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क्षमताओं को मिले संभावनाओं का खुला आकाश

08:10 AM Mar 14, 2024 IST
क्षमताओं को मिले संभावनाओं का खुला आकाश
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दीपिका अरोड़ा

शिक्षा को मानव जीवन का अपरिहार्य अंग माना गया है। ज्ञान प्राप्ति की सहज प्रक्रिया कदाचित तनाव बनकर जीवन पर हावी होने लगे तो विषय विचारणीय हो जाता है। विगत कुछ वर्षों के दौरान भारतीय छात्रों में अवसाद तथा आत्मघात के मामलों की संख्या में चिंताजनक वृद्धि देखी गई। किसी प्रतिष्ठित शैक्षणिक संस्थान में सीट सुरक्षित करने की होड़, नौकरियों की अपर्याप्तता आदि जहां इसमें संभावित कारण आंके गए, वहीं पारिवारिक अपेक्षाएं एवं शैक्षणिक संस्थानों का बोझिल वातावरण भी प्रमुख कारणों में शामिल रहे।
कोचिंग संस्थानों में ऐसी घटनाएं घटना मानो एक आम बात बन चुकी है। प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करवाने में अग्रणी राजस्थान के कोटा की ही बात लें; वर्ष 2023 के दौरान 26 छात्रों द्वारा आत्महत्या करने को लेकर बहुचर्चित रहे इस शहर में, प्रशासनिक चेतावनी के बावजूद समस्या का समाधान संभव नहीं हो पाया। जनवरी से लेकर अब तक घटित हो चुके चार आत्महत्या प्रकरणों में, दुर्भाग्यवश, 5वां मामला भी जुड़ गया। हाल ही में, एक 16 वर्षीय किशोर ने प्रतियोगी परीक्षा पास न कर पाने संबंधी असमर्थता जताते हुए अपनी जीवनलीला समाप्त कर ली। ‘पापा! मेरे से जेईई नहीं हो पाएगा। क्षमा कीजिएगा, मैं जा रहा हूं’, घटना में बरामद सुसाइड नोट में अंकित ये शब्द व्यवस्थात्मक आधार पर एवं बतौर अभिभावक हमें बहुत कुछ सोचने पर बाध्य करते हैं।
देखा जाए तो कार्यक्षेत्रीय परिधि में अपेक्षाकृत विस्तार होने के बावजूद पूर्वाग्रह ग्रसित भारतीय समाज में आज भी इंजीनियरिंग, चिकित्सा, सिविल सेवा जैसे प्रतिष्ठित क्षेत्रों में स्थापित होना गौरव का विषय माना जाता है। कई बार तो बच्चे की रुचि अथवा प्रतिभा का आकलन किए बिना ही अभिभावक इन्हीं क्षेत्रों में दाख़िला लेने संबंधी निर्णय जबरन इसलिए थोप देते हैं क्योंकि बेहतर जीवनशैली के साथ उन्हें यहां उच्च आय की लाभकारी संभावनाएं नज़र आती हैं। हालांकि, इस सोच के पीछे एक अन्य कारण देश में फैली बेरोज़गारी भी है।
बदलते परीक्षा पैटर्न के साथ, आवेदकों की संख्या भी अनवरत बढ़ने के कारण एक अच्छे संस्थान में प्रवेश पाना कठिन होता जा रहा है। इसी स्थिति को सफलता की गारंटी के रूप में भुनाते हैं कोचिंग संस्थान। वास्तविकता तो यह है, प्रतिस्पर्धात्मक माहौल होने के कारण ये संस्थान बहुधा शीर्ष प्रदर्शन करने वाले छात्रों पर ही विशेष ध्यान देते हैं। औसत छात्रों को संस्थानों से समायोजन करने में ख़ासी समस्याएं पेश आती हैं। मानसिक उथल-पुथल के साथ अनेक कठिनाइयों से जूझ रहे इन छात्रों को अक्सर नज़रअंदाज़ किए जाने से उनमें हीन भावना पनपने लगती है, जिसका सीधा असर उनकी शैक्षणिक क्षमता पर पड़ता है। गहराते तनाव के मध्य प्रेरणा व सकारात्मक संवाद की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण है, जिसमें संस्थात्मक सहयोग के साथ अभिभावकों की व्यक्तिगत सहभागिता अनिवार्य हो जाती है। ऐसा न हो पाने की स्थिति में तनाव आत्मघाती रूप धारण कर सकता है।
इसी संदर्भ में चिंता प्रकट करते हुए, केंद्रीय शिक्षा मंत्रालय ने कोचिंग सेंटर विनियमन, 2024 के अंतर्गत नए दिशा-निर्देश जारी किए। प्रस्तावित दिशा-निर्देशों में कोचिंग संस्थानों को भ्रामक वादों अथवा रैंक की गारंटी न देने, कोचिंग संस्थान में 16 वर्ष से कम आयुवर्ग के छात्रों को नामांकित नहीं करने आदि सहित छात्रों को मानसिक स्वास्थ्य संबंधी सहायता उपलब्ध कराने की बात भी कही गई।
माता-पिता विभिन्न परिस्थितियों पर कैसी प्रतिक्रिया देते हैं, बच्चे का मानसिक स्वास्थ्य काफी हद तक इस बात पर निर्भर करता है। मानसिक तनाव से उबारने का एक अन्य शक्तिशाली उपकरण है संस्थागत विशेषज्ञों द्वारा संचालित कार्यशाला, जो छात्रों को नियमित पाठ्यक्रम के साथ समस्या समाधान, संघर्ष, भावनात्मक बुद्धि तथा तनाव प्रबन्धन के एकीकरण के साथ समस्याओं की पहचान, प्रबंधन तथा समाधान में सहायक बनती है। शिक्षण केंद्रों में इनका आयोजन नियमित व अनिवार्य होना चाहिए।
हितैषी होने के नाते बच्चे के स्वर्णिम भविष्य की कामना करना अनुचित नहीं है लेकिन किसी भी क्षेत्र में दाख़िला दिलाने से पूर्व बच्चे की प्रतिभा का सही आकलन करना एवं उसकी रुचि-राय जानना अत्यावश्यक है। उपलब्ध करियर विकल्पों के बारे में जागरूकता की कमी अथवा पूर्वाग्रहों के चलते किसी विशिष्ट संस्थान में दाख़िला लेने को ही योग्यता का प्रमाण मानना या अपनी अधूरी इच्छाओं को बच्चों के माध्यम से पूरी करने की आकांक्षा में किसी विकल्प की गुंजाइश ही न छोड़ना, बच्चे को खुलकर अपनी समस्याएं साझा करने का अवसर ही नहीं देते और भीतर की यह घुटन एक दिन हृदयविदारक समाचार के रूप में हमारे सम्मुख उजागर होती है।
छात्रों को उनकी शैक्षणिक गतिविधियों में उत्कृष्टता प्राप्त करने के लिए सहायक व सकारात्मक वातावरण बनाना महत्वपूर्ण है। शिक्षा प्रणाली को समग्र विकास पर ध्यान केंद्रित करने, समान अवसर प्रदान करने तथा मानसिक स्वास्थ्य तथा कल्याण को बढ़ावा देने की आवश्यकता है ताकि छात्र अपनी क्षमताओं का भरपूर उपयोग कर उज्ज्वल भविष्य बना पाएं। बुरे चिकित्सक या इंजीनियर होने से हज़ार दर्ज़े बेहतर है एक अच्छा कलाकार होना। क्यों न बतौर अभिभावक बच्चों की क्षमताओं को खुला आकाश दिया जाए; संभावनाओं की अनंतता में वे अपना भविष्य अवश्यमेव ढूंढ़ लेंगे।

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