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खुशी-आनन्द के शहर

07:09 AM Feb 20, 2024 IST
खुशी आनन्द के शहर
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अक्सर विकसित भारत के संकल्प की बात की जाती है, लेकिन जरूरत इस बात की भी है कि यह विकास की किरण आमजन के जीवन में भी दृष्टिगोचर हो। उसका जीवन स्तर भी बदलता नजर आए। वैसे हमारी तेजी से बढ़ती आबादी के मद्देनजर जरूरी है कि अब चाहे उत्पादकता का क्षेत्र हो या सेवा का क्षेत्र, उसके अनुरूप शहरों की बसावट हो। व्यावसायिक दृष्टि से भी और दैनिक जीवन-यापन के नजरिये से भी। सही मायनों में ग्लोबल वार्मिंग के संकट से उपजे तीखे मौसमी प्रभाव से जनजीवन को सामान्य बनाने के लिये देश को आधुनिक डिजाइन से बने शहरों की जरूरत है। जो पुराने बसाये शहरों में संभव नहीं है। गुरुग्राम जैसा आधुनिक शहर तेज बारिश में जलमग्न हो जाता है और ट्रैफिक जाम के संकट से आये दिन जूझता रहता है। दरअसल, जरूरत इस बात की है कि शहरों की संरचना सौ साल बाद की परिस्थितियों से जूझने में सक्षम हो। ऐसे में हरियाणा के उपमुख्यमंत्री दुष्यंत चौटाला की वह घोषणा उम्मीद जगाती है कि हरियाणा में ‘सिटी ऑफ हैप्पीनेस’ और ‘सिटी ऑफ जॉय बसेंगे’। इन शहरों को कुंडली-मानेसर-पलवल एक्सप्रेस-वे यानी केएमपी पर बसाया जाएगा। दरअसल, मनोहर सरकार की योजना है कि केएमपी के दोनों तरफ पांच आधुनिक शहर बसाए जाएं, लेकिन शुरुआत इन दो शहरों ‘सिटी ऑफ हैप्पीनेस’ और ‘सिटी ऑफ जॉय’ से की जाएगी। इसमें पहला शहर खरखौदा-सोनीपत के निकट तो दूसरा शहर पलवल व फरीदाबाद के बीच बसेगा। हालांकि,अभी यह योजना शुरुआती दौर में है और सिंगापुर की एक कंपनी द्वारा इन खुशी और आनन्द के शहरों का तानाबाना बुना जा रहा है। विश्वास किया जाना चाहिए कि वास्तव में खुशी लोगों के जीवन में आए और उनकी खुशियों को बड़ी मछलियों की नजर न लगे, जो नये उपक्रमों में लॉयन शेयर लेने में कामयाब हो जाते हैं। ऐसे वक्त में जब दिल्ली के कारोबार का लगातार विस्तार राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र के शहरों मसलन गुरुग्राम और फरीदाबाद में हो रहा है, नये शहरों का बसाया जाना हरियाणा के हित में होगा।
दरअसल, विगत के अनुभव बताते हैं कि नये शहर तो बसाए जाते हैं, लेकिन उनके निर्माण में दूरदृष्टि का अभाव रहता है। कुछ दशकों बाद उनमें पुराने शहरों की तरह यातायात व जलनिकासी के संकट पैदा हो जाते हैं। भारत के सबसे पहले नियोजित और विदेशों की तर्ज पर बनाये गए सिटी ब्यूटीफुल कहे जाने वाले चंडीगढ़ को आज इसी तरह की कई चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है। कभी बाबुओं का शहर कहा जाने वाला चंडीगढ़ आज कारों के बोझ से दबा है। नीति-नियंताओं ने कभी नहीं सोचा था कि इस शहर में इतनी कारों का रेला आएगा। कमोबेश, ‘सिटी ऑफ हैप्पीनेस’ और ‘सिटी ऑफ जॉय’ अपने नाम के अनुरूप पूरा बनने पर नजर आएं। हमें आने वाले सौ सालों के लक्ष्यों को लेकर इन शहरों की संरचना बनानी होगी। उसमें पर्यावरण, खेल और आमोद-प्रमोद से लेकर सेहत के सरोकारों को प्राथमिकता देनी होगी। हमारे शहरों का वातावरण ही हमें आनन्दित व खुश रख सकता है। एक पारदर्शी व्यवस्था से ही ये लक्ष्य हासिल किये जा सकते हैं। निश्चित रूप से विदेशी मॉडल के शहर हरियाणवी जनमानस की आकांक्षाओं को पूरा नहीं कर सकते। उसमें परंपरागत हरियाणा की महक भी जरूरी है। पुरखों का हरियाणा भी उसमें नजर आए। उन खिलाड़ियों के अनुकूल वातावरण होना चाहिए जो आज देश-दुनिया से सोने-चांदी के मेडल जीतकर ला रहे हैं। निश्चित रूप से जब कोई नया शहर बनता है तो तरह-तरह के रोजगार की संभावनाओं के द्वार खुलते हैं। लेकिन कोशिश हो कि हरियाणा के युवाओं के लिये रोजगार के अवसर सुनहरे हों। इसके अलावा उन किसानों के वंशजों के हकों का विशेष ध्यान इन शहरों में रखा जाए, जिन्होंने केएमपी और इन शहरों के निर्माण के लिये अपने पुरखों की जमीन दी है। ऐसी व्यवस्था होनी चाहिए कि उनके आश्रितों को बिना किसी लाल फीताशाही के अपने हक मिल जाएं। तभी तो हम कह सकेंगे कि ये शहर वाकई ‘सिटी ऑफ हैप्पीनेस’ और ‘सिटी ऑफ जॉय’ हैं।

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