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संदेशखाली का संदेश

06:49 AM Feb 23, 2024 IST
संदेशखाली का संदेश
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राजनीतिक संरक्षण में अपराधियों का फलना-फूलना किसी भी समाज के लिये दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति ही है। लेकिन संगीन अपराध के मुद्दे पर राजनीति करने के बजाय वास्तविक अपराधियों को दंडित करना ही प्राथमिकता होनी चाहिए। पश्चिम बंगाल की राजनीति में आपराधिक तत्वों का बोलबाला दशकों से जारी रहा है। कभी जो दबंग लोग पश्चिम बंगाल की वामपंथी सरकार के दौरान वोट छापने व बूथ कब्जाने के लिये कुख्यात थे, अब उनके ही चोला बदलकर सत्तारूढ़ टीएमसी के कार्यकर्ताओं के रूप में नजर आने के आरोप लग रहे हैं। स्थानीय निकाय चुनावों में हुई हिंसा व चुनावों में हेराफेरी इसकी बानगी बतायी जाती है। ताजा मामला पश्चिम बंगाल के उत्तर परगना जिले में स्थित संदेशखाली का है, जो आज राजनीति का अखाड़ा बना हुआ है। दरअसल, एक अनाज घोटाले में ईडी की कार्रवाई पर टीएमसी कार्यकर्ताओं के प्रतिरोध और उसके बाद ईडी अधिकारियों पर हमले के बाद संदेशखाली में नये-नये खुलासे होते रहे हैं। हिंसा व दबंगई के लिये कुख्यात इलाके में दबंग राजनेताओं द्वारा जमीन कब्जाने और आदिवासी महिलाओं के शोषण के मामले उजागर हुए। हालांकि, सत्ता पक्ष और विपक्ष की तरफ से आरोप-प्रत्यारोपों का सिलसिला जारी है और अपराधियों को राजनीतिक संरक्षण के आरोप लगाये जा रहे हैं। भाजपा की ओर से जहां महिला मुख्यमंत्री वाले राज्य में महिलाओं का शोषण करने वाले टीएमसी नेताओं को बचाने के आरोप लगाए जा रहे हैं, वहीं सत्तारूढ़ तृणमूल कांग्रेस की ओर से विपक्ष पर सांप्रदायिक ध्रुवीकरण के आरोप लगाये जा रहे हैं। कालांतर बढ़ते विवाद के बीच पश्चिम बंगाल के राज्यपाल और राष्ट्रीय महिला आयोग के प्रतिनिधि संदेशखाली का दौरा करके पीड़ितों से मिले भी हैं। निस्संदेह, इस विवाद के राजनीतिक निहितार्थ भी हैं, लेकिन यदि दबंग राजनेताओं द्वारा महिलाओं का सामूहिक शोषण किया जाता है तो निश्चय ही यह दुर्भाग्यपूर्ण घटना है। इस मामले में कलकत्ता हाईकोर्ट ने भी मुख्य अभियुक्त के खिलाफ कार्रवाई न होने पर राज्य सरकार को फटकार लगाई है। हालांकि, इस प्रकरण में अब तक डेढ़ दर्जन आरोपियों की गिरफ्तारी हो चुकी है।
बहरहाल, हिंसा और दबंगई के लिये मशहूर पश्चिम बंगाल की राजनीति में संदेशखाली का विवाद लगातार विस्तार लेता प्रतीत हो रहा है। जहां तृणमूल कांग्रेस भाजपा को मामले को तूल देने के आरोप लगा रही है, वहीं भाजपा अपराधियों को बचाने के आरोप सत्तारूढ़ दल पर लगा रही है। आरोप है कि भाजपा आम चुनाव के मद्देनजर ध्रुवीकरण के प्रयासों में लगी है। बाकायदा एक बीस मिनट का वीडियो भी जारी किया गया है जिसमें महिलाएं अपनी आपबीती सुना रही हैं। क्षेत्र की महिलाएं इस मुद्दे को लेकर मुखर हो रही हैं और दोषियों को दंडित करने की मांग को लेकर एकजुट हो रही हैं। विपक्षी नेता इस आंदोलन की तुलना सिंगूर-नंदीग्राम जैसी मुहिम से कर रहे हैं, जो राज्य में सत्ता परिवर्तन की वाहक बनी थीं। सवाल उठाये जा रहे हैं कि इन महिलाओं ने पहले दबंग राजनेताओं के खिलाफ आवाज क्यों नहीं उठाई। कुछ लोगों की दलील है कि मुख्य अभियुक्त की गिरफ्तारी के बाद वे आवाज उठाने में सक्षम हो पायी हैं। बहरहाल, राशन घोटाले, अभियुक्तों के ठिकानों पर छापे, जमीन हड़पने और सामूहिक उत्पीड़न के आरोपों के बीच संदेशखाली लगातार सुर्खियों में बना हुआ है। केंद्र सरकार के बड़े नेताओं व विभिन्न आयोगों के प्रतिनिधियों के संदेशखाली जाने की बात की जा रही है। राष्ट्रीय महिला आयोग की अध्यक्ष रेखा शर्मा के नेतृत्व में एक प्रतिनिधिमंडल पहले ही संदेशखाली का दौरा कर चुका है। बहरहाल, राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोपों से इतर यह दुर्भाग्यपूर्ण ही है कि आज भी लोकतांत्रिक व्यवस्था में दबंगों का वर्चस्व बना हुआ है। ऐसे तत्व किसी भी दल में हों, उनके खिलाफ कार्रवाई होनी चाहिए। लेकिन यहां जरूरी है कि किसी भी राज्य में किसी भी दल की सरकार हो, अपराधी बख्शे नहीं जाने चाहिए। अब चाहे मणिपुर में महिलाओं का शोषण हो या संदेशखाली सामूहिक यौन उत्पीड़न, सभी जगह पीड़ितों को न्याय दिलाने में तत्परता दिखानी चाहिए। अपराधी की न कोई राजनीतिक विचारधारा होती है और न ही कोई धर्म होता है। उसे सिर्फ अपराधी की तरह ही देखा जाना चाहिए।

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