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स्वास्थ्य क्षेत्र में एआई के उपयोग की चुनौतियां

07:20 AM Feb 02, 2024 IST
स्वास्थ्य क्षेत्र में एआई के उपयोग की चुनौतियां
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दिनेश सी. शर्मा

आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस (एआई) टूल्स जैसे कि चैटजीपीटी तमाम क्षेत्रों में लोकप्रियता हासिल कर रहे हैं, अब तो चिकित्सकों, मरीज़ों और स्वास्थ्य देखभाल एजेंसियों ने भी उपयोग शुरू कर दिया है। विश्व स्वास्थ्य संगठन ने एआई की नैतिक उत्तरदायित्व एवं परिचालन विधि को लेकर नए परामर्श प्रपत्र में चेतावनी युक्त संदेश जारी किया है, विशेषकर स्वास्थ्य क्षेत्र में लार्ज मल्टी-मोडल मॉडल्स (एलएमएम) के इस्तेमाल पर।
एलएमएम, जैसे कि चैटजीपीटी और बार्ड, टेक्सट और वीडियो जैसे इनपुट डाटा को स्वीकर कर सकता है और जो आउटपुट यह पैदा करेगा वह मात्र इंपुटेड डाटा तक सीमित नहीं है। ये व्यवस्थाएं मानवीय सक्षमता की नकल करने के लिए डिजाइन की गई हैं, यहां तक कि ऐसे कार्य करने में समर्थ हैं, जिनके लिए इनमें लंर्निंग और एडैप्टिंग प्रोग्राम फीड न भी किए गए हों। इसलिए इनसे स्वास्थ्य से संबंधित मिथ्या, त्रुटिपूर्ण, पक्षपाती या अपूर्ण सूचनाएं आने का गंभीर जोखिम दरपेश है। यह भी अब साफ है कि एआई व्यवस्था को इस तरह ‘सिखाया’ जा सकता है कि लैंगिक, जाति, नस्ल आदि से संबंधित असत्य, तोड़ा-मरोड़ा डाटा घड़कर यह हानिकारक या पक्षपाती सामग्री पैदा कर सके।
एआई का उपयोग बढ़ने के साथ विश्व स्वास्थ्य संगठन ने 2021 में मोटे तौर पर सामान्य दिशा-निर्देशक सिद्धांत जारी किए थे, जोकि स्वास्थ्य क्षेत्र में इस नई तकनीक के इस्तेमाल की संभावना को मान्यता थी। इन सिद्धांतों के मुताबिक, एआई तकनीक के लिए अनिवार्य था कि वह संप्रभुता की सुरक्षा, मानव भलाई को बढ़ावा, मानव सुरक्षा, जनहित को प्रोत्साहित करे, साथ ही पारदर्शी, व्याख्यात्मक हो एवं सुबोधता सुनिश्चित करती हो, उत्तरदायी और जिम्मेवाराना हो, सबका साथ और समानता सुनिश्चित करने वाली हो, उन तकनीकों को बढ़ावा दे जो प्रतिक्रियाशील और सतत हों। व्याख्यात्मक का अर्थ है कि पब्लिक डोमेन में एआई के डिज़ाइन या डिप्लॉयमेंट को लेकर समुचित जानकारी उपलब्ध करवाई जाए।
पिछले हफ्ते जारी नए दिशा-निर्देश स्वास्थ्य क्षेत्र में एलएमएम के विकास और अपनाए जाने से संबंधित हैं। एलएमएम का उपयोग समझने के लिए, किसी एआई तकनीक की वैल्यू-चेन (मूल्य-शृंखला) को समझना बहुत महतत्वपूर्ण है। इस शृंखला के किसी भी चरण पर, अहम निर्णय लेने पड़ेंगे, जो इस तकनीक की भावी दिशा और परिणामों पर असर डाल सकते हैं।
शृंखला का आरंभ एलएमएम टूल को विकसित करने से होता है। विकसित करने वालों में, कोई एक बड़ी तकनीकी कंपनी, कोई यूनिवर्सिटी या एक तकनीक नव-उद्यम या राष्ट्रीय स्वास्थ्य प्रणाली या सार्वजनिक-निजी भागीदार उद्यम हो सकता है। तत्पश्चात, एक प्रदाता, जो कोई तीसरा पक्ष भी हो सकता है, वह एलएमएम में आगे सूक्ष्म सुधार और इसको प्रशिक्षित करके एक प्रोग्रामिंग इंटरफेस पेश कर सकता है। बृहद सॉफ्टवेयर के साथ एलएमएम का एकीकरण करने की जिम्मेवारी प्रदाता की है ताकि यह एक एप्लीकेशन बन सके। चेन में तीसरा मुख्य खिलाड़ी डेप्लॉयर है, जो अंतिम छोर पर, उपयोगकर्ता को यह सेवा उपलब्ध करवाता है। स्वास्थ्य क्षेत्र में, प्रदाता कोई एक अस्पताल शृंखला, सरकारी स्वास्थ्य एजेंसी या फिर दवा कंपनी भी हो सकती है। इस वैल्यू चेन के प्रत्येक चरण पर– डेवेलपर, प्रोवाइडर और डेप्लॉयर –के अलावा बहु-नैतिकता एवं प्रशासनिक मुद्दों की भूमिका है। अधिकांशतः, डेवेलपर एक बड़ी तकनीकी कंपनी होगी क्योंकि एलएमएम विकसित करने को जरूरी पर्याप्त कम्यूटिंग पॉवर, तकनीकी कौशल और धन उसके पास होगा। लेकिन, एलएमएम अपने एल्गॉरिद‍्म एवं संभावित जोखिम संबंधी सूचना को अपारदर्शी बनाकर बड़ी तकनीकी कंपनियों के दबदबे को और मजबूती दे सकता है। पारदर्शिता को लेकर कॉर्पोरेट में प्रतिबद्धता नदारद होना एक मुख्य चिंता है।
नियामक और विधिक प्राधिकरण को एआई टूल्स द्वारा मौजूदा विधिक एवं नियामक तंत्र में दिए दिशा-निर्देशों, अंतर्राष्ट्रीय मानवाधिकार दायित्व और राष्ट्रीय डाटा सुरक्षा कानून के प्रावधानों के अनुपालन को लेकर चिंता है। एलएमएम की घोषणा के समय सरकार एवं नियामक एंजेसियां सकते में थीं क्योंकि उनके पास इसको लेकर कोई नियम मौजूद नहीं थे। उदाहरणार्थ, यूरोपियन यूनियन को आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस कानून की पुनर्समीक्षा के आखिरी पड़ाव पर एलएमएम को शामिल करने के लिए पुनः नए प्रावधान जोड़ने पड़े।
वैल्यू चेन में एलएमएम के प्रशिक्षण के लिए जिस ढंग से डाटा एकत्रण या प्रबंधन और प्रसंस्करण चल रहा है, विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार हो सकता है यह एल्गॉरिद‍्म विधिक एवं नियामक तंत्र की पालना न करे। जैसा कि अध्ययनों में पाया गया है, एलएमएम में फर्जी प्रतिक्रिया देने की संभावना खुली है और नियमों का अनुपालन न करना देखा गया है। जैसे-जैसे एलएमएम का उपयोग स्वास्थ्य तंत्र को चलाने में बढ़ता जा रहा है, एक अन्य चिंता उपजी है कि गलतियों, दुरुपयोग और नुकसान होने की सूरत में जिम्मेवारी क्या होगी। अन्य तकनीकी एप्लीकेशंस की भांति, इस प्रणाली को भी साइबर अटैक का खतरा है, तब मरीज से संबंधित जानकारी को खतरा होगा।
विश्व स्वास्थ्य संगठन ने मोटे तौर पर एमएलएल की पांच उपयोगिताओं की शिनाख्त की है, क्रमशः डायाग्नोसिस एंड क्लीनिकल केयर, इनवेस्टीगेटिंग सिम्पट्म्स एंड ट्रीटमेंट, क्लेरिकल-एडमिनिस्ट्रेटिव टास्क (जैसे मरीज की फेरियों का संक्षिप्त विवरण) और मेडिकल एवं नर्सिंग शिक्षा, वैज्ञानिक अनुसंधान एवं औषधि विकास। मरीजों की पूछताछ का उत्तर देने को स्वास्थ्य संबंधी रिकार्ड और फेरियों पर आधारित एआई, खासकर एलएमएम का उपयोग हेल्थ क्षेत्र में बढ़ रहा है। इससे स्वास्थ्य कर्मी का समय बचाने में मदद मिलेगी। एक कंपनी ऐसा मेडिकल एलएमएम विकसित कर रही है जो मरीज द्वारा पूछे सवालों का जवाब दे पाएगी और उसकी मेडिकल हिस्ट्री एवं जांच रिपोर्ट्स का डाटा (जैसे एक्स-रे रिपोर्ट) सम्मिलित करके संक्षिप्त ब्योरा और क्लीनिशियंस के लिए अंतिम रिपोर्ट तैयार करेगी।
डर यह है कि जरूरी नहीं कि विशेषतौर पर प्रशिक्षित व्यवस्था भी सटीक उत्तर बना पाए। एआई टूल्स का एक बड़ा असर डॉक्टर-मरीज रिश्तों में आगे बदलाव होगा, जोकि मरीजों द्वारा इंटरनेट सर्च इंजन के उपयोग में बढ़ोतरी की वजह से पहले से खराब हैं। आगे की राह एआई टूल्स और एलएमएम का उपयोग बंद करने में नहीं बल्कि इन्हें पारदर्शिता से विकसित करने और इनके उत्तरदायित्वपूर्ण उपयोग को बढ़ावा देने में है। आरंभ के लिए, सरकार को स्वास्थ्य सेवा या दवा क्षेत्र को लेकर विकसित किए जाने वाली एमएलएम की अंदरूनी जानकारी तक पहुंच और अनुमति देने के लिए एक नियामक एजेंसी बनानी चाहिए। इसके साथ ही, कम्प्यूटिंग पॉवर एवं पब्लिक डाटासेट्स के समावेश वाला गैर-मुनाफा अथवा सार्वजनिक तंत्र विकसित करने का प्रयास हो, जिस तक सार्वजनिक, निजी और गैर मुनाफा टूल विकसित करने वालों की पहुंच हो। स्वास्थ्य सेवाओं और उत्पादों पर लागू होने वाले तमाम नैतिक और मानवाधिकार मानकों को विस्तार देते हुए एआई तकनीक एवं टूल्स पर भी लागू किया जाए। जहां कहीं स्वास्थ्य क्षेत्र और मेडिकल एप्लीकेशंस में एलएमएम का इस्तेमाल बड़े पैमाने पर हो, वहां जारी किए जाने उपरांत इनकी लेखा-परीक्षा और प्रभाव का आकलन स्वतंत्र तीसरे पक्ष द्वारा करवाना अनिवार्य बनाया जाए। लिहाजा, न तो एआई के फायदों को बढ़ा-चढ़ाकर देखा जाए न ही इससे जुड़े जोखिमों को घटाकर पेश किया जाए।

लेखक विज्ञान संबंधी विषयों के माहिर हैं।

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