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रोकथाम की पूर्व तैयारी से थमेगी वनों की आग

06:32 AM May 14, 2024 IST
रोकथाम की पूर्व तैयारी से थमेगी वनों की आग
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वीके बहुगुणा

पिछले बरसों की भांति इस साल भी भारत के विभिन्न इलाकों के जंगल में आग धधक रही है। उत्तराखंड में स्थिति विशेष रूप से गंभीर है जहां पर हजारों हेक्टेयर वन क्षेत्र में आग लगी हुई है। पहाड़ी सूबों के जंगलों में लगी आग के कारण स्थिति संकटमयी हो गई है। यह एक जाना-माना तथ्य है कि भारत में नवम्बर और जून माह के बीच वनों में आग लगती रहती है। इसकी रोकथाम के लिए यथेष्ट तैयारियां पहले से सुनिश्चित की जानी चाहिए ताकि घटना घटने पर लपटों पर तुरत-फुरत काबू पाया जा सके। यह भी हकीकत है कि इस समस्या से निपटने में प्रशासन को खासी मुश्किलें आड़े आती हैं। अधिकारी अपनी जिम्मेवारी से बचने के लिए आग लगने का दोष शुष्क मौसम या असामाजिक तत्वों पर डालकर पल्ला झाड़ लेते हैं। उत्तराखंड और भारत में अन्य जगह वनीय अग्निकांड का प्रबंधन करने में सरकारों की असफलता स्पष्ट तौर पर पूर्व-प्रबंध तैयार न रखने और प्रशासन की अक्षम्य कोताही का नतीजा है।
वर्ष 2022 में जारी भारत वन सर्वेक्षण (एफएसआई) रिपोर्ट-2021 बताती है कि वर्ष 2021 में देशभर में वनीय आग के 3,45,989 मामले दर्ज हुए, जो कि अब तक के रिकॉर्ड में सबसे अधिक हैं। यह मामले 2019 के मुकाबले लगभग 1 लाख अधिक थे। इस रिपोर्ट से पर्यावरण, वन एवं मौसम मंत्रालय और देशभर की राज्य सरकारों के कान खड़े हो जाने चाहिए थे। हमें इतनी समझ होना जरूरी है कि वनीय स्रोत मनुष्य के साथ-साथ समस्त वनीय जीवन के लिए कितने महत्वपूर्ण हैं। जंगलों में साल-दर-साल लगने वाली आग का पर्यावरणीय संतुलन और अर्थव्यवस्था पर पड़ने वाले विनाशकारी परिणामों से निपटने के उपायों को लेकर बातें तो बहुत की जाती हैं लेकिन जैसे ही इंद्रदेव की कृपा से आग बुझी, सब कुछ भुला दिया जाता है।
पर्यावरण एवं वन मंत्रालय में अपने कार्यकाल (1997-2002) के दौरान मैंने देश के लिए एक वन अग्निशमन रणनीति तैयार की थी और इनसे होने वाले वार्षिक नुकसान की गणना की। मैंने इंडोनेशिया के बागोर में आयोजित एक अंतर्राष्ट्रीय विचारगोष्ठी में भाग लिया था, उस वक्त 1999 में देश के कोयला खान युक्त वनों में आग लगी थी। इस बैठक में सर्वसम्मति बनी कि आग लगने पर बुझाने के यत्न करने से बेहतर है रोकथाम के उपाय पहले करके रखना क्योंकि एक बार आग ने दावानल का रूप धर लिया तो कितनी भी मशीनरी और संसाधन झोंक दें, काबू पाना असंभव है। पर्यावरण एवं वन मंत्रालय ने वर्ष 2001 में नए दिशा-निर्देश जारी किए और आग बुझाने के तरीकों में हवाई जहाज और हेलीकॉप्टरों का उपयोग करने का विचार त्याग दिया। वह इसलिए भी कि भारत में कनाडा, अमेरिका और ऑस्ट्रेलिया जितने विशालकाय जंगल नहीं हैं, और वहां पर अग्निशमन के लिए हवाई जहाजों से विशेष झाग बरसाने के साथ उपकरणों से लैस तगड़ी अग्निशमन कार्रवाई की जाती है।
तब यह निर्णय लिया गया कि भारतीय वन सर्वेक्षण विभाग को उपग्रह का इस्तेमाल करने के लिए विशेष फंड दिया जाए ताकि आग की शिनाख्त होते ही संबंधित विभाग को तुरंत सतर्क किया जा सके। यह तरीका आज भी अमल में है, तदनुसार आग की घटना का पता चलते ही भारतीय वन सर्वेक्षण विभाग संबंधित कर्मियों को सूचना देता है। प्रत्येक वन संभाग को नवम्बर माह से पहले आग लगने की संभावित जगहों और उसके आसपास की जमीन पर फैली अग्नि ग्राह्य सामग्री को हटाना, उपकरण एवं मशीनरी की जांच और मरम्मत कर तैयार-बर-तैयार रखना होता है। नवम्बर माह से पहले हरेक वन-संभाग और वन-प्रखंड को अग्नि रोकथाम रणनीति तैयार रखनी पड़ती है– इसमें अधिक जोखिम वाले इलाकों को चिन्हित करना शामिल है– संकट का आकलन करना, पूर्व चेतावनी व्यवस्था बैठाना और व्यावहारिक रूप से सुनिश्चित करना जैसे कि शमन उपकरण, पानी की मश्कें इत्यादि तैयार रखना। बस्तियों के आसपास के वनीय क्षेत्र में आपदा प्रबंधन की पूर्व-रूपरेखा बनाना।
संयुक्त वनीय प्रबंधन या वन पंचायतों के लिए विशेष फंड जारी किए गए ताकि आग लगने के मौसम में गांववासियों की मदद ली जा सके। राज्य सरकारों से भारतीय वन कानून के अनुच्छेद 79 को लागू करने के निर्देश दिए गए, जिसके तहत गांववासियों और सरकारी कर्मचारियों का कानूनी कर्तव्य है कि आग लगने की सूचना दें और काबू करने में मदद करें और इसके लिए चिन्हित क्षेत्रों में टीमें भी तैयार-बर-तैयार रखी जाएं। मंत्रालय के लिए हर साल इन दिशा-निर्देशों की पुनर्समीक्षा और आकलन करते रहना जरूरी है। यदि प्रक्रिया पहले से तयशुदा और अपनी जगह हो, तब राज्य सरकारें हर बार आग लगने पर खुद को असहाय कैसे महसूस कर सकती हैं। आग की निगरानी और पूर्व-तैयारियों में कोताही की वजहों और दोषियों को ढूंढ़ना राज्य सरकारों का जिम्मा है।
यदि राज्य प्रशासन और वन अधिकारी तय हो चुके प्रतिरोधक उपायों और संहिता पर कड़ाई से अमल करें और साथ ही यथेष्ट उपकरण, मानव शक्ति, धन और अग्निरोधक एवं आपदा नियंत्रण उपायों पर निरंतर नज़र बनाए रखें तो अधिकांश वनीय आग की रोकथाम या उस पर जल्द-से-जल्द काबू पाया जा सकता है। आग पकड़ने वाली सामग्री और मानव की दखलअंदाजी का प्रबंधन एक मुख्य कारक है और आग लगने का मौसम शुरू होने से पहले और इसके दौरान, पंचायतों एवं स्थानीय लोगों को साथ जोड़कर पूर्वाभ्यास और निगरानी का इंतजाम करके अग्नि घटनाओं को नगण्य किया जा सकता है। मानक कार्यकारी प्रक्रिया की समीक्षा करते रहना जरूरी है और प्रत्येक राज्य के मुख्यमंत्री का ध्यान इस तरफ विशेष रूप से होना आवश्यक है क्योंकि फिलहाल ऐसा लगता है कि केवल उनके स्तर पर तंत्र से काम करवाया जा सकता है।
देश में वनीय आग की संख्या में लगातार हो रही बढ़ोतरी और अन्य प्राकृतिक आपदाओं की निगरानी, रोकथाम और पूर्व-तैयारियों को सख्ती से लागू करवाने के लिए प्रधानमंत्री और पर्यावरण मंत्रालय के लिए नौकरशाहों को खींचकर रखना और सख्त कदम उठाना आवश्यक है। पहाड़ी सूबे उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश पर विशेष ध्यान देना होगा। उत्तराखंड के मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी की सक्रियता देखकर नौकरशाही भी काम पर जुटी है और जमीनी स्तर पर इसके परिणाम दिखने लगे हैं। हालांकि बहुत बड़ा नुकसान पहले हो चुका है।
तमाम राजनीतिक दल लोगों को जागरूक करें और वनों को आग लगाने के दुष्परिणामों के बारे में आगाह करें। पिछले कुछ सालों से वास्तविक धरातल पर वन निरीक्षकों की कोताही और अकर्मण्यता सर्वविदित है। उत्तराखंड के वनीय क्षेत्र में वन-रक्षकों और अरण्यपालों की नाक के तले हजारों की संख्या में उभरे धार्मिक स्थलों ने हजारों हेक्टेयर वनीय भूमि पर अवैध कब्जा कर लिया। इस पर कार्रवाई तब जाकर हुई जब मामला लगातार प्रधानमंत्री कार्यालय से उठाया गया। मुख्यमंत्री ने पहल करते हुए कुछ सौ ढांचों को तुड़वाया। तथापि फील्ड अधिकारी या रेंज इंचार्ज या संभाग अधिकारी पर कोई कार्रवाई नहीं की गई। व्यवस्था में प्रत्येक की जिम्मेवारी और सुशासन देना तय हो, और उत्तराखंडवासी यही होते देखना चाहते हैं।

लेखक भारतीय वन अनुसंधान एवं शिक्षा परिषद के महानिदेशक रहे हैं।

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