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बेघर लोग

07:15 AM Oct 29, 2023 IST
बेघर लोग
चित्रांकन : संदीप जोशी
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सुरिंदर गीत

सर्दियों के दिन थे। गांव में लोग रात को खाने-पीने से निपटकर जल्दी ही सो जाते हैं। रात के दस बजे तक तो कई आधी नींद भी पूरी कर लेते हैं। ढोल-ढमाके पर लचर-से गानों की आवाज़ आ रही थी। मैं सोने का यत्न करती थी, पर यह शोर इतना कानफोड़ू था कि नींद भी तड़प रही थी। मेरे पास वाले बिस्तर पर मेरी मां भी करवटें बदल रही थी। मैं समझ रही थी कि मां की हालत भी मेरे जैसी है। पता नहीं, कब यह शोर-शराबा खत्म हुआ और कब मुझे नींद आई।
सवेरे जागने पर पता चला कि गांव में किसी लड़की का विवाह था। कल शाम को लड़के वाले लड़की वालों के घर आए थे। शगुन की रस्म पूरी करने। विवाह की रस्म अभी परसों पूरी होनी थी।
शगुन की रस्म हो गई थी। इस खुशी में रात देर तक डीजे चलता रहा था। आज तीसरे दिन लड़की के आनंद-कारज यानी फेरे होने थे। आनंद-कारज के बाद गांव से कुछ दूर मैरिज पैलेस में फिर ऐसा वैसा ही शोर-शराबा होना था। खाने-पीने का प्रबंध भी मैरिज पैलेस में ही किया गया था। आनंद कारज की रस्म गांव के गुरु घर में ही होनी थी।
बीबी यानी मेरी मां को रात में अच्छी तरह नींद न आने के कारण सवेरे काफी देर से उसकी आंख खुली। नींद तो हालांकि मुझे भी ठीक से नहीं आई थी, पर मैं जैसे-तैसे जाग गई थी। बीबी ने चाय पीने से पहले ही बात शुरू कर दी। बीबी गहरा सांस भरकर कहने लगी, ‘तेरा बापू जिन्दा था तो मुझे गांव में किसी ग़मी-खुशी में जाने की ज़रा भी फिक्र नहीं थी। मेरी बात मानकर तू मैरिज पैलेस जाकर लड़की को शगुन डाल आना। तुझे जाना ही पड़ेगा। और कौन जाएगा। मेरे से तो चला नहीं जाता। नहीं तो मैं तुझे कहती ही नहीं।’
‘बीबी, मुझे तो मुश्किल-सा लगता है। मेरी तो अभी जहाज की थकान ही नहीं उतरी।’ मैंने मुश्किल से कहा।
‘न तो फिर कौन जाएगा?… अगर तू यहां न होती तो मैं किसी के हाथ शगुन भेज देती।’
‘बीबी, तू फिक्र न कर। मैं हो आऊंगी।’ मैंने मां की चिंता दूर करने के लिए कहा।
करीब ग्यारह बजे मैं विवाह पर जाने के लिए तैयार हुई। मैरिज पैलेस में होने वाली शादियों के बारे में काफी कुछ सुन रखा था। हालांकि थकान और पिछली रात डीजे की आवाज़ ने शरीर तोड़ रखा था, पर मन में मां का हुक्म था और थोड़ा-बहुत विवाह देखने का चाव भी।
मुझे लड़की के परिवार की आर्थिक स्थिति का भी ज्ञान था, थोड़ी-बहुत बात मुझे कार में आते-आते ड्राइवर ने बता दी थी कि इन्होंने गांव के पास वाला खेत बेच दिया है। इस उम्मीद में कि लड़की के पीछे-पीछे हमारा सारा परिवार भी बाहर चला जाएगा। मुझे बात कुछ-कुछ समझ में आ गई। अब मैं जानना चाहती थी कि लड़का किस देश से आया है। ड्राइवर गांव का ही लड़का था, इसलिए उसको सारी बात का पता था। मेरे पूछने पर उसने बताया कि लड़का किसी अरब देश से आया है। कुछ ही दिनों की छुट्टी पर। कहते हैं, इसीलिए जल्दी-जल्दी विवाह रख लिया और ज़मीन भी सस्ते में बेचनी पड़ी।
यह सब सुनकर मैं लड़की और उसके परिवार के भविष्य को लेकर चिंतातुर हो गई। अनेक तरह की सोच ने मुझे घेर लिया। अरब देश में पता नहीं कैसे रहता होगा। लड़की संग जा सकेगी या नहीं। बाकी परिवार तो क्या जा पाएगा। क्या मालूम, इस परिवार का कोई लड़का वर्क-परमिट पर कुछ समय के लिए चला जाए। दो किल्ले ज़मीन बेच दी है। विवाह पर इतना खर्चा करने, डीजे लगाने, दहेज में कार देने की और मैरिज पैलेस में इतना बड़ा आडंबर रचाने की क्या ज़रूरत थी। लड़की कब जाएगी इस लड़के के साथ। यह कौन-सा कैनेडा, अमेरिका या आस्ट्रेलिया में है जहां पहुंचकर लड़की अपने मां-बाप और बहन-भाइयों को उधर बुलाने के लिए एप्लाई कर देगी। सोचते-सोचते मैरिज पैलेस आ गया।
वहां पहुंचकर वो सब कुछ सिद्ध हो गया जो मैंने सुन रखा था। खाने-पीने का कोई हिसाब नहीं था। बैरे इस तरह लोगों के पीछे-पीछे जूस, कोका कोला और अनेक प्रकार के ड्रिंक लिए घूमते थे, मानो लड़की को ब्याहने के लिए कोई राजा-महाराजा आया हो। शाही शानो-शौकत थी चारों तरफ। पचास-साठ हजार का लहंगा भी लड़की ने पहन रखा था। लड़के की शेरवानी भी पटियाले के महाराजा का भ्रम देती थी। यह सब नज़ारा मुझे किसी दूसरे ही जहान का लगता था। यह शादी उन शादियों से बिलकुल अलग थी जो हम बचपन में इसी गांव में देखते थे। उन शादियों में मुझे कभी किसी किस्म की चिंता नहीं लगी थी, पर अब तो मैं सोच-सोचकर पागल हो रही थी।
कुछ देर बाद गाने-बजाने का कार्यक्रम शुरू हो गया। स्टेज पर अधनंगी लड़कियां लचर और भौंडे गानों पर जहां अपने शरीर की नुमाइश कर रही थीं, वहीं पंजाबी संस्कृति को भी दांत चिढ़ा रही थीं। स्टेज के नीचे पहली कतार में बैठे बापू और बाबा मुर्गियों की टांगे चबाते, व्हिस्की के घूंट भरते वहशी नज़रों के साथ अपनी बेटियों, पोतियों, दोहतियों की उम्र की लड़कियों की देहों को चीर रहे थे। मैं यद्यपि लंबे समय से पश्चिमी सभ्यता में रह रही थी, पर मेरी नज़रें ऊपर नहीं उठ रही थीं। मेरा दिल रो रहा था। मेरा मन विलाप कर रहा था, किशोर उम्र की लड़कियों का जिस्मानी शोषण देख कर। मन करता था, मैं इस देसी घटिया मुजरे को चीख कर बंद करवा दूं, पर सब कुछ मेरी पहुंच से बाहर था।
मैंने शगुन वाला लिफाफा लड़की के पिता को दिया और मनभर का बोझ अपने दिल-दिमाग पर लेकर घर लौट आई। मां ने मेरी उदासी देख ली थी। मां को भी मेरी वाली ही चिंता थी कि दो किल्ले ज़मीन बेच दी है इस विवाह की खातिर। अब तो दौड़े फिरते हैं, बाद में खाएंगे कहां से। जो मैं सोच रही थी, वही मेरी मां सोच रही थी। हमने इस सोच की पीड़ा भी साझी की। मैंने रोटी भी घर आकर ही खाई।
दो साल बाद मैं फिर भारत आई। मां ने बड़े ही दुख के साथ बताया कि लड़के ने लड़की को अभी बुलाया नहीं, वह यहीं निठल्ली घूम रही है। निठल्ली से मतलब बिना किसी रोजगार के। लड़की ने बीए की हुई थी, पर इस देश में किसी बीए-एमए की क्या कीमत है।
मैंने मां से पूछा कि क्या उनके दामाद ने उनके बेटे को बुला लिया है किसी अरब देश में?
‘नहीं। मैंने तो लोगों से सुना है कि वहां कोई पक्का भी नहीं होता।’ मां ने बड़ी मुश्किल से अपने अंदर की बात बाहर निकाली।
‘मुझे ज्यादा तो नहीं पता, पर इस तरह ही सुना है मैंने।’ मैंने अपनी मां के चेहरे की तरफ देखते हुए कहा। मुझे पता था मां की आदत का, वह किसी का दुख अपना दुख समझ बैठती है।
मां का मन भरा पड़ा था। मैंने उसकी आंखें नम देखकर कहा, ‘बीबी, हम क्या कर सकते हैं, इस तरह के और बहुत सारे परिवार हैं जिन्होंने महंगे विवाह करके अपना सब कुछ लुटा लिया है। पता नहीं क्या हो गया है हमारे लोगों को। खोखली शेखियां मारते लोगों को रब क्यों अक्ल नहीं देता। तुम यूं ही फालतू में न सोचो उनके बारे में।’
अभी कुछ ही दिन बीते थे कि विवाह वाली लड़की की मां और पिता, दोनों सवेरे-सवेरे हमारे घर आ गए। मेरा माथा ठनका। सुख हो। मां भी सहम गई।
मैंने काम वाली लड़की को चाय बनाने के लिए कहा।
‘नहीं नहीं, चाय तो रहने दो, हम बस पीकर ही आए हैं। ज्यादा चाय भी कलेजा जला देती है। एक ज़रूरी काम से आए थे। सोचा हो आते हैं और शिंदर से भी मिल आते हैं।’
‘अच्छा किया चाचा जी,’ मैंने धीमी आवाज़ में कहा।
आसपास के घरों में वह मेरे चाचा ही लगते थे। चाय बन गई थी और काजल कपों में डालकर ले आई। उन्होंने बमुश्किल चाय अपने अंदर उड़ेली। मैं उनके चेहरे के हाव-भाव देख रही थी। पता नहीं, क्या काम है जो उनकी जुबान से बाहर नहीं आ रहा था।
चाय वाला खाली कप नीचे रखते हुए चाचा ने मेरी मां की ओर मुंह करके बात शुरू की। उसकी आवाज़ में बेइंतिहा दर्द था जिसे मैंने महसूस किया।
‘भाबी, तुझे तो पता है, बेटी का विवाह हमने दो किल्ले ज़मीन बेचकर किया है। तब पैसों की ज़रूरत थी। कोई ग्राहक नहीं मिल रहा था। जो ग्राहक मिला, वह कहता था कि अगर ज़मीन बेचनी ही है तो सड़क पर लगने वाले किल्ले दे दो। एक किल्ले में तो हमारा घर था जो अभी हाल ही में अलग होते समय बनवाया था, गुजारे योग्य। तब उसके साथ बात तय की थी कि अगली फसल के समय कब्ज़ा देंगे। सोचा तो था कि पांच-छह महीनों में लड़की और साथ ही बड़े लड़के का काम बन जाएगा। बाहरी मुल्क से पैसा आने लग जाएगा। सड़क से थोड़ा हटकर दो कमरे छत लेंगे।’
चाची की आंखों में पानी छलक आया।
‘बहन जी, हम तो बिलकुल ही लुट गए। विवाह क्या किया, सिर पर से छत भी गंवा ली। घर से बेघर हो गए।’ चाची ने चुन्नी के पल्लू से आंखें पोंछते हुए कहा।
‘न, फिर भी क्या बात हो गई?’ मेरी मां ने चाची का हाथ दबाते हुए कहा।
चाचा का कंठ भर आया था।
‘होना क्या था, दामाद वापस आ गया है। हमने तो सोचा था कि वहां पक्का होगा। वह तो ससुरा परमिट पर गया था। वहां किसी के साथ लड़ाई-झगड़ा हो गया। ठेकेदार ने परमिट और आगे नहीं बढ़ाया। अब लौट आया है गांव। निठल्ला घूमता है।’ चाचा सारी बात एक ही सांस में कह गया। उसके इन शब्दों में अत्यंत पीड़ा भरी थी।
‘अब तो बहन जी, हम तेरे पास आए हैं कि अगर हम तुम्हारे बाहर वाले घर में रहने लगें तो...। हम बहुत ही आस लेकर आए हैं।’ चाची ने बड़ा ही ज़ोर लगाकर अपने अंदर से शब्द बाहर निकाले। बाहर वाला घर हमारा पशुओं वाला घर था। अब हम उसे आलतू-फालतू कामों के लिए इस्तेमाल करते हैं। पशु तो कई सालों से कोई रखा ही नहीं था।
मेरी भी आंखें सजल हो उठीं। जिस बात की मुझे चिंता थी, वही हुई।
मां मेरी तरफ देखने लगी। शायद मेरी ‘हां’ या ‘न’ की प्रतीक्षा कर रही थी। मैं समझ गई थी कि मां मेरी राय जानना चाहती है।
‘देख लो, घर तो खाली पड़ा है। कौन-सा कोई पशु है अब हमारे पास।’ मैंने अपनी तरफ से ‘हां’ सी कर दी।
‘चल कोई बात नहीं, जागरा। अब गम न लगा शरीर को। जो कुछ होना था, हो गया। तुम भाई यहां रहे जाओ जब तक तुम अपना घर नहीं बना लेते।’
मां की कही बात सुनकर मानो चाचा-चाची की जान में जान आ गई हो। मैंने उनके चेहरों की तरफ़ देखा। उनकी आंखों में खुशी के जलकण चमक रहे थे।

अनुवाद : सुभाष नीरव

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