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सर्वजन का सुकून खोजती कविता

08:32 AM Apr 07, 2024 IST
सर्वजन का सुकून खोजती कविता
पुस्तक : निंबोलियां कवि : डॉ. विमल कालिया ‘विमल’ प्रकाशक : सृष्टि प्रकाशन, चंडीगढ़ पृष्ठ : 156 मूल्य : रु. 170.
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कमलेश भारतीय

डॉ. विमल कालिया ‘विमल’ के नये काव्य संग्रह ‘निंबोलियां’ की कविताओं से गहरे से गुजरने के बाद कहा जा सकता है कि कविता में नयी ताज़गी के साथ एक नयी आवाज़ सुनाई दी है।
संकलन में इनके बीच पहाड़ का दर्द, प्रकृति का दोहन और मां की स्मृति में एक दर्जन से ऊपर कवितायें शामिल हैं। जैसे मां की स्मृति में ही ये कवितायें लिखना, मां को यहां, वहां, हर जगह खोजना ही इन कविताओं का स्वर हो। चाहे रसोई ही नहीं घर की छोटी से छोटी चीज़ हो, सिलबट्टा, डोली, रजाई और मेले में भी मां की कमी भीतर तक महसूस करना! ‘निंबोलियां’ कविता देने का संदेश देती है कि समाज को कड़वे होने के बावजूद मीठी निंबोलियों जैसा अहसास दो। मां कविता में सवाल :-
किसी ने कहा/ मर कर लोग तारा बन जाते हैं/ रात-रात भर/ आसमान के तारों में ढूंढ़ता हूं, मां!/ पर अनगिनत तारों में/ तुम्हें ढूंढ़ पाने में/ अक्षम हूं/ तुम ही बताओ/ तुम्हारी पहचान क्या है!
‘ये पहाड़’ बहुत अच्छी कविता बन पड़ी है और कवि सवाल करता है इन पहाड़ों को तोड़ने फोड़ने वालों से :-
फिर क्यों इंसान
लगा रहता है
पहाड़ों को काटने
जब उसे, उन्हें उगाने
उन्हें बनाने, बचाने का
शऊर नहीं आता!
दुनिया फेसबुक की बड़ी रोचक और चुटीली कविता भी है :-
मुगालता-सा रहता है मुझे हमेशा/ कि दुनिया में/ खुशी से लबरेज़/ तो गम जाने/ किस जहां में रहता है!
डाॅ. विमल! हर नयी कविता कवि के जीवन की नयी तह सामने लाती है। हर नयी कविता में कवि की नयी सोच से, नये सवालों से, नयी चिंताओं से परिचय होता है। अंतिम में लिखते हैं :-
रोशनी के दायरे में
निकल जाऊं
तो सुकून मिले!
तेरी यादों के दायरे से
निकल जाऊं तो
सुकून मिले!
कवि सिर्फ अपना सुकून नहीं खोजता, कवि तो सर्वजन का सुकून खोजता भी है और जब सर्वजन का सुकून बन जाती है कविता तब बहुत बड़ा दायरा हो जाता है इसका!

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