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आपदा के सबक

06:43 AM Feb 03, 2024 IST
आपदा के सबक
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बहुत समय नहीं हुआ जब मानसून में भारी वर्षा व भूस्खलन के चलते हिमाचल प्रदेश के विभिन्न भागों में जन-धन की व्यापक क्षति हुई थी। ढहती मंजिलें और दरकते पहाड़ पूरे देश को भयाक्रांत कर रहे थे। कहीं न कहीं संवेदनशील हिमालयी पहाड़ आबादी के बोझ और अनियोजित निर्माण का दबाव सहन नहीं कर पा रहे हैं। हिमाचल जैसी स्थितियों से उत्तराखंड के कई शहर भी जूझ रहे हैं। जोशीमठ का धंसना इस कड़ी का विस्तार ही है। मानसून के दौरान हिमाचल की राजधानी व अन्य शहरों में अतिवृष्टि से हुई व्यापक क्षति के बाबत राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण का आकलन इस दिशा में व्यापक अवलोकन की जरूरत बताता है। ताकि नियमित निगरानी के साथ मानकों के पालन को सुनिश्चित किया जा सके। प्राधिकरण की रिपोर्ट पिछले मानसून में हुई व्यापक क्षति के कारणों और ऐसी स्थिति से बचने के उपायों पर प्रकाश डालती है। ऐसे में जरूरी हो जाता है कि राज्य सरकार राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण के निष्कर्षों और सिफारिशों पर गंभीरता पूर्वक विचार करे। निश्चित रूप से इन घटनाओं से सबक लेने और चेतावनी के संकेतों को नजरअंदाज न करने की जरूरत है। साथ ही जरूरी है कि जनमानस के अवचेतन में उन विनाशकारी घटनाओं के कारणों से बचने की चेतना विद्यमान रहे। निश्चित रूप से तेजी से होता शहरीकरण पहाड़ी राज्यों की बड़ी चुनौती है। भूमि का गलत उपयोग और ग्रामीण इलाकों में भवन निर्माण मानदंडों की अनदेखी घरों की सुरक्षा के लिये गंभीर चुनौती पैदा कर रही है। दरअसल, संवेदनशील पर्वतीय पारिस्थितिकी में अनियोजित विकास पर्यावरणीय संकट के साथ ढांचागत चुनौतियांं भी पैदा कर रहा है। कहीं शासन-प्रशासन की नियमित निगरानी के अभाव में भवन निर्माण के सुरक्षित मानकों की अनदेखी की जा रही है। जिसके चलते आपदा के जोखिमों में वृद्धि ही हुई है। स्थानीय निकायों के स्तर पर जिस जिम्मेदार व्यवहार का पालन किया जाना चाहिए, वह भी नदारद है। राजनीतिक हस्तक्षेप व निहित स्वार्थों के चलते भवन निर्माण से जुड़े कानून ताक पर रख दिए जाते हैं।
राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण के हालिया अध्ययन में बार-बार कहा गया है कि नियमों के कड़ाई से पालन और निर्माण कार्यों के नियमित ऑडिट का कोई दूसरा विकल्प नहीं है। निस्संदेह, पर्यावरण व भवन निर्माण से जुड़े विशेषज्ञ बार-बार इन्हीं मुद्दों की ओर ध्यान दिलाते रहे हैं। लेकिन सत्ताधीश इस दिशा में गंभीर नजर नहीं आते। दरअसल, शहरों की योजना सीमा के बाहर ग्रामीण क्षेत्रों में खड़ी ढलानों पर अनधिकृत संरचनाएं और निर्माण मानदंडों की अनदेखी प्राकृतिक आपदा की स्थिति में जन-धन की सुरक्षा के लिये एक गंभीर चुनौती पैदा करती है। वास्तव में, पहाड़ी इलाकों में भवन निर्माण से जुड़े नियमों-उपनियमों पर गंभीरता से पुनर्विचार करने की जरूरत है। साथ ही प्राकृतिक जल निकासी प्रणालियों को अवरुद्ध करने वाले कारकों पर रोक लगाने की सख्त जरूरत है। जो अतिवृष्टि की दशा में जानलेवा संकट पैदा कर देते हैं। जरूरत इस बात की भी है कि पहाड़ों की प्रकृति के अनुरूप भवन निर्माण शैली को प्रोत्साहन दिया जाए। खासकर भवन निर्माण की उस परंपरागत शैली को, जिसमें लकड़ी और मिट्टी का उपयोग होता रहा है, जो दीवारों में लचीलापन पैदा करती है। निस्संदेह, इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता है कि शहरीकरण और पर्यटन की पहाड़ी राज्यों की आर्थिक उन्नति में महत्वपूर्ण भूमिका होती है। लेकिन कहीं न कहीं ये सब नीतिगत बदलावों के मार्ग में बाधक भी बनते हैं। बहरहाल, इस दिशा में चाहे कितनी बाधाएं हों, हिमाचल प्रदेश यथास्थिति के विकल्प को नहीं चुन सकता। पहाड़ी परिवेश की संवेदनशीलता के मद्देनजर जन-धन की हानि को टालने के लिये इस दिशा में नियमति निगरानी अपरिहार्य ही है। ग्लोबल वार्मिंग के संकट के मद्देनजर बारिश के ट्रेंड में आए बदलाव से इसकी तीव्रता बढ़ी है। कम समय में ज्यादा मूसलाधार बारिश का रुझान भी देखा गया है, जो भूस्खलन की पुनरावृत्ति को बढ़ाता है। इससे उपजे संकट को टालने के लिये जहां शासन-प्रशासन से जिम्मेदार व्यवहार की उम्मीद की जाती है, वहीं नागरिकों के स्तर पर भी जागरूकता की जरूरत है।

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