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खुशी का पैगणना में भारतीय जीवन दर्शन भी हो शामिलमाना

06:43 AM Apr 02, 2024 IST
खुशी का पैगणना में भारतीय जीवन दर्शन भी हो शामिलमाना
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खुशी मापने के वैश्विक पैमाने को लेकर तमाम किंतु-परंतु रहे हैं लेकिन फिर भी भारत के नीति-नियंताओं को इस सवाल पर आत्ममंथन करना चाहिए कि भारत दुनिया के करीब 140 देशों में 126वें नंबर पर क्यों है। खुशी मापने के पश्चिमी चश्मे पर हमेशा से ही सवाल उठते रहे हैं, फिर भारत जैसे विशाल जनसंख्या व सांस्कृतिक विविधता वाले देश को एक पैमाने से मापना अतार्किक ही है। हो सकता है जिस बात पर अमेरिकी नागरिक खुश होते हों, वह एक आम भारतीय की खुशी की वजह न हो। सही मायनों में खुशी का आधार संतोष होता है। जो एक सापेक्ष स्थिति है। एक मन:स्थिति है। फिर भारत जैसे देश का दर्शन भौतिक संपदा के बजाय आंतरिक शांति और संतुष्टि में खुशी तलाशता रहा है। फकीरों की मौज को खुशी के पैमाने पर कदापि नहीं आंका जा सकता। वैसे पश्चिमी मापदंड के आधार पर कर्ज में डूबे व अराजकता से जूझते देश पाकिस्तान को भारत के मुकाबले ज्यादा खुशहाल बताने का तर्क गले से नहीं उतरता। इस बार की वर्ल्ड हैपीनेस रिपोर्ट में एक बार फिर सातवीं दफा फिनलैंड लगातार खुशहाल देश बना है। उसके बाद डेनमार्क व आइसलैंड का नंबर आता है। ये देश विकसित मगर भारत के एक छोटे शहर की जितनी आबादी वाले देश हैं। निस्संदेह, बड़ी जनसंख्या का हमारी नागरिक सेवाओं पर प्रतिकूल असर पड़ता ही है। भले ही हमारे नीति-नियंताओं की नीतियों में खोट रहे हों और भ्रष्टाचार व्यवस्था को लीलता रहा है, लेकिन हम कैसे भूलें कि देश सदियों की गुलामी से निकलकर अपने पैरों पर खड़ा हुआ है। भले ही देश में घनघोर आर्थिक असमानता हो, लेकिन फिर भी आज देश की आर्थिक विकास की दर दुनिया में सबसे ज्यादा है। जरूरी है कि आर्थिक विकास समतामूलक होना ही चाहिए। लेकिन यहां एक सवाल यह भी है कि क्या आर्थिक संपन्नता ही खुशी का आधार है? अगर वाकई आधार है तो क्यों आम भारतीयों के सपनों का अमेरिका पहले दस खुश देशों की सूची से बाहर है? क्यों कोई भी विकसित बड़ा राष्ट्र पहले दस खुश देशों में शामिल नहीं है?
बहरहाल, वैश्विक खुशी का सूचकांक हमारे नीति-नियंताओं को आत्ममंथन का मौका देता है। सत्ताधीशों को विचार करना होगा कि आखिर आम भारतीय कैसे खुश हो सकता है। देश में गुणवत्तापूर्ण स्वास्थ्य सेवाएं और बेहतर शिक्षा व्यवस्था कैसे स्थापित की जा सकती हैं। देश में व्याप्त सामाजिक कुरीतियों, जातीय भेदभाव, निरक्षरता और आर्थिक असमानता को दूर करने की गंभीर पहल तो होनी ही चाहिए। बेरोजगारी की समस्या को प्राथमिकता के आधार पर संबोधित करने की जरूरत है। महिलाओं को सशक्त बनाकर अर्थव्यवस्था में उनकी बड़ी भूमिका निर्धारित की जानी चाहिए। लोगों का देश की कानून व्यवस्था के प्रति भरोसा बने, ऐसी नीतियों को क्रियान्वित करने की जरूरत है। कोशिश होनी चाहिए कि देश में प्रति व्यक्ति आय बढ़े। सत्ताधीशों की विश्वसनीयता बने और संवैधानिक संस्थाओं को मजबूती प्रदान की जाए। यदि ऐसा होता है तो देश में खुशी के सूचकांक में सुधार संभव है। भारतीय सामाजिक तानेबाने की अपनी विशेषताएं रही हैं। उसे वैश्विक मंच पर मान्यता दिलाने की जरूरत है। उल्लेखनीय है कि इस रिपोर्ट का एक सकारात्मक पक्ष यह भी है कि भारतीय वृद्धों में जीवन के प्रति संतुष्टि का स्तर ऊंचा है। इसका आधार भारतीय जीवन मूल्यों की मजबूती भी है। जबकि पश्चिमी देशों में वृद्धों की बड़ी आबादी आज भी एकाकी जीवन के त्रास को झेल रही है। भारत में संयुक्त परिवारों में बिखराव के बावजूद बड़ी आबादी फिर भी अपने बुजुर्गों का ख्याल रखती है। दरअसल, मीडिया में प्रकाशित नकारात्मक समाचारों से आम लोगों में भारतीय पारिवारिक मूल्यों के प्रति भ्रामक धारणा बनती है। इसके बावजूद आम भारतीय के जीवन स्तर को सुधारने के लिये कई मोर्चों पर अभी बहुत कुछ किया जाना बाकी है। देश में सामाजिक समरसता और सांप्रदायिक सद्भाव की दिशा में भी बहुत काम किये जाने की जरूरत है। जीवन की गुणवत्ता में धनात्मक बदलाव के लिये सरकारों, सामाजिक संगठनों व सामुदायिक संस्थाओं को रचनात्मक पहल करने की जरूरत है। यदि ऐसा होता है तो अगली बार खुशी के सूचकांक में उत्साहवर्धक परिणाम हो सकते हैं।

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