For the best experience, open
https://m.dainiktribuneonline.com
on your mobile browser.

शीर्ष अदालत के फैसले से रोशन लोकतंत्र

08:18 AM Feb 28, 2024 IST
शीर्ष अदालत के फैसले से रोशन लोकतंत्र
Advertisement

अशोक लवासा

अदालतें न्याय देने के लिए बनी हैं। कई मर्तबा, वे इस ढंग से न्याय करती हैं कि आमतौर पर उनके साथ लगाया जाने वाला ‘माननीय’ शब्द सार्थक हो उठता है। इस बात पर लगभग सभी सहमत हैं कि चंडीगढ़ मेयर चुनाव मामले में आए सर्वोच्च न्यायालय के फैसले से लोगों का विश्वास फिर से लौटा है। जिस ढंग से न्यायाधीशों ने इस प्रसंग में पड़ताल की और आदेश सुनाया, वह असाधारण और चौंकाने वाला था। चुनाव अधिकारी अनिल मसीह का अनुचित आचरण भी कम नाटकीय और वाहियात न था, और दुर्भाग्यवश खतरा यह है कि कहीं यह चलन आम न हो जाए।
जैसा कि ज्ञात है, यह प्रसंग मतपत्रों से छेड़छाड़ कर निरस्त करने का है। हालांकि, इस मामले के केंद्रबिंदु में कुछ लोगों के लिए यह नमोशी का बायस है तो बहुतों के लिए व्यवस्था पर से भरोसा उठना। अदालत ने एक ही झटके में लोगों का यकीन दुबारा कायम कर तो दिया है, लेकिन केवल न्यायपालिका पर। न्यायालय ने उनको भी आईना दिखाया है जो व्यवस्था में मनमर्जी चाहते हैं लेकिन अवश्य ही उनको नहीं, जो पर्दे के पीछे रहकर अपना चेहरा बचाने की फिराक में थे। इस बार मुख बेशक मसीह का है किंतु कभी यह हर्षद मेहता का तो कभी अब्दुल करीम तेलगी का रहा, जो कि दुनिया को दिखाता है कि हमारी व्यवस्था में सड़न कितनी गहरी है, और इसके लिए हमें उसका (मसीह का) धन्यवाद करना होगा। हालांकि, एक मसीह के बरअक्स बहुतों पर ध्यान नहीं गया, भले ही उन्होंने व्यवस्था को इतना नुकसान पहुंचाया जिसकी भरपाई संभव नहीं।
कुछ लोगों ने इस प्रसंग को ‘इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन बनाम मतपत्र में कौन बेहतर’ का पुट देने की कोशिश की है, यह कहते हुए कि ईवीएम होती तो मतपत्र की तरह गड़बड़ संभव न थी। लेकिन मतपत्र के मामले में, गड़बड़ी को पकड़ा तो जा सकता है जबकि जिन्हें ईवीएम पर शक है, उनके मुताबिक ईवीएम में हेराफेरी को पकड़ना मुश्किल है। इसका यह अर्थ नहीं कि हम पुनः मतपत्र वाले काल में लौट जाएं और ईवीएम के उपयोग से हासिल हुई दक्षता से खुद को महरूम करें। हालांकि इसका मतलब यह भी नहीं कि ईवीएम को लेकर जो शक-शुबहा हैं, उन्हें दूर न किया जाए। यह सार्वजनिक बहस का अलग से विषय है, जिसको लेकर मामला सर्वोच्च न्यायलय के सम्मुख भी है।
मसीह वाले प्रसंग में, सर्वोच्च न्यायालय ने रिवायती लंबी प्रक्रिया न अपनाकर त्वरित न्याय दिया है। खंडपीठ ने सबके सामने पड़ताल की और प्रस्तुत सबूतों के आधार पर अपेक्षाकृत सरल इस मामले में सत्य को छांट लिया। चुनाव दुबारा से करवाना न्यायोचित न होता, खासकर जब विवाद चुनाव अधिकारी द्वारा कुछ मतपत्रों को बिगाड़ने तक सीमित था और जिसके लिए अकाट्य प्रमाण उपलब्ध था। अदालत ने चुनाव अधिकारी द्वारा किए कृत्य को निरस्त करके और विवादित मतपत्रों को वैध ठहराते हुए, चुनाव परिणाम की घोषणा करवाकर सही किया है। ईवीएम से पूर्व काल में चुनाव अधिकारी गणना से पहले, मतपत्रों की वैधता तय करने में, इसी प्रकार अपनी चलाया करते थे। सर्वोच्च न्यायालय का फैसला क्रिकेट मैच में अपनाई डीआरए (डिसीजन रिव्यू सिस्टम) व्यवस्था सरीखा है, जिसमें तीसरा अम्पायर मैदान वाले अम्पायर के फैसले को उलट सकता है, बिना गेंद दुबारा डलवाए।
यह कहना कि मसीह तो एक आसान निशाना था, इसके बावजूद अदालत के जज़्बे की तारीफ बनती है न कि कम करके आंकना। मसीह का अनुचित व्यवहार ही उसको निशाने पर ले आया। जिस पर न्यायाधीश खफा हुए, साफ है उसने यह करके अपनी छवि खलनायक जैसी बना डाली। अदालती फैसले को अपरिहार्य दंडाधिकारी की तरह लिया जाए, जैसे कि कर्मफल का दंड देने वाली ग्रीक देवी नेमेसिस, जो नियम-स्थापित पवित्र प्रक्रिया को बिगाड़ने का प्रयास करने वालों का इंतजार करती है।
हालांकि गूढ़ प्रश्न है कि क्या मसीह ने यह सब अपने तौर पर किया होगा। क्या अन्य भी थे जिन्होंने उसे ऐसा करने को कहा और यकीन दिलवाया कि यदि कुछ समय के लिए अपनी अंतरात्मा को दबा दे तो बहुत बड़ा फल मिलेगा। और इस दुर्भाग्यपूर्ण मामले में यही बात गहन पड़ताल का आह्वान करती है। जिस ढंग से ‘विजयी’ घोषित किए मेयर ने कुर्सी संभाली, वह कठिनाई से पाई सफलता पर तात्क्षणिक खुशी के सदका न होकर उस साजिश का हिस्सा था, जिसकी पटकथा पहले लिखी जा चुकी थी और अगले दृश्य के अभिनय में केवल इशारे मिलने की देर थी। चुनाव अधिकारी तो केवल एक निमित्त मात्र था।
आदि से अंत तक, यह पूर्ण रूप से चालबाजी थी। पहले एक घटिया साजिश फिर उसका अनाड़ी क्रियान्वयन, तत्पश्चात तुरत-फुरत कब्जा करना। आगे, कुछ पार्षदों का पाला बदलना और मेयर का त्यागपत्र देना तेजी से बदलते परिदृश्य में एक चतुर किंतु अधकचरा जुगाड़ रहा। अवश्य इस सबके पीछे कोई ‘मास्टरमाइंड’ जरूर काम कर रहा था। परंतु अंततः न्यायालय ने हथौड़ा चलाकर इस नाटक का पटाक्षेप कर दिया।
नये मेयर को गद्दी से उतारने के लिए उसके खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव लाने की संभावना बनी हुई है, यदि कानूनन इजाज़त हो। यह पैंतरा सफल हो भी सकता है, क्योंकि ‘मंडी’ में हरेक ‘चीज़’ की एक कीमत है। यह होने पर, लोकतंत्र का आगे चीरचरण होगा। कोई हैरानी नहीं इस अलोकतांत्रिक प्रयास से सत्ता हासिल करने पर सत्तारूढ़ दल की ओर से मुंह से एक शब्द तक न निकला। जो कुछ सर्वोच्च न्यायलय ने मसीह वाले मामले में किया है वह न्याय को तार्किक निर्णय तक पहुंचाने जैसा है। यह कुछ ऐसा है कि न्यायाधीशों ने दिन-दहाड़े डकैती होना पाया और एक लुटेरा पकड़ा गया, तब मजबूरन डकैतों ने लूटा माल लौटाना तय किया। यहां इस मामले में, छीना गया सबसे कीमती सरमाया यानी लोकतंत्र, जिसके लिए देश ने लंबी लड़ाई लड़ी है। सर्वोच्च अदालत द्वारा लोकतांत्रिक व्यवस्था को पुनः स्थापित करने के साथ, क्या भारत के लोग इसे सहेजकर रखने के लिए अपनी ओर से कुछ योगदान करेंगे? क्या यह सिद्धांत इलेक्ट्राल बॉन्ड्स पर भी लागू होगा, यक्ष प्रश्न है।
बाइबल के पात्रों डेविड और गोलिएथ की तरह न तो यह लड़ाई पहली है न ही अंतिम। वहां तो डेविड ने कंकड़ एवं गुलेल और सहायक बने ईश्वर का साथ पाकर गोलिएथ को हरा दिया था। किंतु आज के प्रत्येक डेविड को यदि जीतने की आशा रखनी है, तो प्रतिबद्धतापूर्ण साहस और अदालतों के सतत और बिना शर्त साथ की जरूरत है। कोई हैरानी नहीं न्यायाधीश को माई लॉर्ड (मेरा भगवान) कहा जाता है।

लेखक भारत के पूर्व चुनाव आयुक्त हैं।

Advertisement

Advertisement
Advertisement
Advertisement
×