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मुक्ति की राह दिखाती जया एकादशी

09:14 AM Feb 19, 2024 IST
मुक्ति की राह दिखाती जया एकादशी
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राजेंद्र कुमार शर्मा
हिंदू पंचांग के अंतर्गत प्रत्येक माह की 11वीं तिथि को एकादशी कहा जाता है। यह दिन शंख-चक्र, गदाधारी भगवान विष्णु की आराधना के लिए समर्पित है। एक महीने में दो पक्ष होने के कारण दो एकादशी होती हैं, एक शुक्ल पक्ष में तथा दूसरी कृष्ण पक्ष में। इस प्रकार वर्ष में कम से कम 24 एकादशी हो सकती हैं, परन्तु अधिक मास की स्थिति में यह संख्या 26 भी हो सकती हैं।
धर्मराज युधिष्ठिर भगवान श्रीकृष्ण से निवेदन करते हैं कि माघ शुक्ल एकादशी का महात्म्य समझाएं। श्रीकृष्ण कहते हैं, ‘हे युधिष्ठिर! माघ माह की शुक्ल पक्ष की एकादशी को ‘जया एकादशी’ कहते हैं। यह एकादशी पुण्यदायी है, इसका व्रत करने से साधक भूत, प्रेत, पिशाच की योनि से मुक्त हो जाता है। श्रीकृष्ण, युधिष्ठिर को इस व्रत के महात्म्य की कथा सुनाते हुए कहते हैं :-
नंदन वन में एक उत्सव के दौरान सभी देवता, सिद्ध संत और दिव्य पुरुष उपस्थित थे। उस समय गंधर्व गायन कर रहे थे और गंधर्व कन्याएं नृत्य प्रस्तुत कर रही थीं। उत्सव में माल्यवान नामक एक गंधर्व और पुष्पवती नामक गंधर्व कन्या का नृत्य चल रहा था। दोनों की नजर एक-दूसरे पर पड़ी और दोनों एक-दूसरे के प्रति आकर्षित हो गायन और नृत्य की मर्यादा भूल बैठे। जिससे सुर ताल और नृत्य भंगिमा ने उनका साथ छोड़ दिया।
इन्द्र को पुष्पवती और माल्यवान के अमर्यादित कृत्य पर क्रोध हो आया और उन्होंने दोनों को शाप दे दिया कि दोनों को मृत्यु लोक में अति नीच पिशाच योनि प्राप्त हों। इस शाप के प्रभाव से दोनों पिशाच बन गये और हिमालय पर्वत पर एक वृक्ष पर दोनों अत्यंत कष्टमय जीवन व्यतीत करने लगे। एक बार अनजाने में माघ शुक्ल पक्ष की एकादशी के दिन दोनों केवल फलाहार पर रहे। रात्रि बहुत ठंड के कारण दोनों रातभर साथ बैठ कर जागते रहे। अनजाने में जया एकादशी का व्रत हो जाने से दोनों को पिशाच योनि से मुक्ति मिल गयी। अब माल्यवान और पुष्पवती पहले से भी सुन्दर हो गए और पुनः स्वर्ग लोक में उन्हें स्थान मिल गया।
देवेंद्र ने जब दोनों को देखा तो चकित रह गये और उनके पिशाच योनि से मुक्ति का मार्ग पूछा। माल्यवान के कहा यह भगवान विष्णु की जया एकादशी व्रत का शुभ फल है। इन्द्र इससे अति प्रसन्न हुए और कहा कि आप जगदीश्वर के भक्त हैं इसलिए आप अब से मेरे लिए आदरणीय हैं, आप स्वर्ग में आनन्द पूर्वक विहार करें।
कथा सुनाकर श्रीकृष्ण कहते हैं कि यह कथा बताती है कि संगीत, देवी सरस्वती द्वारा प्रदत्त एक साधना, एक विद्या है। इसमें संयम, मर्यादा और पवित्रता आवश्यक है। सभा में अपने से बड़े गुरुजन का अपमान करने वाला मनुष्य घोर नरक का भागी बनता है। जो श्रद्धालु भक्त इस एकादशी का व्रत रखते हैं भूत पिशाच योनि के भय से सदा के लिए मुक्त हो जाते है। हर लोक में सुख भोगते हैं।

पूजा-विधान

एकादशी के दिन साधक प्रातः व्रत का संकल्प लेते हैं। इसके उपरांत भगवान विष्णु के मूर्ति या तस्वीर स्थापित की जाती है। भगवान नारायण को पीला चंदन, अक्षत, फूल, माला, फल, पंचामृत, तुलसी दल आदि अर्पित करके विधिवतत‍ पूजा करते हैं। पूजा के बाद ब्राह्मणों, असहाय और निर्धन बच्चों को भोजन और जरूरतमंदों को दान आदि देने का विधान है।
पूरे दिन व्रत रखें संभव हो तो रात्रि में जागरण करें। द्वादशी के दिन ब्राह्मणों को भोजन करवाकर उन्हें जनेऊ सुपारी देकर विदा करें फिर भोजन करें। इस प्रकार नियम, निष्ठा से व्रत रखने से व्यक्ति पिशाच योनि से मुक्त हो जाता है और सभी प्रकार की सुख-समृद्धि प्राप्त होती है। एकादशी व्रत के दौरान सभी प्रकार के अनाज का सेवन वर्जित होता है, विशेषकर भोजन में चावल का प्रयोग नहीं करना चाहिए। जो व्यक्ति एकादशी के दिन विष्णुसहस्रनाम का पाठ करता है, उस पर भगवान विष्णु की विशेष कृपा होती है।

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शुभ मूहर्त

हिन्दू पंचांग और ज्योतिष शास्त्रियों के मतानुसार इस बार माघ में जया एकादशी 20 फरवरी को है। एकादशी व्रत का आरंभ सूर्योदय से होता है और इसके अगले दिन द्वादशी तिथि को समाप्त होता है।

मुक्ति का द्वार

जया एकादशी को मुक्ति का द्वार कहा जाता है। कहा जाता है कि जो भी इस दिन व्रत रखता है और भगवान नारायण की पूजा करता है उसे मृत्यु के पश्चात पिशाच योनि से मुक्ति मिल जाती है। व्रत रखने वाले लोगों को भगवान विष्णु का आशीर्वाद प्राप्त होता है। साथ ही आजीवन मां लक्ष्मी की कृपा उसके ऊपर बरसती रहती है। जया एकादशी को जन्म एवं पूर्व जन्म के समस्त पापों का नाश करने वाली माना जाता है। इस एकादशी का उल्लेख सनातन धर्म के पद्म पुराण में मिलता है। जिसमें कहा गया है, ‘जिसने जया एकादशी का व्रत किया है और दान दिया है, उसे अग्निष्टोम यज्ञ आयोजित कराने के समान पुण्य फल की प्राप्ति होती है।’

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दान का महत्व

किसी भी उपवास या व्रत रखने के बाद गरीब और जरूरतमंदों को दान देना सनातन परंपरा में बेहद पुण्यकारी माना जाता है। हिन्दू सनातन परंपरा में अन्न का दान सबसे उत्तम माना जाता है। इसलिए इस दिन निर्धन बच्चों को भोजन कराने से भगवान विष्णु का आशीर्वाद प्राप्त होता है।

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