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हिमालय के जादू  के बावजूद आसान नहीं ट्रेकर की राह

07:33 AM Jan 19, 2024 IST
हिमालय के जादू  के बावजूद आसान नहीं ट्रेकर की राह
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समीर चौधरी
हिमालयन ट्रेक्स को सर्च करते हुए एक खास एस्थेटिक विज़ुअल सामने आता है। तस्वीरों में प्रकृति का गहरा प्रभाव दिखाई देता है- सब्ज़ घाटियों के वाइड-लेंस शॉट्स, बादलों को चीरती हुई पर्वत शृंखलाएं, जिन्हें फ्रेम्स में कैद कर लिया गया है, विदेशी फूलों के क्लोज-अप आदि। यह बहुत सोच-समझकर तैयार की गई तस्वीरें हैं जिनमें इंसानों को पृष्ठभूमि में डाल दिया गया है कि बामुश्किल ही कोई हाथ या कोई जूता किसी पहाड़ी के साथ नज़र आता है। फिर ग्रुप फोटो हैं। इस श्रेणी में इंसानियत प्रभावी है- उत्साही, जोशीली मानवता। चेहरों पर मुस्कान चिपका दी गई है। हर कोई अपने जीवन के सबसे अच्छे हिस्से में प्रतीत होता है और आप जल्द से जल्द उनका स्थान लेने के लिए लालायित हो जाते हैं।
यह वास्तव में सब झूठ है, जो ट्रेकिंग अनुभव इंस्टाग्राम बेचता है, वह उसके क्यूरेटिड फीड के बाहर मौजूद नहीं है। अगर आप पहले कभी ट्रेकिंग पर गये हैं तो यह बात आपको बताने की ज़रूरत नहीं। इसके बावजूद जब यह तस्वीरें स्क्रीन पर आती हैं तो आप आकर्षित हो जाते हैं और एक अन्य ट्रेक के लिए रजिस्टर कर लेते हैं। ऐसा लगता है जैसे मानसिक अंधापन खेल खेल रहा हो, जैसे तस्वीरें विशिष्ट भूलने की बीमारी अपना काम कर रही हो, जिसमें पुराने अनुभव ख़ुशी में बदल जाते हैं। यह ख़ुशफ़हमी भरी भूल ट्रेक के पहले दिन तक जारी रहती है। लेकिन जिस पल रकसैक आपकी कमर पर होता है और आप पहाड़ पर चढ़ने लगते हैं तो सब कुछ पुराना याद आने लगता है। क्या पिछली बार भी बैग इतना ही भारी था? जब बारिश होने लगती है और अगले तीन दिन तक रुकती नहीं तो आपको पहाड़ के मौसम की मनमौजियां याद आती हैं। नीला आसमान और धूप अचानक अंधेरी धुंध में बदल जाती है, जो घंटों तक जारी रहती है। पिघलते ग्लेशियर की साफ़ धारा के किनारे आप अपने जूते उतार देते हैं। जब डरते-डरते आप बर्फीले पानी में पैर रखते हैं तो नंगे पैरों पर हज़ारों सुइयां चुभती हुई महसूस होती हैं। आपको यह यकीन करने में परेशानी होती है कि इसी ‘मज़े’ के लिए ट्रेकिंग हेतु साइन किया था।
अगले दिन की शाम तक स्थितियां अधिक बदतर हो जाती हैं। ख़राब मौसम के कारण आप पहली कैंपसाइट पर ही अटके हुए हैं और आगे जाने की कोई गारंटी नहीं है। आप तंग टेंट में ट्रेकिंग ग्रुप के अन्य सदस्यों के साथ बैठे हुए हैं- कपड़ों में नमी, पैरों में दर्द, कमर में सूजन और आप सोचते हैं कि यह मुसीबत क्यों पाल ली। इस प्रश्न ने आप से पहले भी बहुत लोगों को परेशान किया है। 1923 में जब दुनियाभर के प्रमुख पर्वतारोही माउंट एवरेस्ट को फतह करने का प्रयास कर रहे थे तो एक पत्रकार ने जॉर्ज मैलोरी से मालूम किया कि वह ग्रह की सबसे ऊंची चोटी पर क्यों चढ़ना चाहते हैं? ‘चूंकि वह मौजूद है।’ उनके जवाब को शब्दों की सादगी ने अमर कर दिया। क्या आप भी अपने एडवेंचर के लिए इन शब्दों से प्रेरित हैं? हिमाचल प्रदेश के वीराने में लीक करते टेंट में उत्तर सोचते हुए आप हथियार डालने की हद तक पहुंच जाते हैं। आप पैक-अप करके वापस जाने की तैयारी करने लगते हैं। आपको सिर्फ़ एक बात रोके रखती है कि आप रण छोड़ने वाले पहले व्यक्ति नहीं बनना चाहते। आपके अंदर का प्राचीन योद्धा आपको पहला रणछोड़ दास नहीं बनने देता। जब एक बार यह तय हो जाता है कि आप क्विट नहीं करेंगे तो फिर सब कुछ सरल हो जाता है। सामने लक्ष्य विशाल है- हिमालय के पीर पंजाल रेंज में 5,289 मीटर ऊंची फ्रेंडशिप चोटी के ऊपर पहुंचना है, लेकिन काम आसान दिखाई देने लगता है कि एक पैर के आगे दूसरा पैर रखते हुए 17,500 फीट ही तो चलना है।
आप पर्वतारोहण के बुनियादी उपकरणों को हैंडल करने के आदी हो जाते हैं, बर्फ़ कुल्हाड़ी चलाना भी सीख जाते हैं। कंक्रीट की तरह आपके पैरों से चिपके स्नो बूट्स में आप बोल्डर्स के मैदानों को पार करते चले जाते हैं। आप ग्लेशियर के पास से निकलते हैं, बर्फ़ की सीधी दीवार को पार कर जाते हैं। रस्सी से आप अपने साथियों के साथ बंधे गाइड के पीछे-पीछे चलते हैं जबकि दोनों तरफ़ गहरी खाई मौजूद होती हैं। 18 घंटे के लम्बे ट्रेक के बाद जब आप बेस कैंप पर लौटते हैं, तो गर्म सूप पीते हुए आप अपनी भावनाओं की समीक्षा करने का प्रयास करते हैं। ट्रेकिंग ग्रुप में अलग-अलग व्यक्तित्व के लोग हैं, कुछ तो दूसरे देशों के भी हैं, लेकिन एक साझा उद्देश्य के लिए सब साथ आ गये हैं। एक सप्ताह के दौरान आप साथ हंसे, नाचे, मुंह बनाया, दर्द की शिकन चेहरे पर लाये, एक-दूसरे को खींचा और लक्ष्य पाने के लिए प्रेरित किया। थकन है, लेकिन संतोष की चमक भी। आपको अहसास होने लगता है कि ख़राब, दर्दभरी यादें मन के पिछले हिस्से में जा रही हैं। आप अपने दोस्त से कहते हैं कि आप यह ट्रेकिंग फिर कभी नहीं करेंगे और वह भी पूर्णतः सहमत हो जाता है। आप दोनों ही जानते हैं कि यह झूठ है।
बाद में जब लोग आप से ट्रेकिंग के बारे में मालूम करेंगे तो आपके पास कहने के लिए केवल अच्छी-अच्छी बातें होंगी। ट्रेक की तस्वीरें सुंदर होंगी, लेकिन अपर्याप्त; पहाड़ की चोटी पर जो डर का अहसास हुआ था वह तो तस्वीरों में कहीं है ही नहीं, सिर्फ़ प्राकृतिक सौन्दर्य दिखाई दे रहा है। जब काफी समय गुज़र जायेगा और आप ख़ुद से सवाल करेंगे कि प्रकृति प्रेम के लिए आपने इतना कष्ट क्यों उठाया था, तो जवाब के लिए, सत्य के करीब पहुंचने के लिए आप फिर से ट्रेकिंग पर जाने के लिए सोचेंगे। हिमालय इसी तरह लोगों को बुलाता है।
इमेज रिफ्लेक्शन सेंटर 
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