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ब्लॉग चर्चा

08:09 AM Jan 08, 2024 IST
ब्लॉग चर्चा
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प्रतिभा कटियार

लंबे समय से एक जद्दोजहद में हूं कि मेरा पढ़ना छूट रहा है। मुझे लिखना छूटने से ज्यादा तकलीफ होती है पढ़ना छूटने से। पढ़ने से बची हुई जगह में बेकार की व्यस्तता का न जाने कितना कचरा फैलने लगता है। इस छूटने को रोकने के लिए मैंने तमाम किताबें मंगाईं। कुछ पढ़ीं। कुछ पढ़ने की कोशिश में छूट गईं। लिखने और पढ़ने में मेहनत करने की हिमायती मैं बिलकुल भी नहीं। लिखना और पढ़ना सांस लेने जैसा होना चाहिए। सरल और बिना किसी अतिरिक्त प्रयास जैसा। इस सिद्धांत को कम उम्र में ही अपना लिया था। जब भी कुछ पढ़ने में मेहनत करनी पड़ी उस रचना के आगे सिर झुका लिया और खुद से कहा, ‘प्रतिभा, अभी इसे पढ़ने की तुम्हारी तैयारी नहीं है।’
दरअसल, यह तैयारी किसी स्कूल या कॉलेज में नहीं होती है। जीवन में होती है। समझ की तैयारी। बहुत-सी रचनाएं अब भी मेरी तैयारी की बाट जोह रही हैं, या शायद मैं बाट जोह रही हूं। या शायद कोई बाट नहीं जोह रहा, बाट जोहने के भ्रम फैले हैं। कुछ प्रिय लेखक जिन्हें पढ़ चुकी हूं उन्हें फिर फिर पढ़ती हूं। फिर लौट आती हूं उस कोने में जहां शायद कोरे पन्नों का जादू रखा है। उन पन्नों को पलटना नहीं चाहती। जादू बचाए रखना चाहती हूं।
बेवजह-सी कोई उदास धुन खुशनुमा मौसम में ढलकर मौसम को और सुहाना बना रही है। उदासी प्रेम का गहना है। जानती हूं। मुस्कुरा देती हूं। प्रियंवद सब खेल देखते हुए हंस देते हैं। उनकी हंसी में ‘गोधूलि’ नज़र आने लगती है। उन्होंने अपने कहे में कहना शुरू किया, ‘उस बरस ऋतुएं थोड़ा पहले आ गयी थीं।’ ऋतुओं के बदलने की आहट तेज़ हो चुकी थी। मैंने गोधूलि की उस बेला को मुट्ठी में बंद कर लिया। आज शाम उदासी जरा परे सरक गयी थी। गोधूलि खुलने लगी थी। कुछ देर बाद सुर लग चुका था। पढ़ने का सुर। किताब जब रात-दिन साथ रहने लगे, वाक्य जब रात-दिन बतियाने लगे तो ज़िंदगी से शिकायत कम होने लगती है। जीवन के प्रति दृष्टि जितनी साफ होती है, लेखन उतना सुंदर होता है। यह कोई सामान्य कहानी नहीं है... जीवन की तरह कि खुल जाये गांठ तो सरल और उलझी रहे तो मुश्किल बहुत....। बहुत-सी चीज़ें अक्सर या फिर धीरे-धीरे या फिर अचानक ही ख़त्म होकर दिखना बंद हो जाती हैं। हर दस्तक की एक गुप्त भाषा होती थी। उसने कहा अधिकारी होने के लिए कविता की समझ होना जरूरी है। ईश्वरविहीन प्रार्थनाएं और अकारण बनी रहने वाली करुणा द्रवित होने लगी थी। दुनिया का इतिहास सिर्फ महत्वाकांक्षाओं का इतिहास है। सारे सत्य हजारों साल पुराने हो चुके हैं। एक किताब की बात।
साभार : प्रतिभा कटियार डॉट ब्लॉगस्पॉट डॉट कॉम

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