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हुए पांच साल मगर बदली न चाल-ढाल

06:32 AM Apr 04, 2024 IST
हुए पांच साल मगर बदली न चाल ढाल
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शमीम शर्मा

एक नेता वोट मांगने किसी मलिन बस्ती में पहुंचा। वहां की बदबू से घबराकर उसने झट अपने कुर्ते की जेब से रूमाल निकाला और नाक पर रखते हुए सवाल किया। क्यों भई, यहां कोई स्वीपर नहीं आता क्या। बस्ती का एक बूढ़ा नेता जी की आंखों में आंखें डालकर बोला। जी आवै सै, पर आवै सै पांच साल मैं एक बर अर आकै गंदगी और बढ़ा दे सै। नेता जी को तो बात समझ आई या नहीं पर यह सत्य है कि हर चुनाव में जातपात और साम्प्रदायिकता की गंदगी बढ़ती ही जा रही है।
भाईचारा तार-तार होकर यूं उड़ रहा है जैसे कूड़े के ढेर से प्लास्टिक के लिफाफे उड़कर चारों दिशाओं में फैल जाते हैं। पिछले 75 सालों से वही वादे, वही इरादे। अमृत महोत्सव में भी आम आदमी को अमृत की एक बूंद नहीं मिली। आज भी वह अभावों का गरल गटकने को मजबूर है। वोट हथियाने के लिए नेता जो ज़हर उगलते हैं, वही आम आदमी की धीमी मौत का कारण बनता है। गरीब बस्तियों की दशा जस की तस है। वही दुर्गन्ध, वही अन्धेरा वही कुपोषण, वही अशिक्षा, वही बेरोजगारी कारण हैं।
अधिकांश वोटर भी बिल्कुल उदासीन हैं। हर पांच साल बाद उन्हंे अवसर मिलता है नेताओं को उनकी असलियत बताने का। पर जब नेताओं का हिसाब करने का मौका मिलता है तो वे पिछलग्गू बनकर मैनपावर और मनीपावर के चपेटे में ऐसे आते हैं कि उनकी आंखें ही चुंधिया जाती हैं। ऐसे भी वोटर हैं जो हर बार एक ही बात दोहराते हैं कि वे अपना वोट कभी नहीं डालते और इससे उन्हें बहुत शांति मिलती है क्योंकि संसद में जो कुछ हो रहा है, उसकी जिम्मेदारी उन पर नहीं आती।
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एक बर की बात है अक सुरजा पंडित गंगा स्नान करण हरद्वार जाण लाग्या तो नत्थू बोल्या- दाद्दा मेरे खात्तर एक सुथरा-सा शंख लिआइये। सुरजा हरद्वार जाकै दो-चार दिन खूब घूम्या-फिर‍्या अर गंगा जी मैं गोत्ते मारे। पर शंख लेणा ए भूल ग्या। गांम धोरै आकै सोच्या अक नत्थू बुरा मनावैगा। इतणे मैं उसकी निगाह राह पै पड़े मरे होये गधे के मुंह पै पड़ी। सुरजे नैं वो ठाके झोले मैं घाल लिया। गांम पहोंच कै सीधा नत्थू के घरां गया अर गधे का मुंह पकड़ाते होये बोल्या- आज रात इसतै गंगाजल मैं डुबोये राख अर काल सवेरै तै बजाणा शुरू करिये। आगले दिन नत्थू नैं शंख बजाया तो फूंक सीधी लिकड़गी। किमें शंख हो तो बोल्लै। नत्थू ठाकै शंख पंडत के चौबारे पै जा पहोंच्या अर नाराजगी मैं बोल्या- यो तेरा शंख बोलता तो कोनीं। सुरजा पंडत बोल्या- भाई बखत बखत की बात है, आज तैं दो-चार महीन्नां पहले तो इसकी अवाज तीन कोस ताहिं सुण्या करती।

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