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हमेशा दिलो दिमाग के साथ बनी फिल्में रहीं पसंद

08:02 AM Mar 16, 2024 IST
हमेशा दिलो दिमाग के साथ बनी फिल्में रहीं पसंद
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दीप भट्ट
अभिनेता शशि कपूर भारतीय फिल्मोद्योग के सबसे चार्मिंग स्टार रहे हैं। उनकी मुस्कान और आकर्षक व्यक्तित्व ने करोड़ों दिलों पर राज किया। स्व़ शशि कपूर से पहली मुलाकात, देहरादून में हुई थी। बाद में मुंबई में कई बार बातचीत हुईं। पेश हैं उन्हीं बातचीत के अंश :
शशि कपूर ने बताया कि उस दौर को याद करता हूं तो पहले फिल्म बनाने वाली छोटी-छोटी टीमें थीं, जो अब तो रही नहीं। नए फिल्मकार मशक्कत कम करते हैं। इनके पास सीखने के लिए वक्त भी नहीं है। जो बड़े-बड़े फिल्म मेकर थे, पहले इन्होंने यह काम सीखा था। बिमल राय जैसे डायरेक्टर तो अपने आप में एक इंस्टीट्यूशन थे। अब क्या है कि सब कुछ फास्ट फूड सा हो गया है। पुरानी फिल्मों में दिल और दिमाग दोनों मौजूद थे। धीरे-धीरे फिल्मों से दिमाग गायब होता गया, पर अरसे तक दिल की मौजूदगी बरकरार रही, पर अब तो न दिल है, न दिमाग।

थिएटर और सिनेमा का एक्सपोजर

मुझे शुरू से ही थिएटर का शौक था। 1944 में जब मैं छह साल का था तो पृथ्वी थिएटर का जन्म हो चुका था। पृथ्वी थिएटर के ड्रामाज हो रहे थे। उसी साल मेरा थिएटर का एक्सपोजर हुआ और सिनेमा का भी। मैंने जो फिल्म देखी, वह थी ‘सिकंदर’ जिसमें अच्छा अनुभव रहा मेरा। फिल्मों की ओर मेरा रुझान बढ़ गया। इसके बाद फिल्मों में काम शुरू किया। ‘चारदीवारी’ मेरी पहली फिल्म थी। चारदीवारी के डायरेक्टर थे, कृष्ण चोपड़ा। फिर राजकपूर के ही सेक्रेटरी किरण खेड़ा के साथ काम किया। उन्होंने पिक्चर बनाई, ‘मेहंदी लगी मेरे हाथ’। उन्होंने दूसरी फिल्म बनाई- ‘जब जब फूल खिले’। लोगों ने इस फिल्म में मेरे रोल को बहुत पसंद किया। इसके बाद मुझे फिल्में मिलती गईं।

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अमिताभ के साथ काम का सिलसिला

1973 में अमिताभ बच्चन के साथ काम का सिलसिला शुरू हुआ। उनके साथ पहली फिल्म मिली- ‘दीवार’। यह 1975 में रिलीज हुई। यह जोड़ी लोगों को अच्छी लगी। दस- पंद्रह फिल्में कीं हम दोनों ने। सन 1992 में मैंने महसूस किया कि उम्र ज्यादा हो गई, अब फिल्मों को बाय-बाय कह देना चाहिए। ऐसे मोड़ पर खूबसूरत फिल्म मिली मुझे- ‘मोहाफिज’। इस्माइल मर्चेंट लाए थे, इस फिल्म को। फिर 1997 में दो-तीन पिक्चरें कीं। इनमें कुछ अमेरिकन थीं। इनमें एक पाकिस्तान में बनी- ‘जिन्ना’ फिल्म भी थी।

थिएटर से सीखा एक्टिंग का ककहरा

सन 1997 में फिल्मों पर फुल स्टॉप लगा दिया। पिताजी ने पृथ्वी थिएटर का जो काम शुरू किया था, उसे मैंने संभाल लिया। आज भी इसे हम नान प्रॉफिट में चला रहे हैं। आप मुझसे पूछ रहे हैं कि मैंने अपना स्टाइल कैसे गढ़ा तो मैं आपको बताता हूं कि मैंने थिएटर से अभिनय का ककहरा सीखा। परदे पर हम चेहरे का एक्सप्रेशन देखते हैं। जबकि स्टेज पर सारे शरीर का इस्तेमाल किया जाता है। इस मायने में स्टेज और फिल्म में अभिनय डिफरेंट हो जाता है। मैंने दोनों ही से दोनों चीजें सीखीं। राजकपूर साहब ने मुझे कभी फिल्म निर्माण के गुर नहीं सिखाए। मैं मौन दर्शक की तरह, एक कोने में खड़ा उनका काम देखता और सीखने की कोशिश करता था।

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पिता समान बड़ा भाई

राज साहब को मैं हमेशा अपने पिता समान बड़ा भाई मानता रहा। शम्मी कपूर से मेरे रिश्ते मित्र की तरह थे। राज कपूर ने जो भी फिल्में उन्होंने बनाईं, वे उसके सोशल कॉज भी दिखाते थे। हम 1960 के दशक की बात कर रहे हैं। लेकिन अब पीढ़ी बदल गई। अभी फिल्म का नाम एंटरटेनमेंट है। जमाना अब ज्यादा सीरियस चीजों को एक्सेप्ट नहीं कर रहा है। साल 1951 में राजकपूर की ‘आवारा’ रिलीज हुई, तब तक मैं फिल्म निर्माण और एक्टिंग के बारे में शुरुआती बातें जान गया था। बचपन के बारे में सोचता हूं तो तबस्सुम की याद आती है। उनके साथ मैंने बांबे टॉकीज निर्मित ‘संग्राम’ फिल्म में काम किया था। मैंने राज साहब के साथ दो फिल्मों- ‘आवारा’ और ‘सत्यम शिवम...’ में काम किया। सत्यम- शिवम 1978 में रिलीज हुई। ‘आग’ पहली पिक्चर थी, राजकपूर की और मेरी। आवारा कंप्लीट हो गई तो उन्होंने मुझे एक मूवी कैमरा लाकर दिया। मैंने एक फिल्म बनाई -‘फांसी’। हमने आवारा के सेट पर जाकर इसकी शूटिंग की संडे के दिन। मैं डिटेक्टिव का रोल कर रहा था।

काम से इश्क करने वाले निर्देशक

‘सत्यम-शिवम..’ के दौरान तो मैं स्टार के रूप में स्थापित हो चुका था। राज कपूर के अलावा मैंने बिमल राय, कृष्ण चोपड़ा, मनमोहन देसाई, यश चोपड़ा के साथ काम किया। सब काम से इश्क करने वाले लोग थेे। फिल्मों के सोशल आस्पेक्ट पर जोर देते थे। लेकिन मनमोहन देसाई का फोकस सेलेबिलिटी पर था। अंग्रेजी डायरेक्टर्स इस्माइल मर्चेंट व जेम्स आइवरी के साथ भी काम किया ।

मेरी नायिकाओं के बारे में

आपने मेरी नायिकाओं के बारे में पूछा तो एक्चुअली, जब मैंने काम शुरू किया तो सिर्फ नंदा जी मेरे साथ काम करने को राजी होती थीं, बाकी कम ही। क्योंकि मैं नया था। शायद डर हो कि नए के साथ सफल होंगे या नहीं। साधना ने एक पिक्चर की मेरे साथ- ‘प्रेम पत्र’,निर्देशक बिमल राय ने बनायी था। दोबारा उन्होंने मेरे साथ काम नहीं किया। मीना कुमारी के साथ मैंने एक ही पिक्चर ‘बेनजीर’में काम किया, 1963 या 1964 में। फिर मैंने शर्मिला टैगोर व आशा पारेख के साथ भी काम किया। बंगाल की जितनी हीरोइंस थीं, मैंने उन सभी के साथ काम किया। मौसमी चटर्जी के साथ, जया बच्चन के साथ, राखी के साथ। सबमें एक बात थी- मूड अच्छा है तो काम, मूड खराब है तो काम नहीं।

फिल्मों में काम की शुरुआत

मैं फिल्मों में तब आया, जब मुझे अहसास हुआ कि मेरी शादी हो चुकी है, एक बच्चा भी है, अब अपना घर बसाना है। फिर पता चला कि पृथ्वी थिएटर बंद होने वाला है। शेक्सपियराना थिएटर करने वाली कंपनी बंद हो रही है। ऐसे में मेरी चिंता बढ़ गई। बीवी और मैं दोनों मिलकर थिएटर के जमाने में 400 रुपये कमाते थे। यह 1955-56 की बात होगी। फिर मुझे धीरे-धीरे फिल्मों के ऑफर मिलने शुरू हुए, छोटी- छोटी कंपनीज के। एक पिक्चर मिली- ‘ये दिल किसको दूं’। इसमें काम करने के मुझे पांच हजार रुपये मिले थे। फिल्मों में मैंने 1960 में काम शुरू किया। शुक्रगुजार हूं कि मुझे अच्छे चांस मिले। थिएटर बंद होने तक, मैं फिल्मों में इस्टेब्लिश हो चुका था। ऊपर वाले का शुक्रगुजार हूं और फिल्म इंडस्ट्री का भी। विदेश में पहचान के लिए इस्माइल मर्चेंट ने मुझे 1962 में चांस दिया। उनके साथ करीब 14-15 पिक्चरें की होंगी। उनकी वजह से बाहर की पिक्चरें मिलीं। एक थी, सिद्धार्थ। डर्टी ब्रिटिश ब्वाइज, फिर जिन्ना, फिर मर्चेंट आइवरी की फिल्में। इस तरह एक अच्छा सफर गुजरा। मैं सिनेमा के भविष्य को लेकर नाउम्मीद नहीं हूं। वह दौर फिर आएगा, जब फिल्मों का प्रजेंटेशन ऐसा होगा कि देखते-देखते नशा हो जाए। दिलों में दर्द को जगाने वाले संगीत की वापसी होगी।

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