। फिर भवन निर्माण में स्टील व कंक्रीट का प्रयोग अनिवार्य हो गया। हर नये भूकंप के बाद नियम बदले जाते हैं।

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