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समर्पित राष्ट्र सेवा

06:38 AM Oct 09, 2023 IST

बात उन दिनों की है जब लोकमान्य तिलक विलायत से लौटे थे। तिलक तथा उनके साथी तांत्या साहेब कलेकर के सम्मान में पूना के ओंकारेश्वर मंदिर के प्रांगण में स्वागत-समारोह का आयोजन किया गया। समारोह के पश्चात एक स्वयंसेवक ने लोकमान्य तिलक से अपनी दो घोड़ों की बग्घी में बैठने के लिए कहा। स्वयंसेवक ने जब उन लोगों को पहनाई गई मालाएं बग्घी में रखनी शुरू की तो तिलक जी ने सारी मालाएं बग्घी के कोचवान की तरफ बढ़ाते हुए कहा, ‘लो, ये हार अपने दोनों घोड़ों के गले में डाल दो। उन्होंने कहा कि जिस तरह तुम्हारे ये घोड़े इस बग्घी को खींचते हैं, उसी प्रकार हम दोनों देशरूपी बग्घी को खींचते हैं। हम में और इन घोड़ों में कोई अंतर नहीं है।’

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प्रस्तुति : अक्षिता तिवारी

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