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उपभोक्ताओं को सब्सिडी दे रहे हैं किसान

06:26 AM Mar 12, 2024 IST
उपभोक्ताओं को सब्सिडी दे रहे हैं किसान
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देविंदर शर्मा

कई दशक पहले, प्रतिष्ठित प्रशासनिक अधिकारी एवं वैज्ञानिक डॉ. एमएस रंधावा ने एक लेख में किसानों और खेती के बारे में लोकप्रिय धारणा के बारे में बात की थी। एक किसान निस्संदेह बहुत मेहनती होता है। सर्दी हो, गर्मी हो या फिर बारिश आती हो; आप हमेशा उसे खेतों में कड़ी मेहनत करते हुए देख सकते हैं। इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि किसानों ने अपने श्रम से, पसीना बहाकर अकेले ही देश को भूख के जंजाल से बाहर निकाला है।
लेकिन डॉ. रंधावा को उस समय समाज में प्रचलित एक किसान की स्वीकृत छवि से परेशानी हुई। आमजन की कल्पना में, किसान एक सादी पोशाक पहनता है, अक्सर एक मैला कुर्ता व धोती पहनता है और टूटी-टांके लगी धूल-धूसरित जूती पहनकर चलता है। उम्मीद रहती है कि आने-जाने के लिए ज्यादा से ज्यादा साइकिल इस्तेमाल करता है, और जब भी आप उसे दोपहिया वाहन चलाते हुए देखते हैं, तो अक्सर भौंहें तन जाती हैं। हालांकि अब वक्त बदल गया है लेकिन किसान और खेती के बारे में धारणा अब भी पूर्ववत ही कायम है।
साइकिल की जगह भले ही दोपहिया वाहन ले चुका है, जिसे अब कार द्वारा बदला जा चुका है, ऊपरी तबके में किसानों के पास कई बार शानदार मॉडल भी होते हैं, लेकिन एक पेशे के रूप में खेती के बारे में आमजन की सोच में बहुत बदलाव नहीं आया है। ग्रामीण-शहरी विभाजन का प्रतिबिंब, खेती अभी भी शहरी हाशिये पर बनी हुई है। मिसाल के तौर पर, यदि कोई किसान शहरी दायरे में प्रवेश करने की कोशिश करता है, तो उसे अभी भी नापसंद किया जाता है, और यहां तक ​​कि खान-पान के तौर-तरीके अपनाता है, जिसमें मिसाल के तौर पर पिज्जा खाना भी शामिल है। इसके अलावा, ऐसे समय में जब एक घरेलू सहायिका को अपने कार्यस्थल तक जाने को स्कूटी चलाते हुए देखना असामान्य नहीं है, एक किसान द्वारा ट्रैक्टर पर महंगे म्यूजिक सिस्टम का उपयोग करना मंजूर नहीं है।
असल में, खेती एक दोयम दर्जा शब्द बन गया है। किसानों के प्रति इतनी गहरी उदासीनता है कि न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) के लिए कानूनी गारंटी की मांग कर रहे प्रदर्शनकारी किसानों पर सवाल उठाने वाले प्रबल वृत्तांत के साथ ही तिरस्कार और अवमानना ​​​​का भाव भी सामने आता है। विरोध कर रहे किसानों पर लगातार अपमानजनक शब्द कहे जा रहे हैं और मुख्यधारा के माध्यमों के साथ-साथ सोशल मीडिया पर भी अपमानजनक टिप्पणियां कृषक समुदाय के खिलाफ व्याप्त कुंठा के भावों का प्रतिबिंब हैं। आम तौर पर यह माना जाता है कि किसान बहुत पाला-पोसा जाता है, उन्हें भारी सब्सिडी व मुफ्त बिजली मिलती है, और वे इनकम टैक्स नहीं देते। किसानों की आय में कोई भी वृद्धि उपभोक्ता कीमतों पर असर डालेगी। जिसके परिणामस्वरूप खाद्य मुद्रास्फीति बढ़ेगी इसलिए किसानों को बढ़ी हुई आय के अधिकार से वंचित करने पर ध्यान केंद्रित किया गया है।
चारों ओर इतनी गलत सूचनाएं, और त्रुटिपूर्ण आर्थिक तर्क उछाले जा रहे हैं कि मिथक व वास्तविकता में भेद करना आसान नहीं। किसी भी मामले में, नीति-निर्माता, अर्थशास्त्री और मीडिया फैलाए जा चुके भ्रम से खुश लगते हैं। चाहे वह काल्पनिक खाद्य मुद्रास्फीति के आंकड़े हों या राष्ट्रीय खजाने पर संभावित वित्तीय बोझ, सभी प्रकार के संदिग्ध आंकड़े प्रचलित हैं। मूल मान्यता यह है कि किसानों की आय में कोई भी बढ़ोतरी बाजार को बिगाड़ देगी और इससे व्यापार और उद्योग के मुनाफे में कमी आएगी। हकीकत में, जो स्वाभाविक से भी ज्यादा हो चुका है वह ये कि किसान को निरंतर गरीबी में रखने को लेकर देश संतुष्ट नजर आता है।
यदि किसान इतने लाड़ले होते तो मुझे कोई कारण नहीं दिखता कि औसत कृषि आय निम्नतम स्तर पर बनी रहनी चाहिये थी। जो पहले कहा जा चुका है उसे दोहराने के जोखिम पर, कृषि परिवारों के लिए स्थितिजन्य आकलन सर्वेक्षण 2021 की नवीनतम रिपोर्ट की गणना के मुताबिक, कृषि परिवार की औसत मासिक आय 10,218 रुपये है। इससे यह भी पता चला कि खेती से होने वाली आय मनरेगा श्रमिकों की मासिक मजदूरी से भी कम थी। इससे भी बुरी बात, किसानों की स्थिति पर देश के एक अंग्रेजी दैनिक में बीती 23 फरवरी को प्रकाशित विवरण से पता चलता है कि पश्चिम बंगाल और ओडिशा जैसे राज्यों में औसत कृषि आय अभी भी कम है और 5,000 रुपये से 6,000 रुपये प्रति परिवार प्रति माह के बीच है। यहां तक ​​कि आंध्र प्रदेश और तेलंगाना में भी, जहां 90 प्रतिशत से अधिक किसान परिवार कर्जदार हैं, आय बहुत कम है। एक अध्ययन में यह पता चला है कि आंध्र प्रदेश के कई सूखा प्रभावित जिलों में लगभग 14 प्रतिशत पारिवारिक आय सरकारी योजनाओं से आती है जिसमें केंद्र और राज्य सरकारों द्वारा प्रत्यक्ष आय मदद शामिल है।
इसके अलावा, जैसा कि कुछ दिन पूर्व पेश 2022-23 घरेलू खर्च सर्वेक्षण से पता चलता है कि एक पेशेगत उद्यम के रूप में खेती कितनी अनिश्चित हो गई है, जिसमें कृषि परिवारों का खर्च ग्रामीण परिवारों से कम हो गया है। आय कम होने के कारण उपभोग कम है। इसलिए यह कहना कि किसान आयकर नहीं देते, उचित नहीं है। एक राष्ट्र के रूप में क्या यह हमारा कर्तव्य नहीं बनता कि हम सबसे पहले किसानों को कर योग्य आय दें?
किसी भी स्थिति में, यह उपभोक्ता केंद्रित नजरिया ही है जो असल में किसान को सही कीमत प्रदान करने से इनकार करता है। एक-दो साल को छोड़ दें तो व्यापार की शर्तें नकारात्मक रही हैं। कई अध्ययनों में सामने आया कि एक दशक से ज्यादा वक्त से ग्रामीण मजदूरी स्थिर है या फिर घट रही है। कृषक परिवारों के उपभोग स्तर में गिरावट भी यह इंगित करती है। और फिर भी, जैसे ही उच्चतर एमएसपी घोषित किया जाता है, अखबारों के संपादकीय लगभग हर बार इसे खाद्य मुद्रास्फीति में प्रत्याशित बढ़ोतरी से जोड़ने लगते हैं।
दरअसल, कृषि लागत और मूल्य आयोग यानी सीएसीपी द्वारा जिन 23 फसलों के लिए एमएसपी की गणना करने के बाद उनकी कीमतों की घोषणा की जाती है, तो वह उनकी कीमतों की सिफारिश करने से पहले इनपुट-आउटपुट मूल्य समानता और बाजार कीमतों के रुझान पर गौर करता है। इसके अलावा, खाद्य मुद्रास्फीति को भारतीय रिज़र्व बैंक द्वारा निर्धारित जायज सीमा के भीतर रखने से, लोगों को अक्सर यह अहसास नहीं होता है कि किसान वास्तव में उपभोक्ताओं और इस तरह देश की अर्थव्यवस्था को सब्सिडी देते हैं।
आर्थिक सहयोग और विकास संगठन यानी ओईसीडी के हालिया अध्ययन बताता है कि भारतीय किसान साल 2000 से घाटे की खेती कर रहे हैं, जिस वर्ष इसने उत्पादक-सब्सिडी मदद का आकलन करना शुरू किया था। किसानों को जो आर्थिक नुकसान हुआ है वह मार्केट में किसानों को मिलने वाली कीमत और सब्सिडी, कुछ राज्यों में फ्री बिजली मदद भी, को जोड़ने के बाद हुआ है। ओईसीडी डेटा यह भरपूर स्पष्ट करता है कि बाजार को कायम रखने के लिए, हमने जान-बूझकर खेती को कंगाल बनाए रखा है।
जब तक हम किसान को मूलभूत जरूरतों से वंचित रखना जारी रखेंगे, तब तक डॉ. एमएस रंधावा द्वारा उकेरी गयी किसान की छवि बदलने वाली नहीं है। किसान को संकट से उबारने के लिए एमएसपी की गारंटी पहला कदम होगा, लेकिन उसे दशकों से हो रहे घाटे की पूर्ति करने के लिए और भी बहुत कुछ किए जाने की जरूरत है। जब तक किसानों और समाज के अन्य वर्गों के बीच आय में बराबरी यकीनी बनाने के प्रयास नहीं किये जाते तब तक किसान अपनी छवि से बाहर नहीं निकल सकता है।

लेखक कृषि एवं खाद्य विशेषज्ञ हैं।

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