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हिरासत के बाद लापता... 32 साल बाद इंसाफ

05:00 AM Dec 19, 2024 IST
हिरासत के बाद लापता    32 साल बाद इंसाफ
सुखवंत कौर अपने पति व ससुर की तस्वीर दिखाती हुई।
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राजीव तनेजा/ हप्र
मोहाली, 18 दिसंबर
दो लोगों के अपहरण, अवैध हिरासत और लापता होने के 32 साल पुराने एक केस में बुधवार को यहां सीबीआई कोर्ट ने दो पूर्व पुलिसकर्मियों को दोषी करार दिया। इनमें जिला तरनतारन स्थित थाना सरहाली का पूर्व एसएचओ सुरिंदरपाल सिंह, जसंवत सिंह खालड़ा कत्ल केस में पहले ही उम्रकैद की सजा काट रहा है। तरनतारन के गांव जिओबाला के चार लाेगों को अगवा करके लापता करने के एक अन्य केस में भी उसे दस साल की सजा हो चुकी है। दूसरे दोषी व एएसआई रहे अवतार सिंह की ट्रायल के दौरान मौत हो चुकी है। सुरिंदरपाल को जेल से वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से विशेष जज मनजोत कौर की अदालत में पेश किया गया। उसे 23 दिसंबर को सजा सुनाई जाएगी।
मामले के अनुसार 31 अक्तूबर, 1992 की शाम को वाइस प्रिंसिपल सुखदेव सिंह और उनके 80 वर्षीय पिता सुल्लखन सिंह (स्वतंत्रता सेनानी निवासी भकना) को एएसआई अवतार सिंह के नेतृत्व में पुलिस पार्टी ने हिरासत में लिया था। परिवार को कहा गया था एसएचओ सुरिंदरपाल सिंह ने पूछताछ के लिए बुलाया है। दोनों को तीन दिन तक पुलिस थाना सरहाली तरनतारन में अवैध तरीके से रखा गया, उसके बाद उनका कुछ पता नहीं चला।
सुखदेव सिंह की पत्नी सुखवंत कौर ने उच्च अधिकारियों को शिकायतें दी। पूर्व विधायक सतपाल डांग और विमला डांग ने भी तत्कालीन मुख्यमंत्री बेअंत सिंह को पत्र लिखे। वर्ष 2003 में कुछ पुलिसकर्मियों ने सुखवंत कौर से खाली कागज पर हस्ताक्षर करवा लिए। कुछ दिन बाद उन्हें सुखदेव सिंह की मौत का सर्टीफिकेट सौंप दिया गया, जिसमें 8 जुलाई 1993 को उनकी मौत होने का जिक्र किया गया था। परिवार को सूचित किया गया कि टॉर्चर के दौरान सुखदेव सिंह की मौत हो गई और उसकी लाश सुल्लखन सिंह सहित हरीके नहर में फेंक दी गई थी। नवंबर 1995 में एक अन्य मामले में सुप्रीम कोर्ट ने सीबीआई को बड़े स्तर पर मृतकों के अंतिम संस्कार के मामले की जांच करने के निर्देश दिये थे। मानवाधिकार कार्यकर्ता जसवंत सिंह खालड़ा ने पंजाब पुलिस की ओर से लाशों को लावारिस बताकर संस्कार करने का खुलासा किया था।

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क्लोजर रिपोर्ट के बाद दाेबारा हुई जांच : सीबीआई ने सुखवंत कौर के बयान बयान के आधार पर 6 मार्च, 1997 को दोनों आरोपी पुलिसकर्मियों और अन्य के खिलाफ धारा 364/34 के तहत केस दर्ज किया था और वर्ष 2000 में क्लोजर रिपोर्ट दायर की। सीबीआई कोर्ट पटियाला ने वर्ष 2002 में क्लोजर रिपोर्ट रद्द करते हुए जांच के निर्देश दिए थे। इसके बाद 2009 में सीबीआई ने चार्जशीट दायर की थी।

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