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सुख-समृद्धि में सफलता के लिए व्रत

07:51 AM Jan 01, 2024 IST
सुख समृद्धि में सफलता के लिए व्रत
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चेतनादित्य आलोक
सनातन धर्म के तमाम व्रतों में एकादशी व्रत को श्रेष्ठ माना जाता है। सामान्यतः प्रत्येक महीने दो तथा वर्षभर में कुल 24 एकादशियां होती हैं, किंतु जिस वर्ष में पुरुषोत्तम मास लगता है, उस वर्ष इनकी संख्या 26 हो जाती है। पौष महीने के कृष्णपक्ष की एकादशी को ‘सफला एकादशी’ कहा जाता है। इस वर्ष यह व्रत 7 जनवरी, रविवार को है। सफला नाम का तात्पर्य सफलता से है और ऐसा माना जाता है कि सफला एकादशी अपने नाम की ही तरह जीवन के सभी कार्यों को सफल करने वाली होती है।
एकादशी व्रत के महत्व का अनुमान इससे ही लगाया जा सकता है कि भगवान श्रीकृष्ण ने श्रीमद्भगवद्गीता में स्वयं ही एकादशी तिथि को अपने समान बलशाली बताया है। शास्त्रों में इसकी महिमा बताते हुए कहा गया है कि प्रत्येक एकादशी व्रत में भगवान नारायण के समान ही फल देने का सामर्थ्य होता है।
ऐसी मान्यता है कि इस दिन मंदिर में एवं तुलसी माता के पास दीपक प्रज्वलित करने का भी बहुत महत्व बताया गया है। सफला एकदशी के दिन व्रत रखने से व्यक्ति के सारे दुःख समाप्त हो जाते हैं और समस्त मनोकामनाएं पूरी होती हैं। इस दिन भगवान श्रीहरि विष्णु की पूरे विधि-विधान के साथ पूजा-अर्चना करने से व्यक्ति को जीवन में सुख-समृद्धि और सौभाग्य की प्राप्ति होती है।
एकादशी व्रत का सम्बन्ध तीन दिनों की दिनचर्या से है। भक्त दशमी तिथि को दोपहर में भोजन लेने के उपरांत शाम का भोजन नहीं ग्रहण करते हैं। एकादशी के दिन उपवास के नियमों का कड़ाई से पालन किया जाता है। जो लोग किसी कारण एकादशी का व्रत नहीं रखते हैं, उन्हें भी इस दिन भोजन में कम-से-कम चावल ग्रहण नहीं करना चाहिए। इस दिन जमीन पर सोना चाहिए। इस दिन विष्णुसहस्रनाम का पाठ करने से भगवान श्रीहरि विष्णु की विशेष कृपा होती है।

लुम्भक का भाग्योदय

पुराणों के अनुसार राजा माहिष्मत का ज्येष्ठ पुत्र सदैव पाप कार्यों में लीन रहकर देवी-देवताओं की निंदा किया करता था। पुत्र को ऐसा पापाचारी देखकर राजा ने उसका नाम ‘लुम्भक’ रख दिया और उसे अपने राज्य से निकाल दिया। पाप बुद्धि लुम्भक वन में प्रतिदिन मांस तथा फल खाकर जीवन निर्वाह करने लगा। उसका विश्राम-स्थल एक बहुत पुराने पीपल के वृक्ष के पास था, जहां पर एक बार पौष कृष्णपक्ष की दशमी तिथि को शीत के कारण निष्प्राण-सा होकर वह पड़ा हुआ था। अगले दिन सफला एकादशी थी और दोपहर में सूर्यदेव की ऊष्मा के प्रभाव से उसे होश आ गया। भूख से दुर्बल लुम्भक जब फल एकत्रित करके लाया तो सूर्य अस्त हो गया। तब उसने वही पीपल के वृक्ष की जड़ में फलों को निवेदन करते हुए कहा, ‘इन फलों से लक्ष्मीपति भगवान श्रीहरि विष्णु संतुष्ट हों।’ तात्पर्य यह कि लुम्भक से अनायास ही सफला एकादशी व्रत का पालन हो गया, जिसके प्रभाव से लुम्भक को दिव्य रूप, राज्य, पुत्र आदि सभी प्राप्त हुए।

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