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मगर इससे क्या बदलेगा

09:26 AM Jul 07, 2024 IST
मगर इससे क्या बदलेगा
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हर वर्ल्ड कप की जीत भारतीय क्रिकेट में भी बहुत कुछ बदलती है। इन्हीं जीतों ने भारतीय क्रिकेट को बेशुमार धन से लेकर देश में न केवल इस खेल की लोकप्रियता को अथाह बढ़ाया बल्कि इस दुनिया में क्रिकेट का ऐसा पॉवर सेंटर भी बना दिया, जिसके बगैर अब वर्ल्ड क्रिकेट का कोई पत्ता शायद ही हिलता हो। सही मायनों में दुनिया में क्रिकेट की ताकत और उसकी ऊंची उड़ान के पीछे भी कहीं न कहीं भारत है। हालांकि यह सब ऐसे ही नहीं बदला। हालिया चौथे वर्ल्ड कप की जीत भी बदलाव लायी है जो हमें खेल में चैंपियनों सरीखी दृढ़ता और पेशेवर अंदाज देगी।

संजय श्रीवास्तव

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चार दशक से क्रिकेट पर लेखन

कोई शायद सोच भी नहीं सकता कि 70 के दशक तक क्रिकेट को बपौती समझने वाले अंग्रेज देश हमें यानी भारतीय क्रिकेट टीम को गंभीरता से नहीं लेते थे। वर्ल्ड क्रिकेट को संचालित करने वाली संस्था इंटरनेशनल क्रिकेट काउंसिल में भारत की आवाज सुनी तक नहीं जाती थी। ये माना जाता था कि आईसीसी के बॉस तो हमेशा से अंग्रेज हैं, और वही रहेंगे। इन सब बातों को बदलने और यहां तक पहुंचने में सही मायनों में वर्ल्ड कप चैंपियन बनने की हमारी गाथाओं ने नई दुनिया रची। जो क्रिकेट और बीसीसीआई का रुतबा और खजाना आप अब देख रहे हैं, उसे वर्ल्ड कप की चार जीतों ने एक खास शेप दी है।
उम्मीदों से भी आगे 1983 की जीत
भारत ने जब 1983 में पहली बार लंदन में प्रूडेंशियल वर्ल्ड कप क्रिकेट जीता तो किसी को सपने में भी उम्मीद नहीं थी कि कपिल देव की कप्तानी में गई भारतीय टीम ऐसा कर पाएगी। न तो भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड यानि बीसीसीआई को और न ही इस देश को। तभी तो दूरदर्शन ने सेमीफाइनल और फाइनल मैच को टेलीकास्ट करने के अधिकार पहले से हासिल ही नहीं किए थे। तब भारत में वन-डे क्रिकेट को हिकारत से देखा जाता था। बीसीसीआई के पास इतने पैसे भी नहीं होते थे कि खिलाड़ियों को तरीके से विदेशी दौरों पर भेज पाए। विदेशी दौरों में उन्हें अच्छे होटलों में ठहराए और सुविधाएं दे सके। मैच फीस तो इतनी कम थी कि वे इस पैसे में इंग्लैंड में एक दिन खर्च भी करना चाहें तो यह ऊंट के मुंह में जीरे जैसी रकम थी।

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हालात धीरे-धीरे ही बदले
भारतीय क्रिकेट टीम जब 1983 का वर्ल्ड कप खेलने इंग्लैंड पहुंची, तब तक हकीकत में भारतीय क्रिकेट टीम की इमेज एक ढीली-ढाली टीम की ही थी। वन-डे क्रिकेट में भारत ने जिस तरह का दयनीय प्रदर्शन 1975 और 1979 में किया था, उसके बाद भारत को लेकर बहुत बेहतर राय बन भी नहीं सकती थी। उस दौर में भारत में क्रिकेट की संरचना नहीं थी। तब तक हॉकी की लोकप्रियता ज्यादा थी। स्टेडियम सुविधाजनक नहीं थे। फर्स्ट क्लास क्रिकेट में खिलाड़ियों को कोई पैसा नहीं मिलता था। बीसीसीआई के खजाने में धन नहीं होता था। आईसीसी में हमारी बात को इंग्लैंड और आस्ट्रेलियाई बोर्ड के लोग काट दिया करते थे। हालांकि 70 के दशक के आखिर से भारतीय क्रिकेट टीम ने यह दिखाना जरूर शुरू कर दिया था कि वह बदल रही है।


मिलने लगा बाजार का भी साथ
कपिलदेव की अगुवाई में 1983 के वर्ल्ड कप के लिए इंग्लैंड पहुंची टीम ने मैच-दर-मैच ये विश्वास पा लिया कि वे चाहें तो कुछ भी कर सकते हैं। फिर ज्यादातर आलराउंडरों की इस टीम ने सेमीफाइनल और फिर फाइनल को जिस तरह से अपनी मुट्ठी में किया तो भारत के क्रिकेट में सबकुछ बदल गया। देश में खेल जबरदस्त तरीके से लोकप्रिय हो गया। हर गली-मोहल्ले में हॉकी की जगह क्रिकेट के बैट-बॉल ने जगह ले ली। हालांकि भारत में तब बाजार दमदार नहीं था लेकिन इस खेल को हाथोंहाथ लेना शुरू कर दिया। बीसीसीआई की आवाज अब आईसीसी में सुनी जाने लगी।


पहली बार वर्ल्ड कप की मेजबानी
भारत ने जब आईसीसी की बैठक में 1987 का वर्ल्डकप अपने यहां कराने की बात की तो इंग्लैंड और आस्ट्रेलिया दोनों हैरान हो गए। बहुत ना-नुकर हुई लेकिन जब वेस्टइंडीज, पाकिस्तान ने भारत का साथ दे दिया तो फिर वर्ल्ड कप की मेजबानी भारत को मिलने के अवसर तो बन गए लेकिन अब भी भारतीय क्रिकेट बोर्ड के खजाने में इतने पैसे भी नहीं थे कि आईसीसी में गारंटी मनी के तौर पर जमा कर सके। तब रिलायंस ने मदद की और वर्ल्ड कप की मेजबानी भारत आ गई। इसे भारत और पाकिस्तान दोनों ने मिलकर किया। दरअसल इस वर्ल्ड कप की मेजबानी में भारत को फायदा तो नहीं हुआ लेकिन उसने ये दिखा दिया कि वह ये काम बखूबी कर सकता है।
बीसीसीआई की समृद्धि की शुरुआत
वर्ल्ड कप भारत आया तो बीसीसीआई को अंदाजा हो गया कि क्रिकेट से पैसा भी कैसे कमाया जा सकता है। इसी के बाद बीसीसीआई ने टीवी के प्रसारण अधिकार पाने की अहम लड़ाई दूरदर्शन से लड़ी। एक बार जब प्रसारण अधिकार पर बीसीसीआई का कब्जा हुआ, तब तक 90 के दशक में दुनिया के बाजारवाद ने अपने बड़े ब्रांड्स के साथ भारत में भी दस्तक दे दी थी। बच्चा-बच्चा भारत में क्रिकेट खेल रहा था, क्रिकेट देख रहा था और क्रिकेट जीने लगा था। फिर क्या था बीसीसीआई का खजाना भरने लगा। पैसा आने के साथ क्रिकेटर्स का पैसा बढ़ा। बाजार ने क्रिकेट को हाथों हाथ लिया। नतीजा ये भारत में वो खेल बनने की राह पर चल पड़ा जहां बोर्ड को दुनिया के सबसे धनी खेल बोर्डों की कतार में आ जाना था। क्रिकेटर्स अब कुछ हजार से लाखों कमाने लगे। बाजार अलग उनसे मोटे करार करने लगा।
आईसीसी का भारतीय मुखिया
बीसीसीआई उस हालत में आ गया कि वर्ल्ड क्रिकेट में पैसा पंप करने लगा तो वर्ल्ड क्रिकेट का पॉवर सेंटर बन गया। अब हमारा इंफ्रास्ट्रक्चर बेहतर हो रहा था तो क्रिकेटर्स का आत्मविश्वास बढ़ चला था। नब्बे के दशक में भारतीय क्रिकेट टीम ने टेस्ट क्रिकेट में नंबर वन की गद्दी भी हासिल कर ली। अब आईसीसी में एक भारतीय जगमोहन डालमिया चेयरमैन बनकर बैठ चुका था। वह संस्था जहां एक दशक पहले तक भारत को हिकारत की नजर से देखा जाता था, वहां वो सबसे पॉवरफुल हो चुका था।
दूसरी जीत के उत्साह के बाद आईपीएल
अब दूसरा वर्ल्ड कप हमने वर्ष 2007 में टी20 में महेंद्र सिंह धोनी की कप्तानी में कमोबेश नई-नवेली युवाओं की टीम के साथ जीता। ये जीत भी ऐसी थी कि किसी को विश्वास नहीं हो रहा था। क्योंकि ट्वेंटी 20 क्रिकेट में हमें बच्चा माना जा रहा था लेकिन हमने जिस तरह इसे जीता और चैंपियन बने, उसके बाद तो ऐसा लगा कि क्रिकेट का ये सबसे छोटा फार्मेट भी भारतीय क्रिकेटरों के खून में दौड़ने लगा। इसी जीत ने भारत को वो दिया, जिसने उसे पहले से ज्यादा मालामाल कर दिया यानि इंडियन प्रीमियर लीग आईपीएल शुरू करने का काम। देश में पहली बार कोई ऐसी लीग हो रही थी। जो अलग तरह की थी। टी20 फारमेट में थी। शहरों पर आधारित फ्रेंचाइजी की टीमों में खेली जाने वाली थी। विश्वास तो किसी को नहीं था लेकिन इसकी टीमों को खरीदने के लिए भारतीय उद्योगपतियों और बड़े व्यवसायियों ने जिस तरह थैली खोली, उसने भारतीय क्रिकेट और क्रिकेटरों को ऐसी मोटी कमाई दी, जो वाकई अभूतपूर्व थी। हालत ये हो गई कि दिग्गज विदेशी क्रिकेटर इसमें खेलने के लिए लालायित होते आए हैं। आईपीएल को होते हुए 15 साल हो चुके हैं और इसने दुनिया की बड़ी स्पोर्ट्स लीग के तौर पर झंडा गाड़ दिया है। इसने भारत में टी20 क्रिकेट की जड़ें तो मजबूत की ही, इसकी पापुलरिटी को बेइंतिहा बढ़ा दिया। टीवी प्रसारण राइट्स में ये लीग हाथों हाथ मुंह मांगे दामों पर खरीदी जाती है।


तीसरे वर्ल्ड कप के बाद का दौर
अब तीसरे वर्ल्ड कप की बात करते हैं। ये जीत थी भारत में वर्ष 2011 में खेले गए लिमिटेड ओवर्स के वर्ल्ड कप की। महेंद्र सिंह धोनी की अगुवाई में भारत ने जब इसे फिर जीता तब तक भारतीय क्रिकेट की ताकत का लोहा मैदान और मैदान के बाहर हर कोई मान चुका था। बीसीसीआई की ताकत भी अब जगजाहिर थी। इस जीत ने क्रिकेट को और भी ज्यादा लोकप्रिय बनाया तो पेशेवर बना दिया। अचानक इंटरनेशनल क्रिकेट से लेकर घरेलू क्रिकेट तक इस खेल का मजबूत ढांचा, सुविधायुक्त स्टेडियमों की पूरी कतार, फिटनेस को लेकर विश्वस्तरीय आला सुविधाएं सबकुछ भारत में आ चुकी थीं। अब हर भारतीय पेरेंट ये चाहता था कि उनका बेटा क्रिकेटर बने। क्योंकि अब क्रिकेट घरेलू क्रिकेट में खेलने वाले को भी भरपूर पैसा देने लगा था। लिहाजा ये तीसरे कप मे विजेता बनने के बाद हमने खुद पर और विश्वास करना सीखा। देश में खेल के बाजार को भी एक दूसरे स्तर पर ला दिया। ये वो दौर था जब आईपीएल की देखादेखी में दूसरे खेलों में भी तमाम स्पोर्ट्स लीग खेली जा रही थीं। देश में खेलों का ये माहौल दूसरे खेलों को भी समृद्ध कर रहा था। अब हम ओलंपिक में भी पदक जीतकर ला रहे थे, जो हमारे लिए किसी अनहोनी थी। यानि क्रिकेट की ये जबरदस्त तरक्की ने देश के दूसरे खेलों को भी एक नया विश्वास देना शुरू किया। इसमें कोई शक नहीं कि देश भी बदल रहा था, ज्यादा संपन्नता की राह पर चल पड़ा था।
अंदाज चैंपियन जैसा
अब ये चौथे वर्ल्ड कप की जीत हमें चैंपियनों सरीखी वो दृढ़ता और पेशेवर अंदाज देगी, जिसके लिए आस्ट्रेलिया की टीम जानी जाती रही है। हालांकि पिछले 13 सालों से हम ऐसी जीत का इंतजार कर रहे थे। हम बार बार कप के बहुत करीब पहुंचते थे लेकिन फिसल जाते थे। अब हम सीख गए हैं कि कैसे मुश्किल से मुश्किल हालात में खेल का मुंह मोड़ा जाता है और तस्वीर बदल दी जाती है। मतलब सही मायनों में अब हम चैंपियनों की तरह खेलना सीख गए हैं। हमारे पास जबरदस्त खिलाड़ियों का एक पूल है। प्रतिभाशाली खिलाड़ी लगातार दरवाजा खटखटा रहे हैं। अब आइए बात करते हैं अपनी इस टीम की और इसकी जोरदार जीत के तेवरों की।
खिलाड़ियों के तेवरों की बात
जब हम तेवरों की बात करेंगे तो विराट कोहली, कप्तान रोहित शर्मा, जसप्रीत बुमराह, सूर्य कुमार यादव, हार्दिक पांड्या जैसे फौलादी खिलाड़ी भी सामने खड़े दिखेंगे, जो कुछ भी कर सकते हैं और जिन्होंने ऐसा करके दिखाया भी है। हालांकि इस टीम की दो सबसे बड़ी धुरी विराट कोहली और रोहित शर्मा थे, जिन्होंने टी20 क्रिकेट से संन्यास ले लिया। अब वो अपना ध्यान क्रिकेट के अन्य फार्मेट में लगाएंगे। ये अच्छा भी है कि उनके सामने टी20 की नई टीम नए कमांडर के साथ तैयार होती नजर आएगी। रोहित शांत और शालीन हैं तो विराट उनके उलट खासे आक्रामक लेकिन दोनों का जीवट वाला चरित्र हमारे क्रिकेट को समृद्ध करता रहा है। बगैर इन दोनों के ये वर्ल्ड कप की जीत शायद संभव नहीं थी। हालांकि इस टीम में अर्शदीप सिंह, कुलदीप यादव, अक्षर पटेल जैसे खिलाड़ी भी कम गजब के नहीं थे, जिस टीम में इतने कमाल के खिलाड़ी हों, निश्चित तौर पर उनका कप्तान सबकुछ करने में सक्षम होता है। ये सभी निडर युवा हैं। अब तक भी ये माना जाता था कि भारतीय क्रिकेट की मुख्य ताकत टी20 नहीं बल्कि टेस्ट और वन-डे हैं लेकिन अब ये ख्याल दिल से निकाल देना चाहिए। हम अब तीनों में ताकतवर हैं। रोहित के नेतृत्व में भारत तीनों फॉर्मेट के फाइनल में पहुंचा।

‘हां, बिल्कुल यह कर सकते हैं’

बढ़िया होमवर्क और सावधानीपूर्वक योजना के बगैर ऐसी कोई भी जीत हासिल नहीं की जा सकती। एक प्रतिभाशाली टीम को निखारने और उनमें आत्मविश्वास पैदा करने के लिए कोच राहुल द्रविड़ और सहयोगी स्टाफ कोई कम बधाई का पात्र नहीं है। बीसीसीआई के राष्ट्रीय चयनकर्ताओं ने भी ऐसी टीम चुनी, जो कुछ विवादास्पद विकल्पों के बावजूद एक बड़ी योजना और दृष्टिकोण के अनुरूप थी।
जैसे मानसून ने हीटवेव की जगह ले ली, क्रिकेट की जीत भी राहत लेकर आई और सूखे का अंत हुआ। बहुत लंबे समय तक, भारत या तो सेमीफाइनल में बाहर हो जाता था या अंतिम बाधा पार करने में असफल हो जाता था। हमारी टीम पर बड़े, नॉक-आउट मैचों को खेलने की क्षमता और दबाव को संभालने को लेकर सवाल उठाए जाने लगे थे। इस टूर्नामेंट ने शानदार जवाब देते हुए कहा, ‘हां, हम बिल्कुल ये कर सकते हैं।’ वैसे हकीकत ये भी है कि ये ऐसा खेल है जो इस देश में नफरत को कम कर सकता है। फासलों को दूर कर सकता है और लोगों को साथ मिलकर खुशी मनाने के लिए मजबूर कर देता है। खेल में ये ताकत होती ही है।

जीत से जुड़ा देश का हैप्पी इंडेक्स

भारत के क्रिकेट प्रशंसकों को इस जीत की जरूरत थी। इसी वजह से जब भारत ब्रिजटाउन में फाइनल में हॉलीवुड की किसी रोमांचक फिल्म के स्टाइल में जीता तो भारत में देर रात तक जश्न मनाया गया। सोशल मीडिया खुशी भरी पोस्ट से पट गया। सभी को इस जीत की वाकई जरूरत थी, क्योंकि बगैर इस ताज के हम ठहर गए से लग रहे थे। क्रिकेट में जब हम जीतते हैं तो ऐसा लगता है कि कुछ समय के लिए हमारी सारी व्यक्तिगत समस्याएं किनारे हो गई हैं, हम सबकुछ भूल जाते हैं। क्रिकेट की जीत हमारे ऊपर जादू करती है। देश के हैप्पी इंडेक्स को बढ़ाती है। टी20 विश्व कप उस समय भारत में आया जब देश को धर्म वर्ग, जाति, क्षेत्र और भाषाओं से परे, वास्तव में खुशी के एक ऐसे ही लम्हे की जरूरत थी।
आप जरा सोचिए, फाइनल में 15 ओवरों के बाद ज्यादातर लोगों ने उम्मीद छोड़ दी थी कि भारत अब ये कप जीतेगा। उसके बाद अचानक जसप्रीत बुमराह को एक ओवर पहले लाया जाता है और फिर जो होता है वो किसी हॉलीवुड की फिल्म की तरह था। सूर्य कुमार यादव का वो अविश्वसनीय कैच और हार्दिक पांड्या के अंतिम ओवर के साथ साउथ अफ्रीका का यकायक धराशायी हो जाना। जैसे ही ये हुआ तब विराट कोहली हार्दिक पांड्या को गले लगाने के लिए आगे बढ़े, जबकि रोहित शर्मा जश्न मनाने के लिए फर्श पर गिर पड़े। सबकी आंखों में आंसू थे। कोहली उस भारतीय टीम के भी सदस्य थे, जिसने वर्ष 2011 में वर्ल्ड कप जीता था, उस फाइनल में जीत के बाद तब 22 वर्षीय कोहली ने जीत की खुशी में महान सचिन तेंदुलकर को अपने कंधों पर उठा लिया था, इस बार वह खुद जीत के हीरो थे। जश्न मनाते रोहित और कोहली एक दूसरे की बांहों में बांहें डाले खड़े थे। फिर उन्होंने घोषणा की कि वे इस मंच से विदा ले रहे हैं , यह उनका अंतिम टी-20 अंतरराष्ट्रीय मैच होगा।

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