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खान-पान की आदतों में बदलाव रोकेगा मोटापा

08:22 AM Mar 13, 2024 IST
खान पान की आदतों में बदलाव रोकेगा मोटापा
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डॉ. (प्रो.) अरुणांशु बेहरा

गंभीर स्थिति है कि आज महानगरों में सत्तर फीसदी लोग मोटे हैं या मोटापे से ग्रसित हैं। भारत दुनिया में मोटापे से ग्रसित देशों में तीसरे नंबर पर है। यह मिथक टूट रहा है कि मोटापा सिर्फ अमीरों की ही बीमारी है। मोटापा ज्यादा खाने से ही नहीं होता बल्कि खान-पान की गलत आदतों से भी होता है। यदि हम अपना वजन पांच से दस प्रतिशत कम कर सकें तो कई बीमारियों को टाला जा सकता है या फिर रोका जा सकता है। बहुत संभव है कि आने वाले समय में फिटनेस सेंटरों में आहार और पोषण विशेषज्ञों की तैनाती होगी। साथ ही अब सर्जरी के जरिये भी मोटापा कम करने के विकल्प तलाशे जा रहे हैं। फिलहाल देश में तीन करोड़ वयस्क लोग अधिक वजन या मोटापे से त्रस्त हैं। मोटापे से होने वाले अन्य रोगों के साथ करीब छह करोड़ लोग मधुमेह से पीड़ित भी हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन के आंकड़े बताते हैं कि दुनिया में 28 लाख वयस्क लोग मोटापे के कारण
हर साल मर जाते हैं। पिछले चार दशक से पीजीआईएमआर चंडीगढ़ में कार्यरत और सर्जरी विभागाध्यक्ष रहे डॉ. (प्रो.) अरुणांशु बेहरा ने मोटापे के खतरे, इससे बचाव तथा खान-पान में सुधार को लेकर विस्तृत बातचीत की।

अचानक भारत में मोटापे की बाढ़ कैसे आई?

हमारे देश में सदियों से खान-पान संतुलित ही रहा। देश में मोटापे की ऐसी कोई समस्या न थी। अचानक मोटापा हमारे जीवन का हिस्सा बन गया। देश में आर्थिक विषमता बताती है कि तीस प्रतिशत बच्चे कुपोषण के शिकार हैं। लेकिन बड़ी आबादी मोटापे की शिकार है। दरअसल, हमारी जीवन शैली की इसमें बड़ी भूमिका रही है। देश ने आजादी के बाद काफी आर्थिक तरक्की की। समृद्धि आई व आर्थिक स्थिति सुधरी तो खाने-पीने की मात्रा बढ़ी है। आज देश के चार करोड़ लोग मोटापे के शिकार हैं। वहीं दो करोड़ महिलाएं भी मोटापे की गिरफ्त में हैं। हम लोग हैवी खाना ज्यादा खाते हैं। ड्रिंकिंग की आदत बदली है। लाइफ स्टाइल ने मोटापा बढ़ा दिया। मोटापे से बीमारियों की शृंखला शुरू हो जाती है। इंसुलिन असंतुलित होता है। पुरुषों व महिलाओं में अलग-अलग तरह की बीमारियां पैदा होती हैं। अब चाहे हाइपरटेंशन की बीमारी हो, डाइबिटीज हो, बहुत सारे लोग हार्ट अटैक से मर रहे हैं। मोटापा इन रोगों के लिये उर्वरा भूमि तैयार करता है। इसी तरह महिलाओं में पीसीओडी की समस्या भी मोटापे से बढ़ती है। कालांतर कैंसर तक मोटापे से बढ़ता है। पचास साल की उम्र के बाद कैंसर का हाई रिस्क बढ़ता है। मोटापे से यह खतरा अधिक बढ़ जाता है।

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आम आदमी कैसे जाने कि मोटापा कैसे बढ़ता है?

दरअसल,आम आदमी को आधिक खाने की आदत हो गई है। खाने पर कंट्रोल नहीं है। पहले हम दो तिहाई सब्जी व एक तिहाई से कम प्रोटीन लेते थे। कुकिंग में वसा यानी फैट कम प्रयोग होता था। अब कुकिंग की प्रणाली बदल गई है। हमें फैट कम यूज करना चाहिए। कार्बोहाइड्रेट कम लेना चाहिए ताकि जल्दी हजम हो। दरअसल, कार्बोहाइड्रेट व फैट का हैवी कॉम्बिनेशन नुकसान दायक है। हम ज्यादा फास्टफूड खा रहे हैं।

हमारे जीवन में श्रमशीलता कम होना भी वजह है?

निस्संदेह, हम अब शारीरिक श्रम करने से कतराते हैं। टेक्नालॉजी का इस्तेमाल बढ़ा है। हम शारीरिक काम नहीं करते। लिफ्ट चढ़ते हैं सीढ़ी नहीं चढ़ते। मैं हमेशा सीढियों का इस्तेमाल करता हूं। हम थोड़ा भी चलना नहीं चाहते। अगर घर से सौ मीटर जाना हो तो कार का इस्तेमाल करते हैं। हम एक्सरसाइज नहीं करते।

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क्या स्वाद प्रधान खाना बड़ा कारण है?

पहले लोग घर में बना ही खाते थे। फास्ट फूड फैट को बढ़ावा देता है। जिससे शरीर ओवर वेट हो जाता है। हमारा जो स्वाद वाला खाना है, वो फैट में फ्राइ होता है। होटल ,रेस्टोरेंट वाले खाने को स्वादिष्ट बनाने के लिये ज्यादा मात्रा में फैट का प्रयोग करते हैं। वही हमें अच्छा लगता है।

क्या हम भूख न होते हुए भी आदतन ज्यादा खाते हैं?

इसका उपाय यह है कि जितना जरूरी हो, उतना ही खाया जाए। दरअसल हमारी भूख दिमागी अधिक होती है। यह साइकोलॉजिकल पक्ष भी है। हमने छककर फास्ट फूड खा लिया फिर भी कहते हैं खाना तो नहीं खाया है। फिर आदतन खाना भी खा लेते हैं। खाना तब जरूरी था जब हम बाहर का अनाप-शनाप नहीं खाते थे। पहले फास्ट फूड नहीं थे तो हम स्वस्थ थे। घर में बना साधारण खाना खाते थे। अब संयम भी नही है।

क्या आर्थिक समृद्धि मोटापा लेकर आई है?

निश्चित रूप से यह एक हकीकत है। हम कुछ भी खा लें, लेकिन संतुलन जरूरी है। एक अच्छी चीज आज खा ली तो दूसरी चीज कल खा लें।

क्या गरीबी, अकाल,बाढ़ आपदाओं से गुरबत से उबर रहे देशों में तरक्की के साथ लोगों की भूख खुल रही है?

निश्चित रूप से ऐसा है। विकासशील से विकसित होते भारत में यही स्थिति है। अमेरिका में देखिए संपन्नता के बाद लोग जमकर खा रहे हैं और वहां सबसे ज्यादा मोटे मिलेंगे। ब्राजील का भी ऐसा ही है। अब तो गरीब का बच्चा भी बर्गर चाहता है। गरीबी से विकासशील होते देशों में ऐसा ही है। गुणवत्ता के खाने की जगह स्वाद वाले खाने ने ले ली है। हमारी प्राथमिकता टेस्टी खाना होता है। बाजार से डिब्बाबंद खाना हमारी खानपान आदतों में बढ़ा है।

आम आदमी कैसे पता लगाए कि यह खाना संतुलित है?

पहले हम खाने में ज्यादा सब्जी लेते थे। हम प्रोटीन के लिये दाल, दलिया, मोटे अनाज को भोजन में शामिल करते थे। लेकिन पश्चिमी जीवन शैली के अनुसरण से हम स्वाद प्रधान भोजन को तरजीह देने लगे हैं। दरअसल, खाने का स्टाइल बदल गया है।

क्या कोई चिकित्सीय अध्ययन हुआ है कि बाजार में बिकने वाले फास्ड फूड हमारे स्वास्थ्य के लिये घातक हैं?

दरअसल, ऑयल, अधिक प्रोटीन सेहत के लिये हानिकारक है। हमें अपने खाने में प्रोटीन को संतुलित करने की जरूरत है। सिर्फ स्वाद के लिए खाना हानिकर है। हम कुछ भी खाते रहते हैं। अच्छा खाने का मतलब अच्छा स्वाद नहीं है।

क्या सर्जरी से मोटापा कम करने के बाद फिर मोटापा बढ़ने की गुंजाइश रहती है?

निश्चित रूप से सर्जरी से मोटापा कम होता है। लेकिन इस बात की गारंटी नहीं है कि फिर मोटापा नहीं बढ़ेगा। दुबारा मोटापा बढ़ सकता है यदि हम मोटिवेट नहीं होते, यदि खानपान संतुलित नहीं करते, खानपान की मात्रा पर ध्यान नहीं देते।

कम करने में योग की कितनी भूमिका है?

योग का बहुत महत्वपूर्ण रोल है। कोई भी बीमारी मसलन ब्लड प्रेशर, मोटापा,हाइपरटेंशन, मधुमेह के उपचार में योग खासा कारगर है। लेकिन कुछ दिन में बहुत ज्यादा मोटापा कम करने के दावे अतिरंजित हैं। इसे बढ़ा-चढ़ाकर नहीं देखा जाना चाहिए।

-अरुण नैथानी

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