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विदेशी विश्वविद्यालय उच्च शिक्षा के लिए नहीं रामबाण

07:20 AM Jan 05, 2024 IST
विदेशी विश्वविद्यालय उच्च शिक्षा के लिए नहीं रामबाण
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डॉ. सुखदेव सिंह

भारतीय विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) द्वारा ‘भारत में विदेशी उच्च शैक्षणिक संस्थानों के परिसरों की स्थापना और संचालन’ नियम, 2023 जारी करने के बाद अब विदेशी उच्च शिक्षण संस्थान भारत में अपने स्वयं के परिसर स्थापित करके सर्टिफिकेट और डिप्लोमा कोर्स से लेकर स्नातक, स्नातकोत्तर, डॉक्टरेट और पोस्ट-डॉक्टरल स्तर की शिक्षा प्रदान करने की अनुमति के लिए आवेदन कर सकते हैं। ऐसे संस्थानों के लिए पात्रता मानदंड यह है कि वे समग्र या प्रासंगिक विषय में वैश्विक रैंकिंग के अनुसार शीर्ष 500 संस्थानों में से एक हों। या वे अपने गृह क्षेत्राधिकार में ‘प्रतिष्ठित’ हों।
दरअसल, विदेशी उच्च शिक्षण संस्थानों को भारत में परिसर स्थापित करने की अनुमति देने की नीति और विनियमों का उद्देश्य भारतीय उच्च शिक्षा प्रणाली का वैश्वीकरण करना है। साथ ही भारतीय छात्रों को अपने ही देश में ‘सस्ती लागत’ पर ‘दुनिया के शीर्ष विश्वविद्यालयों’ से शिक्षा प्राप्त करने का अवसर देकर उन्हें देश छोड़ने और विदेश में शिक्षा पर खर्चे के रूप में पूंजी का बाहर बहाव रोकने के अलावा भारत को एक वैश्विक शिक्षा गंतव्य के रूप में विकसित करना बताया गया है। इस निर्णय के मूल में भारतीय युवाओं की विदेश में पढ़ाई करने की बढ़ती प्रवृत्ति बताई जा रही है। इस प्रवृत्ति के परिणामस्वरूप भारत से प्रतिभा पलायन और पूंजी का बाहर बहाव हो रहा है। विदेश मंत्रालय के अनुसार, जनवरी, 2023 तक लगभग 15 लाख भारतीय छात्र विदेश में पढ़ रहे थे, जबकि 2022 में यह संख्या 13 लाख थी। 2024 तक इसके 18 लाख तक पहुंचने की उम्मीद है। ये छात्र विदेश में शिक्षा पर करीब 75-85 अरब डॉलर खर्च करेंगे। भारतीय रिजर्व बैंक के अनुसार, वित्तीय वर्ष 2021-22 में विदेश जाने वाले छात्रों द्वारा विदेशी मुद्रा में 5 अरब रुपये की राशि खर्च की गई। इनमें से अधिकतर छात्र पढ़ाई के बाद घर लौटने के बजाय वहीं बस जाते हैं।
इस कदम को भारतीय उच्च शिक्षा में एक क्रांतिकारी कदम के रूप में सराहा जा रहा है। यह तर्क दिया जा रहा है कि विदेशी विश्वविद्यालय न केवल अपने साथ शैक्षिक उत्कृष्टता लाएंगे, बल्कि भारतीय विश्वविद्यालयों को भी अकादमिक उत्कृष्टता के लिए प्रोत्साहित करेंगे। भारत में विदेशी विश्वविद्यालयों की भविष्य की उपस्थिति को मूल रूप से शैक्षणिक गतिविधि, नवाचार और उत्कृष्टता पैदा करने के उत्प्रेरक के रूप में पेश किया जा रहा है। सतही स्तर पर, सब कुछ ठीक ही लगता है, भावना अच्छी है और लक्ष्य प्राप्त करने योग्य लगते हैं; लेकिन भीतर से प्रेरणा-स्रोत खोखला है और उद्देश्य डगमगा रहा है।
सबसे पहली बात तो यह कि विदेश में दाखिला लेने वाले अधिकांश भारतीय छात्रों की रुचि मुख्य रूप से शिक्षा की बेहतर गुणवत्ता से अधिक वीज़ा प्राप्त करके वहां काम खोजने और बसने में होती है। विदेशों में भारतीय युवाओं का आकर्षण बेहतर शिक्षा और प्रशिक्षण के लिए तो है ही, लेकिन इससे भी ज्यादा वहां योग्यता और क्षमता के आधार पर बेहतर रोजगार के अवसरों, गैर-भेदभावपूर्ण कार्य और वेतन प्रणाली, कानूनी समानता के आधार पर हस्तक्षेप-मुक्त सुरक्षित और विनियमित जीवन के लिए है, जो उन्हें भारत में नहीं मिलता। उनमें से कई तो निचली रैंक वाले कॉलेजों में दाखिले होने से भी संतुष्ट होते हैं, बशर्ते उन्हें वीजा और विदेश में काम करने का अवसर मिल जाए। फिर वे उच्च-शिक्षित उच्च-स्तरीय काम की तलाश करते हैं, जबकि मध्यम-स्तर के शिक्षित लोग विदेशों में सम्मानपूर्वक बेहतर वेतन मिलने और काम-आधारित भेदभाव न होने के कारण छोटी नौकरियों और शारीरिक श्रम वाले काम कर के भी वहां बसने से खुश होते हैं। इनटू यूनिवर्सिटी पार्टनरशिप सर्वेक्षण के अनुसार, ‘विदेश में पढ़ाई करने के इच्छुक 76 प्रतिशत भारतीय छात्र अपनी अंतर्राष्ट्रीय डिग्री के बाद विदेश में काम करने या बसने की योजना बनाते हैं और केवल 20 प्रतिशत ही विदेश में पढ़ाई के तुरंत बाद भारत लौटने की योजना बनाते हैं।’ यहां तक ​​कि भारत में गुणवत्तापूर्ण शिक्षा और अच्छी नौकरी वाले लोग भी विदेश में रहने की इच्छा रखते हैं।
इसलिए भारत में विदेशी विश्वविद्यालय खोलना विदेश में पढ़ाई करके वहीं बसने का विकल्प तो नहीं हो सकता। विदेशी विश्वविद्यालय भारतीय छात्रों को भारत में शिक्षा विकल्प तो प्रदान कर सकते हैं, लेकिन विदेश में बसने का तो बिलकुल नहीं। वास्तव में वैश्विक अवसरों की तलाश करने वाले छात्र विदेशी विश्वविद्यालयों में उच्च शिक्षा को साधन के रूप में उपयोग करते हैं जो वह तब तक जारी रखेंगे जब तक भारत में रोजगार, मेहनताना और सामाजिक-राजनीतिक हालात विदेश जैसे न हों। इसलिए इनटू सर्वेक्षण सही है कि बड़ी संख्या में भारतीय छात्र (41 प्रतिशत) विदेश में ही पढ़ाई करना पसंद करेंगे, भले ही भारत में विश्वविद्यालयों का शिक्षा मानक विदेशी विश्वविद्यालयों के समान हो क्योंकि वहां उच्च वेतन और कम जटिल जीवन के अधिक अवसर हैं।
दूसरी बात यह कि वैश्विक नौकरियों और बेहतर काम के अवसरों की अनुपस्थिति और एक असहिष्णु और भेदभावपूर्ण सामाजिक वातावरण की उपस्थिति के कारण, पड़ोसी देश चीन, पाकिस्तान, बांग्लादेश, नेपाल, स्लाव और मध्य पूर्वी देशों के छात्रों के लिए, पश्चिमी और यूरोपीय देशों की तर्ज पर भारत के लिए एक आकर्षक शैक्षिक गंतव्य बनने की संभावना कम है। एक शैक्षणिक संस्थान विषय ज्ञान, कौशल और अनुभव हासिल करने का स्थान होता है। एक वैश्विक शैक्षिक परिसर का अर्थ है विभिन्न संस्कृतियों, भाषाओं और समस्या-समाधान कौशलों का अधिक से अधिक अनुभव। चूंकि भारत में स्थापित विदेशी विश्वविद्यालयों में मुख्य रूप से भारतीय छात्र ही होंगे, इसलिए ये परिसर उस तरह का वैश्विक अनुभव प्रदान करने में सक्षम नहीं बन सकेंगे।
तीसरी बात यह कि, केवल भारत में विदेशी संस्थान होने से ही भारतीय विश्वविद्यालय प्रतिस्पर्धा की तैयारी नहीं कर सकते हैं। इसके लिए भारतीय विश्वविद्यालयों में अधिक पूंजी निवेश के साथ-साथ शैक्षिक, परीक्षा एवं प्रशासनिक सुधारों की सख्त जरूरत है।
भारत में विश्वविद्यालय छात्रों से अधिक फीस वसूलने और शिक्षकों को कम वेतन देकर मुनाफाखोरी की नीति के साथ शैक्षिक गुणवत्ता और सामाजिक न्याय प्रदान नहीं कर सकते हैं।
वर्तमान स्थिति यह है कि अधिकांश राज्य और निजी विश्वविद्यालयों और कॉलेजों में यूजीसी के निर्धारित वेतनमान के अनुसार भी वेतन नहीं दिया जा रहा; अधिकांश शिक्षक आकस्मिक या अंशकालिक रोजगार में हैं। लागत बचाने के लिए उच्चस्तर के पद खाली रखे जाते हैं। भारत के नीति आयोग ने भी राज्य विश्वविद्यालयों के लिए ‘अपर्याप्त फंडिंग’ को एक बाधा के रूप में नोट किया है। इसलिए देश की उच्च शिक्षा प्रणाली का वैश्वीकरण करने और प्रतिभा पलायन और पूंजी के बाहर बहाव को रोकने के लिए भारतीय शैक्षणिक संस्थानों में शिक्षण, परीक्षा और कामकाजी माहौल में महत्वपूर्ण बदलाव जरूरी है।  साथ ही देश में सार्वजनिक और निजी उच्च शिक्षा संस्थानों में पर्याप्त धन निवेश, अच्छा रोजगार वातावरण, जाति और धर्म से अधिक काम के सम्मान का माहौल, गैर-भेदभावपूर्ण कौशल सम्मान प्रदान करना आवश्यक है। बहुभाषी और बहुसांस्कृतिक सहिष्णुता और अनुकूलन वाला एक सुरक्षित समाज बनाया जाना चाहिए। साथ ही कार्य-आधारित भेदभाव को समाप्त किया जाना चाहिए।
विदेशी विश्वविद्यालय घरेलू संस्थानों के पूरक हो सकते हैं, लेकिन वे न तो 1000 विश्वविद्यालयों और 42000 कॉलेजों की भारतीय उच्च शिक्षा प्रणाली का विकल्प हो सकते हैं, न ही इसकी दुर्दशा को सुधारने के लिए रामबाण।

लेखक गुरु नानक देव विवि के पूर्व प्रोफेसर हैं।

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